मिडिल ईस्ट में ईरान के साथ बढ़ते तनाव के बीच अमेरिका ने अपनी सैन्य मौजूदगी को बड़े स्तर पर बढ़ा दिया है. जानकारी के मुताबिक, अमेरिका ने क्षेत्र में 3500 से ज्यादा सैनिक तैनात किए गए हैं और हालात लगातार बिगड़ते जा रहे हैं. अमेरिकी सेंट्रल कमांड (CENTCOM) ने पुष्टि की है कि आधुनिक युद्धपोत यूएसएस त्रिपोली अपने निर्धारित ऑपरेशनल जोन में पहुंच चुका है, जिसमें लगभग 2500 मरीन सैनिक सवार हैं.
बता दें कि युद्धपोत यूएसएस त्रिपोली F-35 स्टील्थ फाइटर जेट और ओस्प्रे जैसे एडवांस एयरक्राफ्ट ऑपरेट करने में सक्षम है. इसको पहले जापान में तैनात किया गया था, लेकिन करीब दो हफ्ते पहले इसे मिडिल ईस्ट भेजा गया. इसके अलावा USS Boxer और सैन डिएगो से अन्य नौसैनिक यूनिट्स को भी क्षेत्र में भेजा जा रहा है.
अमेरिकी सेंट्रल कमांड के अनुसार, 28 फरवरी से शुरू हुए ऑपरेशन एपिक फ्यूरी के तहत अब तक 11,000 से ज्यादा ठिकानों पर हमले किए जा चुके हैं. इससे साफ है कि लड़ाई बड़े स्तर पर चल रही है. इस बीच तनाव तब और बढ़ गया जब ईरान ने सऊदी अरब के प्रिंस सुल्तान एयर बेस पर बैलिस्टिक मिसाइल और ड्रोन से हमला किया. इस हमले में कम से कम 10 अमेरिकी सैनिक घायल हुए हैं.

अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने कहा है कि अमेरिका बिना जमीनी सैनिक उतारे अपने लक्ष्य हासिल करना चाहता है. हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को बदलते हालात के लिए तैयार रहना होगा.
वहीं अब हालात और जटिल हो गए जब यमन के हूती विद्रोहियों ने भी इस संघर्ष में एंट्री कर ली. हूती समूह ने इजरायल की ओर मिसाइल दागने का दावा किया है. इससे बाब-अल-मंडेब स्ट्रेट और स्वेज नहर जैसे अहम समुद्री रास्तों की सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ गई है. इस जंग का असर अब वैश्विक व्यापार और हवाई मार्गों पर भी दिखने लगा है. कई देशों को वैकल्पिक रास्ते तलाशने पड़ रहे हैं क्योंकि स्ट्रेट ऑफ होर्मुज लगभग बंद हो चुका है.
कूटनीतिक प्रयास भी फिलहाल नाकाम होते दिख रहे हैं. अमेरिका की ओर से दूत स्टीव विटकॉफ ने सीजफायर का प्रस्ताव दिया था, जिसमें ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर रोक और समुद्री रास्ते खोलने की बात थी. लेकिन ईरान ने इसे खारिज कर दिया और बदले में मुआवजे और अपनी संप्रभुता की मान्यता की मांग रखी.