73 साल के विश्वनाथ से 93 साल के रामबृक्ष तक... बक्सर में 7 उम्रदराज कैदियों की रिहाई की पूरी कहानी

कोई 73 साल का था, कोई 80 का, कोई 84 का और सबसे बुजुर्ग 93 साल का. ये वो लोग थे, जिन्होंने जिंदगी के कई साल जेल की सलाखों के पीछे काटे थे. लेकिन 2 अक्टूबर को बक्सर जेल के बाहर कहानी बदल गई. परिवार सामने था, आंखों में आंसू थे और बरसों का इंतजार खत्म होने वाला था. दादा को देखते ही पोती रो पड़ी... सात उम्रदराज कैदियों को गांधी जयंती पर रिहाई मिली.

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जेल से रिहा होने के बाद दादा से मिलते ही रो पड़ी पोती. (Photo: ITG) जेल से रिहा होने के बाद दादा से मिलते ही रो पड़ी पोती. (Photo: ITG)

पुष्पेन्द्र कुमार पाण्डेय

  • बक्सर,
  • 03 अक्टूबर 2026,
  • अपडेटेड 9:29 AM IST

बिहार के बक्सर में 2 अक्टूबर का दिन बाकी दिनों से कुछ अलग था. केंद्रीय कारा के बाहर कुछ परिवार ऐसे चेहरों का इंतजार कर रहे थे, जिन्हें उन्होंने सालों से जेल की सलाखों के पीछे देखा था. किसी के लिए यह मुलाकात सिर्फ मिलने की नहीं, बल्कि इंतजार के खत्म होने की थी. फिर जेल का दरवाजा खुला और एक-एक कर सात उम्रदराज कैदी बाहर आए. किसी की उम्र 70 साल से ज्यादा थी, तो कोई 80 पार कर चुका था.

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सबसे बुजुर्ग रामबृक्ष कोइरी की उम्र 93 साल है. उनके साथ हरिवंश राम 84 साल, रामाश्रय कोइरी 80 साल, सत्य नारायण राम 83 साल, विश्वनाथ राम 73 साल, विश्वनाथ यादव 73 साल, हंसराज चामर 81 साल और बलराम सिंह 78 साल की उम्र में रिहा हुए. इन सातों ने उम्र का एक बड़ा हिस्सा जेल में बिताया. अब 2 अक्टूबर को बिहार सरकार के आदेश के बाद उनके परिवारों के लिए वह दिन आया, जिसका इंतजार शायद सालों से था.

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इन सात रिहाइयों के बीच एक तस्वीर ने वहां मौजूद लोगों को भावुक कर दिया. अपने दादा से मिलने पहुंची पोती जैसे ही उनके सामने आई, उसकी आंखों से आंसू निकल पड़े. पोती का कहना था कि वह जब भी मौका मिलता था, अपने दादा से मिलने आती थी. उनकी रिहाई के लिए उसने कई बार कोशिश भी की, लेकिन सफलता नहीं मिली. इस बार जब उसे पता चला कि दादा रिहा होने वाले हैं तो खुशी संभाले नहीं संभली.

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दादा से मिलते ही पोती रो पड़ी. यह आंसू सिर्फ खुशी के नहीं थे. इनमें उन वर्षों का इंतजार भी था, जो परिवार ने उनके बिना गुजारे थे. उसने बिहार सरकार का धन्यवाद किया. उसका कहना था कि अब दादा घर पर रहेंगे और पूरा परिवार मिलकर उनकी सेवा करेगा.

बक्सर केंद्रीय कारा से रिहा किए गए सात कैदियों की उम्र काफी हो चुकी है. रोहतास जिले के हरिवंश राम 84 साल के हैं. रामबृक्ष कोइरी 93 साल के हैं. रामाश्रय कोइरी की उम्र 80 साल है और सत्य नारायण राम 83 साल के हैं. पटना जिले से विश्वनाथ राम और विश्वनाथ यादव, दोनों की उम्र 73 साल है.

पश्चिमी चंपारण के हंसराज चामर 81 साल के हैं, जबकि सहरसा के बलराम सिंह 78 साल के हैं. इनमें से चार कैदी बक्सर केंद्रीय कारा में रहकर आजीवन कारावास की सजा काट रहे थे. वहीं तीन कैदी ओपन जेल में अपनी सजा पूरी कर रहे थे. यानी 2 अक्टूबर की सुबह सिर्फ जेल के दरवाजे नहीं खुले थे. सात परिवारों के लिए घर का एक बंद दरवाजा भी जैसे फिर से खुल गया था.

बिहार सरकार की ओर से उन कैदियों की रिहाई की प्रक्रिया शुरू की गई है, जिन्होंने 14 साल या उससे अधिक की सजा पूरी कर ली है और जेल में उनका आचरण अच्छा रहा है. रिहाई का आधार सिर्फ सजा की अवधि पूरी होना नहीं बताया गया है. जेल में कैदी का आचरण और उसके व्यक्तित्व में आया बदलाव भी प्रक्रिया का हिस्सा है. ऐसे कैदियों को सुधरे हुए व्यक्तित्व और अच्छे आचरण की कैटेगरी में आने के बाद रिहाई का मौका दिया जाता है. इसी के तहत 2 अक्टूबर को बक्सर केंद्रीय कारा से सात कैदियों को रिहा किया गया.

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जेल की जिंदगी से घर की जिंदगी तक

जेल में लंबे समय तक रहने के बाद बाहर की दुनिया कई लोगों के लिए बदल चुकी होती है. जिन चेहरों को उन्होंने जेल जाने के वक्त देखा था, वे उम्र के साथ बदल चुके होते हैं. बच्चे बड़े हो जाते हैं, पोते-पोतियां जवान हो जाते हैं और परिवार की जिम्मेदारियां एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुंच जाती हैं. ऐसे में जब कोई उम्रदराज कैदी वर्षों बाद जेल से बाहर निकलता है तो उसके लिए सिर्फ जेल से बाहर आना ही बड़ी बात नहीं होती. असली पल तब आता है, जब सामने परिवार का कोई सदस्य खड़ा होता है.

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बक्सर में भी यही हुआ. कोई अपने पिता से मिला, कोई दादा से. परिवार के लोगों की आंखों में खुशी थी और चेहरे पर वर्षों का इंतजार था. एक तरफ 93 साल के रामबृक्ष कोइरी जैसे बुजुर्ग थे, जिन्होंने अपनी जिंदगी के बेहद लंबे हिस्से को जेल में बिताया. दूसरी तरफ 73 साल के विश्वनाथ राम और विश्वनाथ यादव जैसे कैदी थे, जिनके लिए उम्र के इस पड़ाव पर घर लौटना एक नया अध्याय शुरू होने जैसा था.

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2 अक्टूबर को क्यों हुआ रिहाई का फैसला?

2 अक्टूबर यानी गांधी जयंती पर इन कैदियों की रिहाई हुई. यह दिन देशभर में अहिंसा और बदलाव के संदेश से जुड़ा है. बिहार सरकार की ओर से अच्छे आचरण और सुधरे हुए व्यक्तित्व वाले ऐसे कैदियों की रिहाई की प्रक्रिया के तहत बक्सर के सात कैदियों को भी रिहा किया गया. जेल प्रशासन की ओर से रिहाई की प्रक्रिया पूरी होने के बाद जब ये कैदी बाहर आए तो परिवार के लोगों ने उनका स्वागत किया.

सबसे ज्यादा भावुक कर देने वाला पल उस पोती और उसके दादा का मिलना रहा. लंबे इंतजार के बाद सामने खड़े दादा को देखकर पोती खुद को रोक नहीं सकी. आंसू रुक नहीं रहे थे, लेकिन इस बार वजह गम नहीं, खुशी थी. सात परिवारों के लिए 2 अक्टूबर सिर्फ कैलेंडर की एक तारीख नहीं रहा. यह वह दिन बन गया, जब घर के बुजुर्ग फिर घर लौटे. 

73 साल के विश्वनाथ से लेकर 93 साल के रामबृक्ष तक, इन सात उम्रदराज कैदियों की कहानी एक जैसी नहीं है. लेकिन 2 अक्टूबर ने इन सभी कहानियों में एक बात जोड़ दी- लंबे इंतजार के बाद घर लौटने की कहानी. और शायद इसीलिए बक्सर केंद्रीय कारा के बाहर उस दिन सिर्फ सात कैदी नहीं निकले. उनके साथ सात परिवारों की बरसों पुरानी प्रतीक्षा भी जेल के दरवाजे से बाहर आ गई.

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