अच्छा ध्यान रखिएगा... अगर ब्रेड खाना हो तो समय रहते खरीद लें. अगले 7 दिनों तक आपको ब्रेड नहीं मिलेगी. या फिर ब्रेड की जरूरत हो तो बताइएगा... तेल अवीव सेंट्रल बस स्टेशन पर मिले एक भारतीय भावेश पटेल ने काफी आत्मीयता और चिंता के साथ सलाह दी.
भावेश बीते 8 वर्षों से तेल अवीव में रहते हैं और कंस्ट्रक्शन सेक्टर में काम करते हैं. उनकी सलाह ने मुझे थोड़ा चौंकाया और मन थोड़ा जिज्ञासा से भी भरा. मैंने पूछा क्यों? ऐसा क्या होगा? क्या इस मौजूदा संघर्ष के कारण ऐसे हो रहा है? भावेश ने मुस्कुराते हुए कहा, नहीं वो पासओवर फेस्टिवल है ना इसलिए. मैंने फिर पूछा, अगर लोग ब्रेड नहीं खाएंगे तो फिर क्या खाएंगे तो जवाब आया मात्जा, यह एक किस्म की फ्लैट-ब्रेड होती है लेकिन अलग तरीके से बनती है.
पासओवर के शुरू होते ही इजरायल छुट्टी के मॉड में आ गया. सड़कों पर कामकाजी दिनों के मुकाबले भीड़ कम हो गई. दरअसरल इजरायल की आबादी का एक बड़ा हिस्सा अगले सात दिनों तक ब्रेड ना तो पकाएगा और ना ही खाएगा. खासतौर पर वो ब्रेड जिसमें खमीर या यीस्ट का इस्तेमाल किया जाता है. यह पासओवर त्योहार की शुरुआत है. करीब 7 दिनों तक चलने वाला यह त्योहार सदियों पहले यहूदियों के मिस्र से निकलने और गुलामी के जीवन से मुक्ति की याद में मानाया जाता है. इसी सें जुड़ी कहनी है, जिसके मुताबिक जब यहूदी मिस्र से पलायन कर निकले तो इतना भी वक्त नहीं था कि वो ब्रेड बनाकर रख सकें.
खैर, पासओवर में ब्रेड का तो इतना बड़ा संकट तो मुझे महसूस नहीं हुआ लेकिन इस युद्ध के पासओवर होने या गुजर जाने के बजाए इस युद्ध के नियो नॉर्मल बनने यानी आम जिंदगी का हिस्सा बन जाने के निशान साफ नजर आते हैं. वैसे भी अनिवार्य सैनिक सेवा वाले इजरायल में बीते 70 से ज्यादा वर्षों के दौरान और अनेक संघर्षों को दौरान 'ममात' यानी बंकर या शेल्टर की अहमियत को बखूबी जाना है तभी तो इजरायल में किसी भी नए घर के निर्माण के साथ उसमें बंकर या शेल्टर होना कानून जरूरी है.
साथ ही हर सार्वजनिक स्थान पर बाजार, चौक-चौराहों और मॉल में सार्वजनिक बंकर मिल जाएंगे. इतना ही नहीं, किसी व्यक्ति को बंकर में जाने से रोकना या उसको जगह देने से इनकार करना कानून अपराध है. खासतौर पर सार्वजनिक या सरकारी शेल्टर में. तभी तो सायरन बजते और अलर्ट आते ही हर कोई हाथ का काम छोड़कर नजदीकी शेल्टर में पहुंच जाता है. मोबाइल पर बाहर निकलने की इजाजत वाला संदेश आने तक भीतर रहता है और फिर कुछ यूं काम पर लौटता है जैसे कुछ हुआ ही ना हो.
इसका एक प्रत्यक्ष अनुभव उस वक्त हुआ जब मैं रात को पिज्जा खाने के लिए होटल से नजदीक की दुकान पर गया. ऑर्डर देकर अपना पिज्जा आने का इंतजार ही कर रहा था कि अलर्ट आ गया. पहले मोबाइल पर और फिर सायरन बज उठे. काउंटर पर मौजूद 24 वर्ष की सारा और उसके सहयोगियों ने पिज्जा को ओवन में छोड़ा. हमें और अन्य ग्राहकों को बाहर चलने की लिए कहा और दुकान को लॉक कर नजदीक के शेल्टर की तरफ बढ़ गई. उसने और नजदीक से गुजरते राहगीरों ने मुझे भी बताया कि करीब का शेल्टर कहा है.
खैर, यह वॉर रिपोर्टिंग की पेशेवर जरूरत भी है और विडंबना भी कि जब सामान्य लोग शेल्टर में जाते हैं तो हम आसमान में नजर आने वाले इंटरसेप्शन से लेकर इम्पैक्ट साइट पर जल्दी से जल्दी से जल्दी पहुंचने की चिंता में होते हैं. हुआ भी कुछ ऐसा ही, मिसाइल कैमरे में कैद हुआ और साथ ही आई जोरदार धमाके की आवाज. आवाज नजदीक के इलाके से ही आई थी यानी मिसाइल का टुकड़ा कहीं करीब ही गिरा था. जल्दी से पिज्जा खाकर उस जगह के लिए निकल पड़ा लेकिन रास्ते भर यह देखता चला कि रेस्तरां, बार, शॉपिंग मॉल, स्टोर सब कुछ सामान्य काम कर रहा है. सड़कों पर ट्रैफिक लगभग सामान्य है और इवनिंग वॉक पर निकले लोग उसी चाल और रफ़्तार से चल रहे है जैसा शायद किसी सामान्य स्थिति में करते.
यहां तक कि इम्पैक्ट साइट के करीब उत्सुकता के साथ देखने पहुंचे बच्चे और पार्टी करते युवा भी बड़ी संख्या में नजर आए. इम्पैक्ट साइट यानी जहां मिसाइल गिरी हो या उसका टुकड़ा गिरा हो, वो पुलिस और आपात सेवाओं के घेरे में होती है. जहां जान माल का नुकसान हुआ हो ऐसी इंपैक्ट साइट के करीब जाने पर लोग आपस में एक ही बात करते नजर आ जाते हैं कि जो व्यक्ति हताहत हुआ वो कहाँ था और शेल्टर से कितना दूर था? लोग यह जानते हैं कि शेल्टर ही जिंदगी बचा रहे हैं । इसीलिए कई लोग तो बकायदा अपने तंबू और बिस्तर लेकर शेल्टर में शिफ्ट हो चुके हैं.
वहीं जिन इलाकों में कोई कोई बड़ा नुकसान ना हुआ हो तो जिंदगी देखते ही देखते सामान्य हो जाती है. यहां तक की लेबनान सीमा से करीब मौजूद नहरिया में भी जहाँ हिज़्बुल्लाह के रॉकेट संभालने के लिए बस कुछ सेकंड का वक्त देते हों. वहां भी मैंने बाजारों की रौनक और सेल में लोगों को भीड़ लगाकर शॉपिंग करते भी देखा. नहारिया में अपने दो बच्चों को लेकर आए बेनी उस इमारत को दिखाने लाए थे जहाँ महज कुछ घंटे पहले हिज़बुल्ला का रॉकेट गिरा था और कई वाहनों में आग लगी थी.
रॉकेट हमले में हुए गड्ढे को तो आपात सेवा ने भर दिया था मगर एक पिता अपने बच्चों की स्मृति में उसको दर्ज करवा देना चाहता था ताकि उन्हें याद रहे और वो सावधान भी रहना सीखें. चाहे रामत गन हो या बेनी बराक, मिसाइल हमलों से रिहायशी इलाकों में ध्वंस हुई इमारतों कि करीब बच्चों की भीड़ को मैंने हर जगह देखा. शायद विध्वंस का स्मृति बोध बनाना यहूदी बखूबी जानते हैं लेकिन साथ हर यह भी जानते हैं कि विध्वंस को पास ओवर कर सामान्य जिंदगी के रफ्तार को कैसे बनाते रखना है. कुछ इतना सामान्य कि सप्ताहांत पर तेल अवीव के बीच पर सर्फिंग, स्विमिंग और जॉगिंग और पार्टी करने वालों की भीड़ जुटी होती है.
हालांकि, बातचीत में लोग यह मानते हैं कि बीते 30 दिनों में जिस एक चीज ने इजरायल के लोगों को सबसे अधिक परेशान किया है एयर कनेक्स्टिविटी. घूमने के शौकीन इजरायलों के लिए उनके अपने एयरपोर्ट बंद हैं एयर जिन्हें देश से बाहर जाना हो उन्हें जॉर्डन या मिस्र के रास्ते जाना होता है. तेल की कीमतों में एक शेकेल यानी करीब 30 रुपये का एकमुश्त इजाफा लोगों की जेब पर भारी पद रहा है. तेल अवीव के श्लोमो लाहट रोड पर मौजूद गैस स्टेशन के संचालक अगाल कहते है कि बीते दो सालों में इतनी बड़ी बढ़ोतरी उन्होंने नहीं देखी. लिहाजा इसका असर किसी भी मुल्क की तरह इजरायल में भी आम लोगों के रोजमर्रा जिंदगी के बजट पर पड़ेगा.
खैर इजरायल हो या इंडिया, महंगाई के बोझ के चिंता और घर-परिवार के रोजमर्रा जिंदगी के मुद्दों से जूझता आम आदमी तो बस इस दौर और युद्ध के पास ओवर की उम्मीद कर रह है.