इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू को जल्द ही अगले आम चुनाव की तारीख तय करनी होगी, लेकिन कई मोर्चों पर जारी युद्ध उनके इस फैसले को प्रभावित कर सकता है. ईरान और लेबनान में हिज्बुल्लाह के साथ बढ़ते संघर्ष के बीच उनके राजनीतिक भविष्य की दिशा भी तय हो सकती है. नेतन्याहू सरकार अपने चार साल के कार्यकाल के अंतिम चरण में है और अक्टूबर तक चुनाव कराना अनिवार्य है. हालांकि, उनके पास पहले चुनाव कराने का विकल्प भी है, जैसा कि इजरायल की राजनीति में अक्सर होता रहा है.
यदि ईरान के खिलाफ युद्ध में इजरायल को निर्णायक जीत मिलती है, तो इससे नेतन्याहू की लोकप्रियता बढ़ सकती है और वह जल्द चुनाव कराने का फैसला ले सकते हैं. वह इसे अपनी कूटनीतिक और सैन्य सफलता के रूप में पेश कर सकते हैं, खासकर अमेरिका के साथ करीबी संबंधों को लेकर. लेकिन मौजूदा हालात इस संभावना को कमजोर करते दिख रहे हैं. युद्ध के तीन हफ्ते बाद भी ईरान लगातार मिसाइल हमले कर रहा है, जिससे आम लोगों का जीवन प्रभावित हो रहा है. वहीं, लेबनान में हिज्बुल्लाह के साथ संघर्ष भी तेज होता जा रहा है.
युद्ध के परिणाम तय करेंगे नेतन्याहू का भविष्य
हालिया सर्वे बताते हैं कि इजरायली जनता युद्ध का समर्थन कर रही है, लेकिन इसका सीधा फायदा नेतन्याहू और उनके गठबंधन को नहीं मिल रहा है. ऐसे में विशेषज्ञों का मानना है कि वह चुनाव को टालकर अपने पूरे कार्यकाल का उपयोग करना चाहेंगे. पिछले हफ्ते एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में नेतन्याहू ने संकेत दिया कि चुनाव सितंबर या अक्टूबर में हो सकते हैं. इससे उन्हें अपनी लोकप्रियता सुधारने के लिए कुछ और समय मिल सकता है.
यह भी पढ़ें: इजरायल ने 2024 में हिज्बुल्लाह को कर दिया था खत्म! ईरान की मदद से फिर खड़ा हुआ
हालांकि, लंबा खिंचता युद्ध उनके लिए मुश्किलें भी बढ़ा सकता है. बढ़ते सैन्य नुकसान, जनता का असंतोष, खासकर उत्तरी इजरायल में हिज्बुल्लाह के हमलों के कारण, उनके समर्थन को प्रभावित कर सकते हैं. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी लंबे युद्ध से अमेरिका के साथ मतभेद बढ़ने की आशंका है. साथ ही, गाजा युद्ध को लेकर अंतरराष्ट्रीय आलोचना और इंटरनेशनल क्रिमिनल कोर्ट (ICC) में लगे आरोप भी उनकी छवि पर असर डाल सकते हैं.
इजरायल में सितंबर की शुरुआत आम चुनावों के लिए सबसे उपयुक्त समय हो सकता है, क्योंकि इसके बाद त्योहारों का लंबा दौर शुरू हो जाता है और 7 अक्टूबर (हमास के हमले की बरसी) के करीब चुनाव कराना राजनीतिक रूप से संवेदनशील हो सकता है. कुल मिलाकर, बेंजामिन नेतन्याहू के लिए यह चुनाव सिर्फ सत्ता की लड़ाई नहीं, बल्कि उनके राजनीतिक भविष्य और विरासत का भी फैसला करेगा.