
अगर उसके पास कभी कोई बिज़नेस कार्ड होता, तो उस पर शायद कुछ ऐसा लिखा होता- फ्रीडम फाइटर. डॉक्यूमेंट्री फिल्ममेकर. पूर्व युद्धबंदी. विद्रोहियों का ट्रेनर. और अब NIA का मेहमान. मैथ्यू एरन वैनडाइक, 46 साल, अमेरिकी, बाल्टीमोर में जन्मा, जॉर्जटाउन में पढ़ा. उसने अपनी पूरी वयस्क जिंदगी दूसरों के वॉर में कूदने में बिताई है. उसे पूरा भरोसा है कि उसका पासपोर्ट उसे नायक बनाता है, प्रॉब्लम नहीं.
13 मार्च को भारत की राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) ने एक बड़े काउंटर-टेररिज्म ऑपरेशन में सात विदेशी नागरिकों (छह यूक्रेनी और एक अमेरिकी) को गिरफ्तार किया. वही एक अमेरिकी वैनडाइक था. उसे कोलकाता एयरपोर्ट पर ब्यूरो ऑफ इमिग्रेशन ने पकड़ा. तीन-तीन यूक्रेनी लखनऊ और दिल्ली एयरपोर्ट पर रोके गए. ये सभी टूरिस्ट वीजा पर भारत आए थे. गुवाहाटी पहुंचे. फिर मिजोरम गए. और बिना अनुमति के प्रतिबंधित क्षेत्र में घुस गए.
एक टूरिस्ट और प्रतिबंधित इलाके का उल्लंघन- ऐसा हो जाता है. लेकिन NIA का कहना है कि वे म्यांमार में उग्रवादी समूहों को ट्रेनिंग देने गए थे, ताकि वे उत्तर-पूर्व भारत में हमले कर सकें. और भी कई डिटेल्स.
वैनडाइक पहली बार लीबिया के गृहयुद्ध में सुर्खियों में आया. वह मुअम्मर गद्दाफी के खिलाफ विद्रोहियों के साथ विदेशी लड़ाके के तौर पर लड़ा और युद्धबंदी भी बना. यही उसकी कहानी की शुरुआत है, जैसे ब्रूस वेन की कहानी में मां की मौत और चमगादड़ है. 2011 में वह गैरकानूनी तरीके से लीबिया गया. विद्रोहियों के साथ जुड़ा. घात लगाकर हमला हुआ. गोली लगी. और फिर उसने गद्दाफी की दो कुख्यात जेलों में छह महीने अकेले कैद में बिताए. ज्यादातर लोग इसे जिंदगी बदलने का संकेत मानते. वैनडाइक ने इसे इंटर्नशिप समझा.
24 अगस्त 2011 को कैदियों ने उसकी कोठरी का ताला तोड़ दिया और वह भाग निकला. जेल से निकलकर वह कुछ दिन एक साथी भगोड़े के घर रहा. फिर त्रिपोली के कोरिंथिया होटल में नेशनल ट्रांजिशनल काउंसिल के मेहमान के तौर पर ठहरा. 72 घंटे में एकांत कैद से सरकारी मेहमान तक. किसी भी भाषा में इसे दमदार रिज़्यूमे ही कहा जाएगा.
CIA वाला पहलू उसकी कहानी का सबसे दिलचस्प और सबसे उलझा हुआ हिस्सा है. उसने जॉर्जटाउन यूनिवर्सिटी में सिक्योरिटी स्टडीज़ पढ़ी. उसके ज्यादातर सहपाठी CIA, FBI, रक्षा विभाग, विदेश मंत्रालय या थिंक टैंकों में गए. वह भी उस क्लब में शामिल होना चाहता था.
वह CIA की भर्ती प्रक्रिया में काफी आगे तक गया. एनालिटिकल टेस्ट दिया. ड्रग टेस्ट दिया. मनोवैज्ञानिक जांच हुई. लैंगली स्थित मुख्यालय में संभावित बॉस और सहकर्मियों से मिला. लेकिन पॉलीग्राफ टेस्ट में वह बहुत घबरा गया. नतीजे साफ नहीं आए. वह लाई डिटेक्टर में फेल हो गया. CIA ने कहा- ठीक है, हम कॉल करेंगे. कॉल नहीं आया. या आया? CIA अपने तरीके से काम करती है. खैर, वह एक साल बीच पर रहा. फिर मोटरसाइकिल उठाई और उत्तर अफ्रीका की यात्रा पर निकल पड़ा.
अगले दशक में जो पैटर्न सामने आया, उसे खुफिया विश्लेषक “यूज़फुल इडियट” प्रोफाइल कहते हैं. और वैनडाइक खुद को “फ्रीडम फाइटर” कहता है. असल में यह एक भाड़े के लड़ाके का प्रोफाइल था. 2008 से 2010 के बीच उसे इराकी सुरक्षा बलों ने 20 बार गिरफ्तार या हिरासत में लिया. बीस बार.
एक समय के बाद यह संयोग नहीं, तरीका बन जाता है. एक घटना में उसे और उसके साथी को आंखों पर पट्टी बांधकर पीटा गया. हाथ बांधे गए. और अल-कायदा का आतंकी बताया गया. बगदाद में पूछताछ हुई. जेल में दीवार की तरफ खड़ा किया गया, पीछे AK-47 लिए एक इराकी खड़ा था. ईरान की फार्स न्यूज एजेंसी ने इसे “यहूदी अमेरिकी जासूसों की गिरफ्तारी” बताया. वह यहूदी नहीं था. लेकिन वह कुछ न कुछ कर रहा था. क्या कर रहा था यह नजरिए पर निर्भर है.

लीबिया के बाद वह सीरिया गया. वहां उसने डॉक्यूमेंट्री फिल्म बनाई और विद्रोहियों को हथियारों पर सलाह दी. असद सरकार ने उसे आतंकी घोषित कर दिया. सीरिया के बाद वह इराक गया. 2014 में, ISIS द्वारा उसके पत्रकार दोस्तों जेम्स फोली और स्टीवन सॉटलॉफ की हत्या से आहत होकर, उसने Sons of Liberty International नाम का संगठन बनाया. यह एक 501(c)(3) संस्था है, जो तानाशाही और आतंकवाद के खिलाफ लड़ने वाली ताकतों को सैन्य ट्रेनिंग, सलाह और संसाधन देती है. यानी एक नॉन-प्रॉफिट भाड़े की फौज. पेपरवर्क में अमेरिका की ताकत वाकई असीमित है.
Sons of Liberty International खुद को दुनिया की पहली नॉन-प्रॉफिट मिलिट्री कॉन्ट्रेक्ट कंपनी बताती है. यह कमजोर जनसमुदायों को मुफ्त सुरक्षा सलाह और ट्रेनिंग देती है. मुफ्त यानी दानदाताओं के पैसे से. और मकसद? मोटे तौर पर वही, जिसे वॉशिंगटन उस समय इतिहास का गलत पक्ष मानता है. सीधे शब्दों में, यह निजी विदेश नीति है, बस ब्रांडिंग बेहतर है.
वैनडाइक और उसका संगठन मार्च 2022 से यूक्रेन में सक्रिय हैं. वे रूस के खिलाफ यूक्रेनी सेना की मदद कर रहे हैं. सिर्फ सलाह नहीं दी. वैनडाइक खुद यूक्रेन की सेना में शामिल हुआ और लड़ाई लड़ी. 2025 के अंत तक उसकी भाषा यूक्रेन से आगे बढ़कर रूस के वैश्विक सहयोगियों तक पहुंच गई. और यहीं से कहानी म्यांमार तक आती है. जो हमारे पूर्वोत्तर के बेहद करीब है.
आरोप है कि यह समूह मिजोरम के प्रतिबंधित सीमा क्षेत्रों से अवैध रूप से भारत में घुसा. फिर म्यांमार गया. वहां उसने ऐसे जातीय सशस्त्र संगठनों के साथ काम किया, जिनके संबंध पूर्वोत्तर के उग्रवादियों से हैं. इस संवेदनशील इलाके में पहले से ही कई छोटे-बड़े उग्रवादी समूह सक्रिय हैं. ये दोनों तरफ काम करते हैं. ज्यादातर जातीय आधार पर.
वैनडाइक और उसकी टीम पर यूरोप से बड़ी संख्या में ड्रोन लाने का भी आरोप है. इससे प्रॉक्सी वॉर के नेटवर्क को लेकर चिंता बढ़ी है. यूरोप से ड्रोन, भारत के रास्ते, म्यांमार तक. टूरिस्ट वीजा ने शायद ही कभी इतना काम किया हो. यह भी माना जा रहा है कि ये ड्रोन सिर्फ म्यांमार की सेना के खिलाफ ही नहीं इस्तेमाल होंगे.
उसके अनुभवों पर बनी डॉक्यूमेंट्री “पॉइंट एंड शूट” ने 2014 के ट्रिबेका फिल्म फेस्टिवल में बेस्ट डॉक्यूमेंट्री का पुरस्कार जीता. उस पर न्यूयॉर्क टाइम्स, वॉशिंगटन पोस्ट, गार्डियन और डेली मेल में लेख छपे. डेली मेल ने उसे लेखक कहा. वह हिस्ट्री चैनल पर भी दिखा. भू-राजनीतिक समझ को छोड़ दें, तो वह एक चर्चित चेहरा है.
NIA की गिरफ्तारी से यह साबित नहीं होता कि वैनडाइक CIA का एजेंट है. ऐसा कोई सार्वजनिक सबूत नहीं है. खुद वैनडाइक भी इससे इनकार करता रहा है, हालांकि वह मानता है कि वह एजेंसी में शामिल होने के करीब था. लेकिन यह एक ज्यादा सामान्य और ज्यादा खतरनाक बात जरूर दिखाता है. एक ऐसा व्यक्ति, जिसकी निजी विचारधारा हर उस संघर्ष में अमेरिकी रणनीतिक हितों से मेल खाती है, जहां वह जाता है. वह आधिकारिक दायरे से थोड़ा बाहर रहकर काम करता है. और एक तरफ वॉशिंगटन को इनकार की गुंजाइश देता है, तो दूसरी तरफ विद्रोही समूहों को ट्रेनिंग भी देता है.
यह गिरफ्तारी भारत की सुरक्षा एजेंसियों के लिए चेतावनी है. वैनडाइक और उसके साथी उन इलाकों में सक्रिय थे, जहां भारतीय नागरिकों को भी जाने के लिए परमिट चाहिए होता है. यह साफ संदेश भी है- भारत अपनी जमीन को विदेशी प्रॉक्सी वॉर का अड्डा नहीं बनने देगा, चाहे वजह कुछ भी हो.
वैनडाइक बीते 20 साल से दुनिया को बता रहा है कि वह आजादी के लिए लड़ता है. भारत ने अब उसे और वॉशिंगटन को बता दिया है कि आजादी की भी सीमा होती है. उसे पार करोगे, तो कीमत चुकानी होगी. संभव है कि वह कुछ समय तिहाड़ में बिताए, जब तक अमेरिका बेचैन होकर उसे वापस मांग न ले. NIA को इस मामले की गहराई तक जांच करनी चाहिए.
क्या वह यहां वही गड़बड़ी फैलाने आया था, जिसकी ओर बांग्लादेश की तत्कालीन प्रधानमंत्री शेख हसीना ने इशारा किया था? ट्रंप का अमेरिका यह कहने में नहीं झिझकता कि वह भारत को चीन जैसा प्रतिद्वंद्वी बनने से रोकने के लिए हर तरह की ताकत लगाएगा. क्या इसमें भारत को भीतर से कमजोर करना भी शामिल है? ये सवाल हैं, जिनके जवाब एक सहयोगी देश को मिलने चाहिए.