अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच जारी जंग भले ही अभी खत्म होने से दूर दिख रही हो, लेकिन इसके बाद जो तस्वीर उभरेगी, वह और ज्यादा खतरनाक हो सकती है. यह सिर्फ एक जंग का अंत नहीं, बल्कि एक नए "कोल्ड वॉर" की शुरुआत हो सकती है, जहां अमेरिका के सामने उसका दुश्मन ही नहीं, बल्कि उसके अपने सहयोगी भी खड़े नजर आ सकते हैं. इनमें उसके चार सहयोगी ब्रिटेन, फ्रांस, इटली और स्पेन असल निशाना हो सकते हैं. राष्ट्रपति ट्रंप ने यहां तक कह दिया है कि वह अमेरिका को NATO से बाहर कर देंगे.
दरअसल, इस पूरे संकट का केंद्र बना हुआ है होर्मुज स्ट्रेट जो दुनिया का सबसे अहम समुद्री रास्ता है. यहां से करीब 20% तेल और गैस की सप्लाई गुजरती है. जैसे ही अमेरिका और इजरायल ने ईरान पर हमला शुरू किया तो जवाब में ईरान ने इस स्ट्रेट को लगभग बंद कर दिया था. समुद्र में माइन बिछाए गए, ड्रोन और मिसाइल तैनात कर पूरे इलाके को हाई-रिस्क जोन बना दिया गया. इसका असर तुरंत वैश्विक बाजार पर दिखा. तेल की कीमतें बढ़ीं और कई देशों में ऊर्जा संकट गहराने लगा.
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इस बढ़ते दबाव के बीच अमेरिका ने 'ऑपरेशन एपिक फ्यूरी' के तहत सैन्य कार्रवाई तेज की. लेकिन असली चुनौती सिर्फ ईरान से टकराना नहीं, बल्कि होर्मुज स्ट्रेट को दोबारा खोलना था. इसके लिए अमेरिका को अपने पारंपरिक सहयोगियों, नाटो देशों की जरूरत थी. राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने साफ संदेश दिया कि सहयोगी देश सेना भेजें और इस मिशन में अमेरिका का साथ दें. लेकिन यहीं से कहानी ने बड़ा मोड़ ले लिया.
NATO सहयोगियों ने छोड़ा अमेरिका का साथ!
ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, इटली, डेनमार्क और स्पेन जैसे बड़े नाटो देशों ने सीधे सैन्य हस्तक्षेप से दूरी बना ली. फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने साफ कहा कि फ्रांस इस संघर्ष का हिस्सा नहीं बनेगा. जर्मनी ने इसे "हमारी जंग नहीं" बताते हुए किनारा कर लिया. इटली और स्पेन ने भी युद्ध में कूदने से इनकार कर दिया, जबकि ब्रिटेन और डेनमार्क जैसे देशों ने सिर्फ व्यापारिक जहाजों की सुरक्षा तक खुद को सीमित रखने का संकेत दिया. यानि, जिस सैन्य गठबंधन पर अमेरिका दशकों से भरोसा कर रहा था, वही इस सबसे बड़े संकट में उसके साथ खड़ा नहीं दिखा.
अपने ही सहयोगियों के इस रुख से ट्रंप खासा नाराज हो गए. उन्होंने सार्वजनिक मंचों पर नाटो देशों की आलोचना शुरू कर दी. कहीं उन्हें "कमजोर" कहा, तो कहीं "स्वार्थी". उनका तर्क साफ है कि जब अमेरिका सालों से इन देशों की सुरक्षा करता रहा है, तो अब जरूरत पड़ने पर ये पीछे क्यों हट रहे हैं? अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने भी सहयोगियों के रुख पर नाराजगी जताई, खासकर एयरबेस और सैन्य मदद को लेकर कहा कि अमेरिका उन्हें सालों पैसे देता आया है लेकिन जरूरत पड़ने पर वे (NATO) सहयोगी साथ नहीं दे रहे हैं.
अगर नहीं दिया साथ तो खतरे में पड़ सकता है NATO का भविष्य
हालात, यहां तक पहुंच गया कि ट्रंप ने नाटो के भविष्य पर ही सवाल खड़े कर दिए. उन्होंने चेतावनी दी कि अगर सहयोग नहीं मिला, तो इस गठबंधन का अस्तित्व खतरे में पड़ सकता है. यह सिर्फ एक राजनीतिक बयान नहीं, बल्कि वैश्विक रणनीति में संभावित बदलाव का संकेत है.
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मसलन, यह दरार अगर और गहरी होती है, तो जंग खत्म होने के बाद अमेरिका और यूरोप के बीच भरोसे का संकट पैदा हो सकता है. यही संकट आगे चलकर एक नए "कोल्ड वॉर" की नींव बन सकता है. जहां देश पुराने गठबंधनों के बजाय अपने-अपने हितों के हिसाब से फैसले लेंगे.
अमेरिका-यूरोप के संभावित कोल्ड वॉर में रूस-चीन का रुख
इस पूरे समीकरण में रूस और चीन की भूमिका भी अहम हो जाती है. अमेरिका पहले ही इन्हें अपने बड़े प्रतिद्वंद्वी मानता है. ऐसे में अगर नाटो कमजोर पड़ता है, तो वैश्विक शक्ति संतुलन तेजी से बदल सकता है. चीन मिडिल ईस्ट में अपनी पकड़ मजबूत करने में जुटा है, जबकि रूस ऊर्जा बाजार से फायदा उठा रहा है.
कुल मिलाकर, ईरान की जंग अब सिर्फ एक क्षेत्रीय संघर्ष नहीं रह गई है. यह एक ऐसी जंग बन चुकी है, जो दुनिया के बड़े शक्ति समीकरणों को बदल सकती है. होर्मुज स्ट्रेट को लेकर चल रहा संकट अब अमेरिका और उसके सहयोगियों के रिश्तों की असली परीक्षा बन गया है. और शायद यही इस पूरी कहानी का सबसे बड़ा सच है. कभी-कभी जंग का अंत ही एक नई, और ज्यादा खतरनाक जंग की शुरुआत होती है.