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सऊदी ने बना रखा है स्ट्रेट ऑफ होर्मुज का ऑप्शन, लेकिन यहां ईरान से अलग एक और दुश्मन खड़ा है!

सऊदी अरब ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में आज पैदा हुई स्थिति को काफी समय पहले भांप लिया था. इसका ख्याल रखते हुए सऊदी ने 1981 में ही 1200 किलोमीटर लंबी पाइपलाइन देश के बीचो बीच बनाई और तेल का निर्यात फारस की खाड़ी के बजाय लाल सागर से करने लगा. लेकिन सऊदी का ये उपाय भी फूलफ्रुफ नहीं था. यहां भी सऊदी का एक दुश्मन डेरा डाले बैठे था.

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सऊदी अरब का ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन फारस की खाड़ी और लाल सागर को जोड़ता है. (Photo: ITG)
सऊदी अरब का ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन फारस की खाड़ी और लाल सागर को जोड़ता है. (Photo: ITG)

ईरान-इराक युद्ध अपने उच्चतम स्तर पर था. ईरान बार बार धमकी दे रहा था कि अगर युद्ध में कोई भी देश इराक का साथ देगा या अमेरिका हस्तक्षेप करेगा तो वो स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को पूरी तरह बंद कर देगा. यानी कि दुनिया को तेल की सप्लाई पूरी तरह से बंद. ये बात आज से कोई 44-45 साल पहले की है. 1980 से 1988 के बीच ईरान और इराक में भिड़ंत हुई थी. आज की तरह तब भी फारस की खाड़ी और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में तेल टैंकरों पर हमले हो रहे थे. 

इस माहौल में सऊदी को डर था कि अगर होर्मुज बंद हो गया तो उसका सारा तेल निर्यात रुक जाएगा और अर्थव्यवस्था चरमरा जाएगी क्योंकि उसका ज्यादातर कच्चा तेल अबक़ीक़ और घवार जैसे पूर्वी प्रांत के फील्ड्स में निकलता था और फारस की खाड़ी में ही जहाजों में लोड होता था. 

इसी खतरे को देखते हुए सऊदी सरकार ने 1981 में एक निर्णायक फैसला लिया. इस फैसले का मकसद ईरान की दादागिरी को पूरी तरह से खत्म कर देना और स्ट्रेट ऑफ होरमुज को बायपास कर एक ऐसा पाइपलाइन बनाना जिससे सऊदी का एक बूंद तेल भी होर्मुज से होकर न गुजरे और उसका तेल व्यापार भी निर्बाध चलता रहे. 

सऊदी ने मुल्क के बीचो बीच पाइपलाइन से लकीर खींच दी

सऊदी अरब ने अपने देश के लगभग बीचो बीच पाइपलाइन से लकीर खींच दी. नीचे की एक तस्वीर को देखिए. सऊदी ने तय किया कि उसके पूर्वी राज्य अबकीक से कच्चे तेल को 12 किलोमीटर दूर लाल सागर के यनबू पोर्ट तक पाइप से ले जाया जाए. वहां से फिर तेल को टैंकरों में लोड किया जाए. इसके बाद इन टैंकरों को  यूरोप, अफ्रीका या एशिया भेजा जाए. 

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सऊदी ने इस पाइपलाइन को अबकीक को इसलिए चुना क्योंकि उसका ज्यादातर कच्चा तेल अबकीक और घवार जैसे पूर्वी प्रांत के ऑयल फील्ड्स में ही निकलता है. इसके अलावा अबकीक के बगल में ही कतर और बहरीन मौजूद से इससे अबकीक का रणनीतिक महत्व और भी ज्यादा हो जाता है. 
 
इस महात्वाकांक्षी प्रोजेक्ट की शुरुआत 1981 में हुई.  इस पाइपलाइन को पेट्रोलाइन भी कहते हैं और इसे बनाने वाली कंपनी पेट्रोमिन थी. लेकिन बाद में इसे सऊदी की सरकारी तेल कंपनी अरामको ने ले लिया. 

सऊदी ने युद्धस्तर पर इस पाइपलाइन का निर्माण किया और 1981 में ये शुरू हुआ और 1982 में इसे चालू कर दिया गया. इस पाइपलाइन की लंबाई 1201 किलोमीटर है. ये पाइपलाइन स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को पूरी तरह से बायपास कर देता है. 

लागत, लंबाई और डायमीटर

ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन की मूल निर्माण लागत 1981 में लगभग 2.5 बिलियन डॉलर थी. 2026 में ये राशि लगभग 850 करोड़ डॉलर बनती है.ये उस समय का सबसे बड़े इंजीनियरिंग प्रोजेक्ट्स में से एक था. 1201 किलोमीटर लंबी ये पाइपलाइन दरअसल दो पाइपलाइन है. एक की गोलाई 56 इंच है और दूसरे की 48 इंच. शुरू में 56 इंच वाले पाइप से मुख्य रूप से कच्चा तेल ले जाया जाता था और 48 इंच वाले पाइप LNG के लिए था. लेकिन 2014 के बाद दोनों को कच्चा तेल के लिए इस्तेमाल किया जाने लगा.

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शुरू में इस पाइपलाइन क्षमता कम थी लेकिन बाद में इसे बढ़ाकर 5 मिलियन बैरल प्रति दिन किया गया है. 

सऊदी ने दुनिया को दिया संदेश 

इस तेल पाइपलाइन को बनाकर सऊदी ने दुनिया को गल्फ देशों का विश्वसनीय तेल निर्यातक के रूप में स्थापित किया. आज की तरह तब भी युद्ध में ईरान ने दिखा दिया था कि वो चाहे तो गल्फ की शिपिंग को आग के हवाले कर सकता है. सऊदी चाहता था कि दुनिया को भरोसा रहे कि सऊदी तेल हमेशा सप्लाई होगा, चाहे युद्ध हो या बंदिश.  इसलिए इस पाइपलाइन के तीन मुख्य उद्देश्य रखे गए.

1- गल्फ के बाहर एक निर्यात रास्ता बनाना
2-अपनी एनर्जी सिक्योरिटी मजबूत करना 
3-ग्लोबल मार्केट को यकीन दिलाना कि सप्लाई कभी नहीं रुकेगी

इस पाइपलाइन को बनाकर सऊदी अरब ने पिछले 4 दशकों में खुद दुनिया का विश्वसनीय तेल सप्लायर के रूप में स्थापित कर लिया है.

'आंसुओं के द्वार' पर सऊदी के दुश्मन

आप तस्वीर देखेंगे तो पाएंगे कि ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन से तेल भरकर निकलने वाले जहाजों को लाल सागर से बाहर निकलकर अदन की खाड़ी में जाने के लिए एक एक संकरे मुहाने को पार करना पड़ता है. इसे बाब-अल-मंद्रेब स्ट्रेट कहा जाता है. सऊदी ने ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन तो बना ली है. लेकिन उसकी समस्या खत्म नहीं हुई. 

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बाब-अल-मंदेब स्ट्रेट का नाम अरबी भाषा से आया है. 'बाब' का मतलब 'द्वार' या 'गेट' और 'मंदेब' का मतलब 'दुख', 'विलाप' या 'आंसू' होता है. इस तरह से इसका पूरा नाम 'गेट ऑफ टियर्स' या 'दुख का द्वार' है.

यहां का यह नाम इसलिए पड़ा क्योंकि यहां नेविगेशन बहुत खतरनाक था. तंग जलडमरूमध्य में तेज धाराएं, अनिश्चित हवाएं, चट्टानें और उथले पानी होने से पुराने समय में बहुत सारे जहाज टूट जाते थे या डूब जाते थे. ये गेट दुखों का कारण था, इसलिए इसे ऐसा नाम मिला. 

सऊदी अरब को यहां से तेल भेजने में बड़ी समस्या है क्योंकि बाब-अल-मंदेब के मुहाने पर ही सऊदी के दुश्मन हूती विद्रोही बैठे हैं. बाब-अल-मंदेब के मुहाने पर बैठे हूती यमन के पश्चिमी तट और पेरिम द्वीप पर कब्जा कर बैठे हैं. वे आसानी से ड्रोन, बैलिस्टिक मिसाइल, क्रूज मिसाइल और विस्फोटकों से यहां से गुजरने वाले ऑयल टैंकरों पर हमला करते हैं.

2019 में हूतियों के हमले की वजह से ये रूट पूरी तरह से बंद हो गया था. तब हूती विद्रोहियों ने यहां हमला किया था.

2019 में हूतियों ने बाब-अल-मंदेब में सीधा हमला मिसाइल और ड्रोन से किया. पहले जुलाई 2018 में फिर बाद में 2019 में भी उन्होंने सऊदी तेल टैंकरों को निशाना बनाया. मुख्य हमला मई 2019 में हुआ, जब दो सऊदी तेल टैंकरों पर लिम्पेट माइन या छोटी मिसाइल लगाकर हमला किया गया, जिससे बड़ा नुकसान हुआ. इसके अलावा उन्होंने C-802 एंटी-शिप मिसाइल और ड्रोन का इस्तेमाल कर रेड सी में टैंकरों को टारगेट किया. इन हमलों से सऊदी को तेल निर्यात रोकना पड़ा. 

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ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन से होर्मुज बायपास हो जाता है लेकिन बाब-अल-मंदेब नहीं. मौजूदा युद्ध में होर्मुज बंद होने पर सऊदी का सारा निर्यात रेड सी रूट से हो रहा है. हूती सिर्फ धमकी देकर भी शिपिंग कंपनियों को डरा देते हैं इससे बीमा महंगा हो जाता है और जहाज केप ऑफ गुड होप  घूमकर जाते हैं.  इससे भी सऊदी का तेल निर्यात रुकता है, कीमतें बढ़ती हैं और अर्थव्यवस्था पर दबाव पड़ता है. 
 

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