भारत में UPI का एक दशक बीत चुका है. शुरुआत में लोग इसके इस्तेमाल से हिचक रहे थे. धीरे-धीरे सिस्टम समझ में आया, और फिर कोरोना काल आ गया. लॉकडाउन में UPI लेन-देन का सबसे सुलभ विकल्प बन गया. उसके बाद UPI ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा है. आज UPI एक जरूरत के साथ-साथ आम आदमी की मजबूरी भी बन गई है. अधिकतर लोग कैश रखना लोग भूल चुके हैं, सब्जी खरीदने से लेकर ऑनलाइन शॉपिंग तक में UPI का इस्तेमाल हो रहा है.
आज डिजिटल पेमेंट घर-घर तक पहुंच चुका है. भारत में यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (UPI) सिस्टम की दुनियाभर में तारीफ हो रही है. UPI को सुलभ बनाने में सरकार की भी बड़ी भूमिका रही है. डिजिटल भुगतान और UPI को बढ़ावा देने के लिए सरकार ने 1 जनवरी 2020 को UPI और RuPay डेबिट कार्ड पर MDR को शून्य कर दिया था.'ज़ीरो-MDR' पॉलिसी ने छोटे-बड़े दुकानदारों के लिए UPI को बिल्कुल मुफ्त बना दिया.
लेकिन अब देश में UPI पर मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) की वापसी को लेकर बहस तेज हो गई है. बैंकों और फिनटेक कंपनियों की सर्वर लागत और घाटे को देखते हुए सरकार अब चुनिंदा बड़े मर्चेंट ट्रांजेक्शन पर सीमित शुल्क यानी MDR लागू करने की कानूनी रूपरेखा तैयार कर रही है. आखिर सरकार को क्यों ये कदम उठाना पड़ रहा है, क्या कोई बाहरी दबाव है, इससे आम आदमी पर क्या असर पड़ेगा?
आम लोगों पर इसका क्या असर पड़ेगा?
हालांकि इस बीच सरकार ने साफ कर दिया है कि आम उपभोक्ताओं के लिए UPI से लेन-देन हमेशा की तरह मुफ्त रहेगा. यानी आम आदमी पर इसका कोई असर नहीं पड़ेगा. एक शख्स से दूसरे शख्स (P2P) को पैसे भेजने या छोटे दुकानदारों को भुगतान करने पर कोई शुल्क नहीं लगेगा. यह केवल बड़े व्यापारियों/स्टोर के ट्रांजेक्शन पर लग सकता है. एक लाइन में कहें तो MDR व्यापारी पर लगता है. ग्राहक को इससे कोई लेना-देना नहीं है.
इसी कड़ी में पिछले दिनों वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने संसद में साफ कर दिया कि MDR का शुल्क केवल व्यापारियों पर लागू होगा. आम आदमी के लिए UPI का उपयोग पूरी तरह से निशुल्क ही रहेगा. साथ ही उन्होंने कहा कि MDR लागू करने या उसकी दर तय करने का कोई अंतिम फैसला नहीं लिया गया है. NPCI के तहत काम करने वाली 'UPI and Services Steering Committee' इस पर विचार करेगी.
सरकार का तर्क है कि MDR लागू होने से डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर मजबूत होगा और पेमेंट एग्रीगेटर कंपनियों को नया निवेश के लिए आर्थिक मदद मिलेगी. क्योंकि बैंक और फिनटेक कंपनियों को करोड़ों UPI ट्रांजेक्शन संभालने के लिए सर्वर और साइबर सुरक्षा पर बहुत बड़ा खर्च करना पड़ता है. MDR जीरो होने के कारण इन कंपनियों और बैंकों का बिजनेस मॉडल प्रभावित हुआ है, जिससे डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर में नया निवेश करना मुश्किल हो रहा है. इसलिए MDR से होने वाली आय का मुख्य उद्देश्य बैंकों और फिनटेक कंपनियों को मजबूत बनाना है.
बता दें, MDR वह शुल्क होता है, जो कोई व्यापारी अपने ग्राहकों से डिजिटल भुगतान स्वीकार करने के लिए बैंकों और पेमेंट सर्विस प्रोवाइडर जैसे कि PhonePe, Paytm, Google Pay को सेवा शुल्क के रूप में देता है.
कितनी कमाई हो सकती है? ब्रोकरेज फर्म Jefferies का अनुमान है कि अगर 2000 रुपये से अधिक के बड़े मर्चेंट ट्रांजेक्शन पर 0.15% से 0.30% तक MDR लागू होता है, तो इसका सबसे बड़ा हिस्सा मर्चेंट को जोड़ने वाली कंपनियों को मिलेगा. इससे Paytm, PhonePe और Google Pay जैसी पेमेंट एग्रीगेटर कंपनियों के राजस्व और वित्तीय सेहत में भारी सुधार होगा.
इस बीच आर्थिक थिंक टैंक ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव (GTRI) का कहना है कि भारत को अपनी डिजिटल पेमेंट सिस्टम को लेकर किसी बाहरी दबाव में आने की जरूरत नहीं है. GTRI के मुताबिक UPI और RuPay जैसे भारतीय पेमेंट सिस्टम ने देश में डिजिटल ट्रांजेक्शन को एक नई दिशा दी है. ऐसे में विदेशी कंपनियों के हितों को ध्यान में रखकर इसमें बदलाव करना सही नहीं होगा.
अब सरकार के पास होगा अधिकार?
दरअसल, GTRI का ये बयान तब आया है, जब लोकसभा में 'पेमेंट एंड सेटलमेंट सिस्टम्स एक्ट- 2007' में संशोधन से जुड़ा विधेयक पारित हो चुका है. इस संशोधन के बाद केंद्र सरकार को ये अधिकार मिल जाएगा कि किस इलेक्ट्रॉनिक पेमेंट मोड पर शुल्क लगेगा और कौन मुफ्त रहेगा. GTRI की सलाह है कि डिजिटल इंफ्रा को मजबूत करने के लिए सरकार दूसरे रास्ते से फंड जुटाने की कोशिश करे. सभी कारोबारियों पर MDR लागू करना ठीक नहीं होगा. थिंक टैंक ने सुझाव दिया है कि सरकार बजट में इसका प्रावधान करे, या फिर बड़े व्यावसायिक लेनदेन पर सीमित शुल्क लगाने जैसे विकल्पों पर विचार कर सकती है.
विदेशी एंगल के पीछे GTRI ने अपनी रिपोर्ट में अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि (USTR) की 2026 नेशनल ट्रेड एस्टीमेट रिपोर्ट का जिक्र किया है. इस रिपोर्ट में भारत के UPI और RuPay फ्रेमवर्क के साथ-साथ ब्राजील के पेमेंट सिस्टम Pix की भी आलोचना की गई है. अमेरिका का तर्क है कि ऐसे घरेलू डिजिटल भुगतान सिस्टम विदेशी भुगतान कंपनियों को बराबरी का अवसर नहीं देते.
हालांकि USTR के आरोपों में दम नहीं हैं, क्योंकि भारत के UPI मार्केट शेयर में अमेरिकी कंपनियां PhonePe और Google Pay का लगभग 80% से अधिक हिस्सा है. जीरो-MDR नीति के कारण इन दिग्गज टेक कंपनियों को भारत में खरबों रुपये के UPI इंफ्रास्ट्रक्चर, सर्वर और सेफ्टी पर भारी लागत उठानी पड़ रही थी, जबकि राजस्व शून्य था. MDR लागू होने हर साल अरबों रुपये की सीधी कमाई शुरू हो सकती है.
इसके अलावा अमेरिकी कंपनियां Visa और Mastercard भी लंबे समय से भारत सरकार की Zero-MDR नीति पर चिंता जताते रहे हैं. क्योंकि क्रेडिट और डेबिट कार्ड पर MDR होने के कारण अधिकतर व्यापारी मुफ्त UPI को प्राथमिकता देते हैं. UPI पर MDR लागू होने से डिजिटल भुगतानों के बीच का यह अंतर कम होगा, Visa और Mastercard का कारोबार बढ़ सकता है, यानी UPI पर MDR लगने से मर्चेंट कार्ड पेमेंट पर ज्यादा फोकस करेंगे.
अमित कुमार दुबे