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जंग रुकी, पर क्या समुद्री रास्ते सुरक्षित हैं? शिपिंग इंडस्ट्री ने जताई चिंता

अमेरिका और ईरान के बीच सीजफायर से बाजारों ने राहत की सांस तो ली है, पर शिपिंग कंपनियां अभी भी फूंक-फूंक कर कदम रख रही हैं. स्ट्र्रेट ऑफ होर्मुज में जहाज भेजने से पहले कंपनियां हालात को परखना चाहती हैं. अभी जहाजों की आवाजाही धीरे-धीरे ही शुरू होगी और असली भरोसा तभी बनेगा जब समुद्र में लंबे समय तक सफर सुरक्षित बना रहे.

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ग्लोबल ट्रेड के लिए अहम है स्ट्र्रेट ऑफ होर्मुज (File Photo)
ग्लोबल ट्रेड के लिए अहम है स्ट्र्रेट ऑफ होर्मुज (File Photo)

दुनिया के लिए खबर ये है कि अमेरिका और ईरान के बीच युद्धविराम हो गया है. जैसे ही ये खबर आई, बाजारों में रौनक लौट आई, तेल की कीमतें गिर गईं और शेयर बाजार भी हरे निशान पर खुले. लेकिन क्या हेडलाइन बदल जाने से समुद्र में तैरते जहाजों की सुरक्षा भी बदल गई? शिपिंग इंडस्ट्री के लिए मामला सिर्फ खबरों का नहीं है, बल्कि भरोसे का है. सच तो ये है कि जहाज खबरों पर नहीं, बल्कि सुरक्षा के पक्के यकीन पर चलते हैं. और फिलहाल, वो यकीन अभी पूरी तरह लौटा नहीं है.

इस पूरे विवाद ने दुनिया को एक बार फिर याद दिला दिया कि हमारा ग्लोबल ट्रेड कितना नाजुक है. दुनिया का करीब 20% कच्चा तेल और गैस जिस स्ट्र्रेट ऑफ होर्मुज से होकर गुजरती है, वह अचानक से एक खतरनाक इलाका बन गया था. जब जंग का साया मंडराता है, तो सिर्फ जहाज ही नहीं रुकते, बल्कि सब कुछ महंगा हो जाता है. युद्ध के डर से जहाजों का बीमा आसमान छूने लगा, माल ढोने का किराया बढ़ गया और जो जहाज समुद्र में थे, उनके क्रू मेंबर्स की जान सांस में अटकी रही.

शिपिंग की दुनिया में रास्ता पूरी तरह बंद होने की जरूरत नहीं होती, सिर्फ शक ही काफी है. अगर जहाज के मालिक को जरा भी शक हुआ कि रास्ते में हमला हो सकता है, तो वह अपना करोड़ों का जहाज और उसमें लदा सामान उस रास्ते पर नहीं भेजेगा. यही वजह है कि युद्धविराम के बाद भी शिपिंग कंपनियां अभी 'रुको और देखो' की नीति अपना रही हैं. उनके लिए सिर्फ शांति की घोषणा काफी नहीं है, उन्हें यह देखना है कि क्या उनके जहाज बिना किसी डर के वहां से गुजर पा रहे हैं.

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क्यों अभी भी सावधानी बरत रहे मालिक?

शिपिंग कंपनियों के मालिक इस युद्धविराम को लेकर भावुक नहीं, बल्कि बहुत ही हिसाब-किताब वाले फैसले ले रहे हैं. वे अभी तुरंत अपने सारे जहाज होर्मुज के रास्ते नहीं भेज देंगे. वे कुछ चीजों का इंतजार कर रहे हैं. सबसे पहले तो ये कि क्या युद्ध के जोखिम वाला बीमा प्रीमियम कम होता है? दूसरा ये कि क्या नौसेना की तरफ से ये हरी झंडी मिलती है कि अब खतरा टल गया है? जब तक ये संकेत नहीं मिलते, तब तक जहाज धीरे-धीरे ही लौटेंगे. यह वैसा ही है जैसे किसी सड़क पर दंगा होने के बाद पुलिस के कहने पर भी लोग अपनी गाड़ियां तुरंत बाहर नहीं निकालते, वे पहले देखते हैं कि सब सच में शांत है या नहीं.

सिर्फ जहाजों के मालिकों की बात नहीं है, असली तनाव तो उन नाविकों के लिए होता है जो उन जहाजों पर काम करते हैं. उनके लिए हेडलाइन में युद्धविराम लिख देना काफी नहीं है. उन्होंने वहां जो डर और तनाव महसूस किया है, वह रातों-रात गायब नहीं होता. उनका भरोसा तब लौटेगा जब वे खुद कई बार उस रास्ते से बिना किसी हमले या खतरे के गुजरेंगे. समुद्र में सुरक्षा सिर्फ बोलने से नहीं, बल्कि शांति के अनुभव से आती है.

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देखा जाए तो यह युद्धविराम एक छोटी सी खिड़की की तरह है. इससे रुका हुआ सामान धीरे-धीरे आगे बढ़ना शुरू होगा और सप्लाई चेन थोड़ी सामान्य होगी. लेकिन क्या ये हमेशा के लिए ठीक हो गया है? शायद नहीं. शिपिंग इंडस्ट्री की याददाश्त बहुत लंबी होती है. उन्हें पता है कि अगर आज शांति है, तो कल फिर से कोई चिंगारी भड़क सकती है. इसीलिए इंडस्ट्री अब सिर्फ शांति समझौतों पर निर्भर नहीं रहना चाहती. वे चाहते हैं कि ऐसे समुद्री रास्तों को हमेशा के लिए सुरक्षित बनाया जाए.

इसका असली समाधान सिर्फ युद्धविराम नहीं है. इसके लिए जरूरी है कि अमेरिका, ईरान और बाकी देशों के बीच बातचीत लगातार चलती रहे ताकि अनिश्चितता खत्म हो. साथ ही, दुनिया के इन खास रास्तों पर नौसेनाओं का तालमेल इतना मजबूत हो कि कोई भी जहाज बिना डरे वहां से निकल सके. एक और बड़ी बात जो अब सोची जा रही है, वो ये कि क्या व्यापार के लिए कोई और वैकल्पिक रास्ते खोजे जा सकते हैं? क्योंकि अगर एक रास्ता बंद हो, तो दुनिया की रफ्तार रुकनी नहीं चाहिए. अंत में बात वही है कि सिर्फ लिख देने से शांति नहीं आती, शांति तब मानी जाएगी जब जमीन या समुद्र पर हालात सच में बदल जाएं और लोगों का डर खत्म हो जाए. 
 

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