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क्या जंग से टूट जाएगा ईरान, बनेगा कुर्दिस्तान? आजादी के लिए बेताब कुर्दों को मिला ट्रंप का बैकअप

ईरान जंग में राष्ट्रपति ट्रंप अपने हर दांव आजमा रहे हैं. इस बार उन्होंने ईरानियों के दुश्मन कुर्दों से हाथ मिलाया है और उन्हें डॉलर और हथियारों की सप्लाई की है. चार देशों में फैले दुनिया के सबसे बड़े स्टेटलेस एथनिक समूह कुर्द ट्रंप के इस ऑफर को मौका की तरह देखते हैं. कुर्द वो कौम है जो 100 सालों से अपने अलग वतन के लिए लड़ रहे हैं.

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तेहरान पर हमले के बाद निकलता धुआं और बदहवास परिंदे. (Photo:AFP)
तेहरान पर हमले के बाद निकलता धुआं और बदहवास परिंदे. (Photo:AFP)

पश्चिम एशिया की जंग दुनिया का नया नक्शा गढ़ सकती है. जहां युद्ध के नतीजे के फलस्वरूप ईरान टूट सकता है और कुर्दों का मादरे वतन कुर्दिस्तान वजूद में आ सकता है. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की नीतियां कुछ इसी ओर इशारा कर रही हैं. ईरान पर चौतरफा हमला कर रहे अमेरिका और राष्ट्रपति ट्रंप ने इस जंग में ईरान के दुश्मन कुर्द लड़ाकों को जंग में उतारने का निर्णय लिया है और कुर्दों डॉलर और हथियारों की खेप देने की घोषणा की है. लगभग 100 सालों से अलग कुर्दिस्तान के लिए जंग लड़ रहे कुर्द नेतृत्व और कुर्द लड़ाकों के लिए अपना राष्ट्र बनाने का ये सुनहरा मौका है.

ट्रंप की मदद से उत्साहित कुर्दों ने ईरान में घुसने की तैयारी शुरू कर दी है. न्यूज एजेंसी एपी के अनुसार उत्तरी इराक में मौजूद कुर्द ईरानी बागी ग्रुप ईरान में एक संभावित क्रॉस-बॉर्डर मिलिट्री ऑपरेशन की तैयारी कर रहे हैं, और US ने इराकी कुर्दों से उनका साथ देने को कहा है. बता दें कि ईरान पर इजरायली हमले में अबतक 1230 लोगों की मौत हो चुकी है.

कुर्द ग्रुप को ईरान की सत्ता को चुनौती देने वालों में सबसे शक्तिशाली माना जाता है. आकलन है कि उनके पास हज़ारों ट्रेंड लड़ाके हैं. युद्ध में उनके आने से तेहरान में मुश्किल में फंसे अधिकारियों के लिए एक बड़ी चुनौती खड़ी हो सकती है. इससे ईरान भी इस संघर्ष में आ सकता है. 

ट्रंप ने बागी कुर्दों से हाथ मिलाया

पिछले कुछ दिनों में ट्रंप प्रशासन ने ईरान के पश्चिमी हिस्से में सक्रिय ईरानी कुर्द मिलिशिया के साथ गहन संपर्क किया है. पश्चिम की मीडिया एजेंसियों 
रॉयटर्स, सीएनएन, वॉल स्ट्रीट जर्नल और एक्सियोस की रिपोर्ट के मुताबिक ट्रंप ने इराकी कुर्दिस्तान के प्रमुख नेताओं मसूद बरजानी (KDP) और बाफेल तलाबानी (PUK) से फोन पर बात की है.

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इन बातचीत में ईरान के खिलाफ संयुक्त ऑपरेशन, हथियार सप्लाई और ग्राउंड सपोर्ट पर चर्चा हुई.सीआईए कथित तौर पर ईरानी कुर्द फोर्सेस को हथियार पहुंचाने की तैयारी में है, ताकि वे ईरान की सुरक्षा फोर्सेस पर हमला कर शहरों में आम लोगों का विद्रोह आसान बना सकें. 

ईरानी कुर्द ऑपोजिशन ग्रुप्स जैसे PDKI-Democratic Party of Iranian Kurdistan, PAK, PJAK-Kurdistan Free Life Party और कोमाला ने हाल ही में "Coalition of Political Forces of Iranian Kurdistan" बनाई है, जिसका मकसद रिजीम चेंज है. कुछ संगठन फेडरल सिस्टम चाहते हैं, यानी कि सत्ता में राज्यों या रीजन की भागीदारी हो जबकि PAK जैसे संगठन स्पष्ट रूप से स्वतंत्र कुर्दिस्तान की मांग करते हैं. 

सुलेमानिया प्रांत में ईरानी बॉर्डर तक पहुंचे बागी कुर्द

उत्तरी इराक के सेमी-ऑटोनॉमस कुर्द इलाके में मौजूद कुर्दिस्तान फ्रीडम पार्टी  (PAK) के एक अधिकारी खलील नादिरी ने बुधवार को कहा कि उनकी कुछ सेनाएं सुलेमानिया प्रांत में ईरानी बॉर्डर के पास के इलाकों में चली गई हैं और स्टैंडबाय पर हैं. 

उन्होंने कहा कि कुर्दिश विपक्षी ग्रुप के नेताओं से US अधिकारियों ने एक खुफिया ऑपरेशन के बारे में संपर्क किया है, लेकिन उन्होंने ज़्यादा जानकारी नहीं दी. 

यह भी पढ़ें: समंदर का वो 'शिकारी', जिसे अमेरिका ने बनाया शिकार... जानें ईरानी युद्धपोत Dena की चौंकाने वाली ताकत

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ट्रंप प्रशासन ईरान में मौजूदा सरकार को कमजोर करने के लिए कुर्दों को 'बूट्स ऑन ग्राउंड' के रूप में इस्तेमाल करने पर विचार कर रहा है. 
इससे अमेरिका को सबसे बड़ा फायदा यह होगा कि यूएम आर्मी को ईरान में जमीन पर नहीं उतरा पड़ेगा और उनके लिए ये काम कुर्द लड़ाके करेंगे. 

इराक के इरबिल में कुर्द लड़ाकों का एक ग्रुप. (Photo: AP)

अगर ईरानी और इराकी कुर्द ग्रुप इस लड़ाई में शामिल होते हैं, तो यह लड़ाई में किसी बड़ी जमीनी सेना की पहली एंट्री होगी. कुर्द ग्रुप को इस्लामिक स्टेट ग्रुप के खिलाफ लड़ाई का अनुभव है.

एक और कुर्द ईरानी ग्रुप, कोमाला के एक अधिकारी ने बुधवार को कहा कि उनकी सेना एक हफ़्ते से 10 दिनों के अंदर बॉर्डर पार करने के लिए तैयार है और "जगह के सही होने का इंतज़ार कर रही है." उन्होंने सुरक्षा कारणों से नाम न बताने की शर्त पर यह बात कही.

ईरान ने कुर्दों के ठिकाने पर मिसाइलें मारी

इस बीच ईरान ने स्पष्ट संदेश दिया है कि वो कुर्दों की इस तरह की कोई हिमाकत नहीं बर्दाश्त करेगा. ईरानी सेना ने अपने पड़ोसी इराक के सेमी-ऑटोनॉमस इलाके में कुर्द ग्रुप्स को टारगेट करते हुए एक ऑपरेशन शुरू किया है. 

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ईरान की इंटेलिजेंस मिनिस्ट्री ने कन्फर्म किया है कि उसने कुर्दों की पोस्ट को टारगेट किया. वे कुर्द लड़ाके वेस्टर्न बॉर्डर्स से घुसने की कोशिश कर रहे थे, और कहा कि उन्हें भारी नुकसान हुआ है. 

इससे पहले उत्तरी इराक के सुलेमानिया प्रांत में कई धमाकों की खबर आई थी. लोकल मीडिया के मुताबिक प्रांत में अरबत, ज़रकुइज़ और सुरदाश इलाकों के पास कम से कम चार धमाकों की आवाज़ सुनी गई. लोकल सूत्रों ने बताया कि हमलों का निशाना इराक में ईरानी कुर्दिश हथियारबंद ग्रुप कुर्दिस्तान टॉयलर्स एसोसिएशन या कोमाला का हेडक्वार्टर था.

क्या अमेरिकी हमले के बाद ईरान टूटेगा?

ट्रंप ने घोषित रूप से कहा है कि उनका लक्ष्य ईरान में सत्ता परिवर्तन है. लेकिन ट्रंप फिर इस युद्ध में कुर्दों को क्यों घसीट रहे हैं. क्या ट्रंप ईरान को तोड़कर अलग कुर्दिस्तान के सपने को सच करना चाहते हैं. 

वर्तमान युद्ध में कुछ विश्लेषक सुझाव देते हैं कि अमेरिका कुर्दों को हथियार देकर अराजकता का फायदा उठाकर वे अलगाववादी आंदोलन चला सकते हैं, जिससे ईरान का एक हिस्सा (जैसे उत्तर-पश्चिमी क्षेत्र) कुर्दों के लिए अलग हो सकता है. 

पूर्व CIA एजेंट ट्रेसी वाल्डर कहती हैं, "अगर ईरान में सरकार बदलना ही मकसद है, तो बगावत भड़काने के लिए कुर्दिश सेना का इस्तेमाल करने से जमीन पर सैनिकों को भेजने की समस्या हल हो जाएगी."

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“अगर आप चाहें तो सरकार को सच में खत्म करने के लिए, आपके पास सैनिक होने चाहिए. हमने पूरे मिडिल ईस्ट में कुर्दिश सेनाओं के साथ काम किया है. उनका इस शासन को गिराने में अपना स्वार्थ है."

सुरक्षा विशेषज्ञ Alan Pino ने अटलांटिंक काउंसिल में लिखा है कि, 'ईरान में सरकार कमजोर होने पर एथनिक माइनॉरिटी जैसे कुर्द्स, बलूच और अरब ग्रुप्स आजादी के लिए आवाज बुलंद कर सकते हैं.'

उन्होंने लिखा कि "ईरान के जातीय अल्पसंख्यक अधिक स्वतंत्रता के लिए दबाव बनाने के लिए इस क्षण का लाभ उठाएंगे', जिससे देश के टूटने का खतरा है."

दरअसल अमेरिका यह भी चाहता है कि ईरान अपने संसाधन कई मोर्चों पर लगाएं ताकि वह युद्ध के मोर्चे पर फोकस न कर सके. 

इज़राइल में रहने वाले एक इंडिपेंडेंट डिफेंस एक्सपर्ट माइकल होरोविट्ज़ ने कहा, "मुख्य लक्ष्य यह पक्का करना है कि ईरान कुछ इलाकों पर अपना कंट्रोल खोना शुरू कर दे."

उन्होंने कहा कि, "अंदाजा यह हो सकता है कि ऐसा करने से, दूसरे माइनॉरिटी के साथ-साथ बड़े विरोधी समूहों को भी प्रेरणा मिल सकती है. सरकार के अंदर कुछ लोग जो पार्टी छोड़ने या भागने के लिए तैयार हो सकते हैं, वे भी इसे एक संकेत के तौर पर देख सकते हैं कि उन्हें अभी ऐसा कर लेना चाहिए, इससे ईरान में स्थिति कंट्रोल से बाहर हो जाएगी."

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माइकल होरोविट्ज़ ने कहा कहा कि अमेरिका ईरान में सिविल वॉर शुरू कर सकता है और इससे देश के टुकड़े-टुकड़े हो सकते हैं, जिसके लंबे समय तक चलने वाले नतीजे हो सकते हैं."

कुर्दों को ईरानियों से क्या दिक्कत है

ईरान में कुर्दों का मौजूदा इस्लामिक रिपब्लिक और उससे पहले की राजशाही दोनों के खिलाफ शिकायतों और बगावत का एक लंबा इतिहास रहा है.  शाह मोहम्मद रेजा पहलवी के राज में कुर्दों को अलग-थलग किया गया और दबाया गया और कभी-कभी उन्होंने बगावत भी की. 

ईरान की 1979 की इस्लामिक क्रांति के बाद नई धर्म-व्यवस्था ने कुर्द विद्रोहियों से भी लड़ाई लड़ी. ईरानी सेना ने कई महीनों तक चली लड़ाई में कुर्द शहरों और गांवों को तबाह कर दिया, जिसमें हजारों लोग मारे गए. 

कुर्दों का संघर्ष, इतिहास और वर्तमान युद्ध

कुर्दों का ऐतिहासिक संघर्ष दुनिया के सबसे लंबे और जटिल संघर्षों में से एक है. कुर्द दुनिया की सबसे बड़ी स्टेटलेस (बिना अपने देश वाली) जातीय समूह हैं. इनकी आबादी करीब 3-4 करोड़ है. 

कुर्द मुख्य रूप से तुर्की, ईरान, इराक और सीरिया में फैले हुए हैं, जहां उन्हें "कुर्दिस्तान" कहा जाता है. ये एक भौगौलिक क्षेत्र तो है लेकिन लेकिन कोई आधिकारिक देश नहीं है. 

ईरान में कुर्दों की आबादी अलग-अलग अनुमानों के अनुसार 80 लाख से 1 करोड़ के बीच मानी जाती है. कुर्दों की आबादी मुख्य रूप से ईरान के पश्चिमी पहाड़ी इलाकों में केंद्रित है. ये इलाके इराक और तुर्की की सीमा के पास हैं. 

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कुर्दों का अलग राष्ट्र कुर्दिस्तान बनाने का सपना लगभग एक सदी पुराना है.  इसकी शुरुआत प्रथम विश्व युद्ध के बाद हुई, जब ओटोमन साम्राज्य के पतन के बाद 1920 की Treaty of Sèvres में कुर्दों के लिए संभावित स्वतंत्र राज्य का प्रावधान रखा गया था.  हालांकि 1923 में हुई Treaty of Lausanne ने यह संभावना खत्म कर दी और कुर्दों के पारंपरिक इलाके तुर्की, इराक, ईरान और सीरिया में बंट गए. 

इस तरह कुर्द पहचान चार मुल्कों में बंटकर रह गई

इसके बाद 20वीं सदी में कई कुर्द विद्रोह हुए. 1946 में ईरान के उत्तर-पश्चिम में रिपब्लिक ऑफ महाबाद नाम से एक छोटा कुर्द राज्य बना, लेकिन यह एक साल के भीतर ही खत्म हो गया.

आधुनिक दौर में भी यह आंदोलन जारी है. तुर्की में कुर्द संगठन Kurdistan Workers' Party 1984 से सरकार के खिलाफ सशस्त्र संघर्ष चला रहे हैं. वहीं इराक में 1991 के बाद कुर्दों को स्वायत्तता मिली और 2005 के संविधान में इसे मान्यता दी गई.

2017 में इराकी कुर्दिस्तान में जनमत संग्रह कराया गया, जिसमें लगभग 92% लोगों ने स्वतंत्रता के पक्ष में मतदान किया. 

फिर भी तुर्की, ईरान, इराक और सीरिया के विरोध, क्षेत्रीय राजनीति और कुर्द गुटों के मतभेदों के कारण अब तक स्वतंत्र कुर्दिस्तान बन नहीं सका है. दरअसल इन चारों में से कोई भी देश कुर्द राष्ट्र के लिए अपना अपना इलाका छोड़ना नहीं चाहते हैं. 
 

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