हफ्ते में दो दिन काम बंदी, प्रोडक्शन घटाया... सूरत की कपड़ा इंडस्ट्री पर महंगे यार्न की मार, संकट में हजारों नौकरियां

सूरत के पावरलूम और वीविंग सेक्टर पर बढ़ती लागत का दबाव अब उत्पादन पर दिखने लगा है. पॉलिएस्टर यार्न की कीमत ₹112 से बढ़कर ₹140 प्रति किलो पहुंचने के बाद करीब 1.5 लाख पावरलूम यूनिट्स ने काम घटाना शुरू किया है. कई यूनिट हफ्ते में दो दिन उत्पादन बंद रख रही हैं, जबकि कुछ ने शिफ्ट कम की है.

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धागे की कीमतें बढ़ने से सूरत में 1.5 लाख पावरलूम ने उत्पादन घटाया और दो दिन काम बंदी लागू की. (File Photo) धागे की कीमतें बढ़ने से सूरत में 1.5 लाख पावरलूम ने उत्पादन घटाया और दो दिन काम बंदी लागू की. (File Photo)

आजतक बिजनेस डेस्क

  • सूरत,
  • 24 अगस्त 2026,
  • अपडेटेड 1:55 PM IST

सूरत के पावरलूम और वीविंग सेक्टर पर बढ़ती लागत का दबाव अब साफ दिखाई देने लगा है. करीब 1.5 लाख पावरलूम यूनिट्स ने उत्पादन कम करना शुरू कर दिया है. कई यूनिट हर हफ्ते दो दिन काम बंद रख रही हैं, जबकि कुछ ने एक शिफ्ट घटा दी है. इंडस्ट्री प्रतिनिधियों के मुताबिक, इस फैसले से 40,000 से 50,000 कामगारों की आय और रोजगार प्रभावित हो सकते हैं. इसकी सबसे बड़ी वजह पॉलिएस्टर यार्न की कीमतों में तेज बढ़ोतरी है.

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पावरलूम और वीविंग सेक्टर से जुड़े लोगों के मुताबिक, पॉलिएस्टर यार्न की कीमत हाल के महीनों में करीब ₹112 प्रति किलो से बढ़कर ₹140 प्रति किलो तक पहुंच गई है. इसके चलते फैब्रिक तैयार करने की लागत काफी बढ़ गई है, लेकिन तैयार ग्रे फैब्रिक की कीमत उसी अनुपात में नहीं बढ़ी. सूरत देश के प्रमुख टेक्सटाइल हब में शामिल है. यहां करीब 7 लाख से 8 लाख वीविंग यूनिट्स हैं, जिनमें से ज्यादातर पावरलूम शिफ्ट में 24 घंटे तक चलते हैं. हालांकि, यार्न और अन्य कच्चे माल की लागत बढ़ने के बावजूद बाजार में तैयार कपड़े की कीमत सीमित ही बढ़ी है.

यार्न महंगा, फैब्रिक का भाव नहीं बढ़ा

वीविंग सेक्टर से जुड़े विष्णुभाई पटेल के मुताबिक, कारोबारियों ने महंगे दाम पर यार्न खरीदा, लेकिन तैयार ग्रे फैब्रिक के लिए बाजार ज्यादा कीमत देने को तैयार नहीं है. उनके मुताबिक, पहले ग्रे फैब्रिक की लागत करीब ₹16 प्रति मीटर थी. यार्न की कीमत में हुई बढ़ोतरी को देखते हुए इसमें करीब ₹5 प्रति मीटर की वृद्धि होनी चाहिए थी, लेकिन बाजार ने केवल ₹1 से ₹1.50 प्रति मीटर तक की बढ़ोतरी स्वीकार की. इससे वीवर्स के लिए मौजूदा कीमतों पर उत्पादन करना मुश्किल हो गया है और मार्जिन पर सीधा दबाव पड़ा है.

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पश्चिम एशिया संकट के बाद बढ़ी लागत

उद्योग प्रतिनिधियों का कहना है कि पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष और दूसरे भू-राजनीतिक घटनाक्रमों के कारण कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव बढ़ा है. इसका असर पॉलिएस्टर यार्न के प्रमुख इनपुट PTA यानी प्यूरिफाइड टेरेफ्थैलिक एसिड और MEG यानी मोनोएथिलीन ग्लाइकोल की कीमतों पर भी पड़ा है. PTA और MEG का उत्पादन कच्चे तेल से जुड़े पेट्रोकेमिकल फीडस्टॉक से होता है. इसलिए इनके दाम में बदलाव का सीधा असर पॉलिएस्टर यार्न की लागत पर पड़ता है.

हालांकि, वीविंग सेक्टर के कुछ प्रतिनिधियों का आरोप है कि यार्न की कीमतों में बढ़ोतरी इनपुट लागत के मुकाबले कहीं ज्यादा रही है. उन्होंने यार्न कंपनियों पर 20-25 फीसदी तक अतिरिक्त बढ़ोतरी का आरोप लगाया है. इन आरोपों पर संबंधित कंपनियों की प्रतिक्रिया सामने आना बाकी है.

पावरलूम यूनिट्स ने कैसे घटाया उत्पादन?

उद्योग प्रतिनिधियों के मुताबिक, पावरलूम यूनिट्स को बंद करने के लिए कोई बाध्यता नहीं है. उत्पादन घटाने का फैसला स्वैच्छिक है. कुछ यूनिट हर हफ्ते दो दिन उत्पादन बंद रख रही हैं, जबकि कुछ ने एक शिफ्ट कम कर दी है. फेडरेशन ऑफ गुजरात वीवर्स एसोसिएशन (FOGWA) ने भी अगले एक महीने तक उत्पादन धीमा रखने की सलाह दी है. संगठन का मानना है कि इससे यार्न की कीमतों पर दबाव कम करने और बाजार में मांग-आपूर्ति का संतुलन बनाने में मदद मिल सकती है.

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हजारों कामगारों पर पड़ रहा बुरा असर

सूरत के वीविंग सेक्टर में बड़ी संख्या में लोग रोजगार पाते हैं. उद्योग प्रतिनिधियों के मुताबिक, उत्पादन में कटौती का असर करीब 40,000 से 50,000 कामगारों पर पड़ सकता है. खास चिंता उन मजदूरों को लेकर है, जिनकी कमाई उपलब्ध काम और शिफ्ट पर निर्भर करती है. उत्पादन कम होने से उनके काम के दिन और आय दोनों प्रभावित हो सकते हैं. उद्योग पहले से ही श्रमिकों की कमी का सामना कर रहा है. प्रतिनिधियों के मुताबिक, उत्तर प्रदेश और ओडिशा से आने वाले कई प्रवासी मजदूर अभी पूरी तरह वापस नहीं लौटे हैं.

इंडस्ट्री ने सरकार से की राहत की मांग

फेडरेशन ऑफ गुजरात वीवर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष अशोक जिरावाला के मुताबिक, संगठन और अन्य उद्योग निकायों ने सरकार के सामने अपनी मांगें रखी हैं. उन्होंने यार्न की कीमतों में कथित कृत्रिम बढ़ोतरी पर कार्रवाई की मांग की है. इंडस्ट्री का कहना है कि अगर कच्चे तेल की कीमत बढ़ती है, तो यार्न की कीमत में वृद्धि समझी जा सकती है. लेकिन कच्चे तेल की कीमतों में उसी अनुपात में बढ़ोतरी नहीं होने के बावजूद यार्न के दाम तेजी से बढ़ना चिंता का विषय है. वीविंग सेक्टर ने यार्न और उसके प्रमुख इनपुट की लागत कम करने के लिए कस्टम ड्यूटी में राहत देने की मांग भी की है.

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