विदर्भ का एकमात्र हिल स्टेशन चिखलदरा अब स्ट्रॉबेरी की खेती के लिए मशहूर हो रहा है. यहां के किसान पारंपरिक फसल जैसे चना और गेहूं को छोड़कर नकदी फसल स्ट्रॉबेरी उगा रहे हैं. इससे उनकी आमदनी कई गुना बढ़ गई है. ठंडा मौसम और बढ़ता पर्यटन इस बदलाव के मुख्य कारण हैं.
स्ट्रॉबेरी की खेती की शुरुआत का श्रेय मोथा गांव के किसान साधुराम पाटिल को जाता है. उन्होंने सबसे पहले पारंपरिक खेती छोड़कर स्ट्रॉबेरी का प्रयोग किया. उनका प्रयोग सफल रहा तो आसपास के किसान भी इसकी ओर आकर्षित हुए. अब अमरावती जिले के चिखलदरा क्षेत्र में कई किसान स्ट्रॉबेरी उगा रहे हैं.
किसान गजानन येवले ने इस साल पहली बार स्ट्रॉबेरी की खेती शुरू की है. पहले वे चना-गेहूं जैसी फसलें उगाते थे, जिनसे ज्यादा कमाई नहीं होती थी. अब स्ट्रॉबेरी से उन्हें अच्छी आमदनी हो रही है. उन्होंने बताया कि पहले पारंपरिक खेती में ज्यादा फायदा नहीं था, लेकिन स्ट्रॉबेरी से अब अच्छी कमाई हो रही है. पर्यटक सीधे खेत से खरीदते हैं, जिससे हमें ज्यादा मुनाफा मिलता है.
कृषि विभाग ने चिखलदरा के ठंडे मौसम को देखते हुए महाबलेश्वर की तरह स्ट्रॉबेरी उगाने का सुझाव दिया था. शुरुआती प्रयोग सफल होने के बाद यह खेती पूरे इलाके में फैल गई है. साधुराम पाटिल बताते हैं कि शुरुआत में प्रशासन से सब्सिडी मिली थी, अब नहीं मिल रही है. फिर भी स्ट्रॉबेरी की खेती फायदेमंद साबित हो रही है.
खेत से सीधी बिक्री, बिचौलिए नहीं
चिखलदरा के किसान खेत में ही स्ट्रॉबेरी पैक करके बेचते हैं. साधुराम पाटिल कहते हैं कि हम रोजाना 4,000 से 5,000 रुपये की स्ट्रॉबेरी बेचते हैं. कभी-कभी यह 7,000 रुपये तक की स्ट्रॉबेरी बिक जाती हैं. बिचौलियों की जरूरत नहीं पड़ती, हमें पूरा मुनाफा मिलता है.
स्ट्रॉबेरी का सीजन नवंबर-दिसंबर से शुरू होकर मार्च के अंत या अप्रैल के पहले सप्ताह तक चलता है. यहां का तापमान विदर्भ के बाकी इलाकों से कम रहता है, जिससे स्ट्रॉबेरी का स्वाद और गुणवत्ता बेहतर होती है. मार्च-अप्रैल में हल्की गर्मी पड़ने पर इसका खट्टा-मीठा स्वाद और भी बढ़ जाता है, जो पर्यटकों को बहुत पसंद आता है.
पर्यटन से मिला अतिरिक्त फायदा
चिखलदरा में बढ़ते पर्यटन का सीधा फायदा किसानों को मिल रहा है. पर्यटक खेतों से ताज़ी स्ट्रॉबेरी खरीदकर ले जाते हैं. यहां बन रहे देश के बड़े स्काईवॉक प्रोजेक्ट से पर्यटकों की संख्या और बढ़ने की उम्मीद है. इससे किसानों की आमदनी में और इजाफा होने वाला है.
ढाई से साढ़े तीन महीने के सीजन में किसान लाखों रुपये कमा रहे हैं. हालांकि, मौसम खराब होने पर नुकसान का खतरा भी रहता है. इसके बावजूद ज्यादातर किसान इस नकदी फसल से खुश हैं.