टाटा संस की गुरुवार को हुई बोर्ड बैठक में दो बड़े फैसले लिए गए. इसमें चेयरमैन एन. चंद्रशेखरन को अगले 5 साल के लिए फिर से कमान सौंपने का फैसला लिया गया है. वहीं आरबीआई के सख्त नियमों की वजह से टाटा संस को शेयर बाजार में उतारने पर भी सहमति बन गई है. एन. चंद्रशेखरन का ये तीसरा कार्यकाल होगा. इनका दूसरा कार्यकाल फरवरी 2027 में खत्म होने वाला है. अगस्त 2026 में चंद्रशेखरन ने बोर्ड को बताया था कि वह फरवरी 2027 में अपना कार्यकाल खत्म होने के बाद आगे पद पर नहीं बने रहना चाहते हैं.
दरअसल, एन. चंद्रशेखरन और नोएल टाटा के बीच विवाद जगजाहिर है. नोएल टाटा टाटा ट्रस्ट के चेयरमैन और रतन टाटा के सौतेले भाई हैं. नोएल टाटा को छोड़कर बाकी सभी बोर्ड के सदस्यों ने एकतरफा वोट एन. चंद्रशेखरन के पक्ष में किया है. हालांकि अभी एन. चंद्रशेखरन के कार्यकाल को बढ़ाने के फैसले को सालाना आम बैठक में मंजूरी मिलना बाकी है, जिसमें टाटा ट्रस्ट की 66% हिस्सेदारी है.
बोर्ड ने अगले 5 साल के लिए एन. चंद्रशेखरन को चेयरमैन चुनने के साथ ही, टाटा संस का आईपीओ लाने पर आपसी सहमति दे दी है. आईपीओ के प्रस्ताव पर बोर्ड की सहमति एक ऐतिहासिक कदम है. लेकिन इसके पीछे कानूनी मजबूरी भी थी. इसी महीने भारतीय रिजर्व बैंक ने टाटा संस के एनबीएफसी पंजीकरण को सरेंडर करने के आवेदन को खारिज कर दिया था. जिसके बाद कंपनी के लिए आईपीओ लाना आवश्यक हो गया था. ऐसे में बोर्ड ने निवेशकों के विश्वास को बनाए रखने और शेयर बाजार में कंपनी को सूचीबद्ध कराने के लिए चंद्रशेखरन के अनुभव और नेतृत्व पर फिर भरोसा जताया है.
एन. चंद्रशेखरन का टाटा ग्रुप में सफर
बता दें, एन. चंद्रशेखरन करीब 40 साल से टाटा ग्रुप के साथ जुड़े हुए हैं. उन्होंने अपने करियर की शुरुआत TCS से की थी और बाद में टीसीएस के सीईओ और प्रबंध निदेशक बने. फरवरी 2017 में उन्हें पहली बार टाटा संस का चेयरमैन बनाया गया था. इनके कार्यकाल में एअर इंडिया का अधिग्रहण, टाटा डिजिटल का विस्तार और टाटा ग्रुप के मार्केट कैप में दमदार बढ़ोतरी दर्ज की गई.
एन. चंद्रशेखरन के 2017 में कमान संभालने के बाद टाटा ग्रुप का दायरा भी काफी बढ़ा है. उन्होंने टाटा ग्रुप को एविएशन, सेमीकंडक्टर, इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग, बैटरी और डिजिटल कारोबार जैसे नए क्षेत्रों में उतारा है. आंकड़े बताते हैं कि वित्त वर्ष 2020 में ग्रुप का रेवेन्यू 7.89 लाख करोड़ रुपये था, जो वित्त वर्ष 2026 में बढ़कर 16.24 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा हो गया. यही नहीं, लिस्टेड कंपनियों का मार्केट कैप साल 2020 में करीब 9.31 लाख करोड़ रुपये था, जो 2026 में बढ़कर 24 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा हो गया.
क्यों टाटा संस का IPO लाना जरूरी?
आरबीआई ने सितंबर 2022 में टाटा संस को अपर-लेयर एनबीएफसी के रूप में रजिस्टर्ड किया था. RBI के नियम के मुताबिक अपर-लेयर में आने वाली कंपनियों के लिए 3 साल के भीतर शेयर बाजार में सूचीबद्ध कराना जरूरी होता है, टाटा संस के लिए ये वक्त सितंबर 2025 तक निर्धारित था. इस बीच टाटा संस ने कर्ज चुकाकर खुद को CIC कैटेगरी से बाहर करने और लिस्टिंग से बचने के लिए आवेदन मार्च- 2024 में दिया था. हालांकि 11 सितंबर 2026 को रिजर्व बैंक ने इस अर्जी को खारिज कर दिया, जिससे कंपनी के लिए आईपीओ लाना कानूनी और नियामक मजबूरी बन गया है.
टाटा संस की संपत्ति और वैल्यूवेएशन
टाटा संस की कुल असेट बेस मार्च-2026 तक करीब 2.01 लाख करोड़ रुपये है, जो RBI के 1 लाख करोड़ रुपये के एसेट थ्रेशोल्ड से कहीं अधिक है. एक्सपर्ट्स की मानें तो अगर टाटा संस का आईपीओ आता है, तो कंपनी का मूल्यांकन 7 लाख करोड़ से 11 लाख करोड़ रुपये के बीच हो सकता है. यह भारतीय बाजार के इतिहास का सबसे बड़ा आईपीओ साबित हो सकता है.
टाटा संस में किसकी कितनी हिस्सेदारी है?
टाटा संस में टाटा ट्रस्ट्स (Sir Dorabji & Sir Ratan Tata Trusts) की हिस्सेदारी करीब 66% है. टाटा संस में शापूरजी पालोनजी ग्रुप का हिस्सा 18.37% है, जो लिस्टिंग का समर्थन करते हैं, ताकि वे अपनी हिस्सेदारी आंशिक रूप से बेचकर कर्ज कम कर सकें. इसके अलावा टाटा ग्रुप कंपनियां टीसीएस, टाटा मोटर्स, टाटा स्टील की हिस्सेदारी करीब 13% है. टाटा संस की लिस्टिंग से इन कंपनियों का फायदा होने का अनुमान लगाया जा रहा है.
यही नहीं, एक्सपर्ट्स की मानें से टाटा संस की लिस्टिंग से ग्रुप को नए सेक्टर्स जैसे सेमीकंडक्टर, इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग, इलेक्ट्रिक व्हीकल और टाटा डिजिटल में बड़े निवेश के लिए पूंजी जुटाने में आसानी होगी. जानकारी के मुताबिक टाटा संस के बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स में कुल 6 सदस्य शामिल हैं. केवल नोएल टाटा को छोड़कर सभी ने एन. चंद्रशेखरन के पक्ष में वोट किया है.
1. एन. चंद्रशेखरन: एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर
2. नोएल टाटा: गैर-कार्यकारी निदेशक और टाटा ट्रस्ट्स के अध्यक्ष
3. वेणु श्रीनिवासन: गैर-कार्यकारी निदेशक
4. सौरभ अग्रवाल: कार्यकारी निदेशक और समूह CFO
5. हरीश मनवानी: स्वतंत्र निदेशक
6. अनीता मारंगोली जॉर्ज: स्वतंत्र निदेशक
नोएल टाटा और एन. चंद्रशेखरन में विवाद की वजह
टाटा संस की बोर्ड बैठक में टाटा ट्र्स्ट्स के चेयरमैन नोएल टाटा ने एन. चंद्रशेखरन को 5 साल का विस्तार देने वाले प्रस्ताव के विरोध में वोट किया है. नोएल टाटा का मानना है कि जब चंद्रशेखरन ने खुद पद छोड़ने की घोषणा कर दी थी, तो बोर्ड को नया उत्तराधिकारी खोजना चाहिए था, न कि पुराने फैसले को बदलना चाहिए.
नोएल टाटा का तर्क है कि टाटा समूह के नियम के मुताबिक एग्जीक्यूटिव 65 वर्ष की आयु में रिटायर्ड होते हैं. 5 साल का विस्तार देने से अब चंद्रशेखरन 70 की उम्र तक पद पर बने रहेंगे. क्योंकि अभी चंद्रशेखरन 63 साल के हैं. उनका नया कार्यकाल 2032 में खत्म होगा.
पिछले कुछ महीनों से दोनों के बीच रणनीतिक और वित्तीय मतभेद भी सामने आए थे. नोएल टाटा ने ग्रुप के कुछ नए सेक्टर्स जैसे कि एअर इंडिया, डिजिटल वर्टिकल के वित्तीय प्रदर्शन, भारी कर्ज और खर्चों पर सवाल उठाए थे और सख्त निगरानी की मांग की थी.
नोएल टाटा के बेटे-बेटी भी टाटा ग्रुप में अहम पद पर
नोएल टाटा की बड़ी बेटी लीया टाटा (Leah Tata) इंडियन होटल्स कंपनी लिमिटेड (IHCL) से लंबे समय से जुड़ी हुई हैं. वह IHCL के तहत Gateway Hotels & Resorts की वाइस प्रेसिडेंट और ब्रांड लीडर के रूप में काम कर रही हैं. साथ ही टाटा एजुकेशनल ट्रस्ट और टाटा सोशल वेलफेयर जैसी संस्थाओं में ट्रस्टी हैं.
नोएल टाटा की छोटी बेटी माया टाटा (Maya Tata) ने करियर की शुरुआत टाटा कैपिटल से की और बाद में टाटा डिजिटल में सेवाएं दीं. फिलहाल वो ट्रेंट लिमिटेड (Westside) के ई-कॉमर्स और डिजिटल मार्केटिंग ऑपरेशन्स से जुड़ी हैं. वह जेएन टाटा एंडोमेंट और आरडी टाटा में ट्रस्टी हैं.
नोएल टाटा के बेटे नेविल टाटा (Neville Tata) ट्रेंट लिमिटेड से जुड़े हैं. वह ट्रेंट की सुपरमार्केट सीरीज Star Bazaar के प्रमुख हैं. इसके अलावा उन्होंने ट्रेंट के फैशन ब्रांड Zudio के साथ भी काम किया है. नेविल सर दोराबजी टाटा ट्रस्ट के ट्रस्टी हैं और टाटा इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ स्किल्स के बोर्ड में भी शामिल हैं.
बता दें, टाटा ग्रुप, टाटा संस और टाटा ट्रस्ट तीन अलग-अलग संस्थाएं हैं. जानिए तीनों की भूमिकाएं...
1. टाटा ग्रुप: यह टाटा ब्रांड के तहत काम करने वाली सभी कंपनियों और ब्रांड्स का एक विशाल अम्ब्रेला है. इसके अंतर्गत TCS, टाटा मोटर्स, टाटा स्टील, टाटा पावर, टाइटन, एअर इंडिया और ट्रेंट जैसी 30 से अधिक प्रमुख सार्वजनिक और निजी कंपनियां आती हैं. टाटा ग्रुप का कोई एक कानूनी मालिक नहीं होता है. यह तमाम व्यावसायिक क्षेत्रों में काम करने वाली स्वतंत्र कंपनियों का एक संयुक्त महासंघ है.
2. टाटा संस: यह पूरे टाटा ग्रुप की मुख्य होल्डिंग कंपनी और प्रमोटर है. यह टाटा ग्रुप की लगभग सभी बड़ी कंपनियों में बड़ी शेयरहोल्डिंग रखती है. टाटा ग्रुप की रणनीतिक दिशा तय करना, बड़े व्यावसायिक फैसला लेना, नए क्षेत्रों में पूंजी लगाना और 'टाटा' ब्रांड नाम के इस्तेमाल व लाइसेंस को नियंत्रित करना टाटा संस का ही काम है. फिलहाल यह एक अनलिस्टेड कंपनी है, जिसका स्वामित्व मुख्य रूप से टाटा ट्रस्ट्स के पास है.
3. टाटा ट्रस्ट्स: यह सर दोराबजी टाटा ट्रस्ट और सर रतन टाटा ट्रस्ट जैसे सामाजिक ट्रस्टों का एक संयुक्त निकाय है. टाटा ट्रस्ट्स कोई व्यवसाय नहीं चलाता, बल्कि यह शिक्षा, स्वास्थ्य, ग्रामीण विकास और समाज कल्याण जैसे चैरिटी कामों के लिए समर्पित है. टाटा ट्रस्ट्स के पास टाटा संस की लगभग 66% हिस्सेदारी है. इसके चलते टाटा संस को अपनी कंपनियों से मिलने वाले डिविडेंड का बड़ा हिस्सा टाटा ट्रस्ट्स के पास जाता है, जिसे वे देश हित और सामाजिक कार्यों में खर्च करते हैं.
अमित कुमार दुबे