ईरान का परमाणु कार्यक्रम पिछले ढाई दशकों से वैश्विक राजनीति का सबसे बड़ा केंद्र बना हुआ है. अमेरिका और उसके सहयोगी देशों का दावा है कि तेहरान परमाणु बम बनाने की फिराक में है, जबकि ईरान इसे शांतिपूर्ण कार्यों के लिए बताता आ रहा है. अब मंगलवार को स्विट्जरलैंड के जिनेवा में दोनों देशों के बीच अहम वार्ता होने जा रही है. इस बातचीत में अमेरिका ईरान से यूरेनियम संवर्धन खत्म करने और अपनी मिसाइलों की रेंज सीमित करने की मांग करेगा. बदले में तेहरान पर लगे आर्थिक प्रतिबंधों में छूट दी जा सकती है. यदि ये बातचीत विफल होती है, तो मिडिल ईस्ट में एक बड़ा सैन्य संघर्ष शुरू होने का खतरा है.
दरअसल, अमेरिका को डर है कि अगर ईरान परमाणु बम बना लेता है तो उससे पूरे मध्य-पूर्व को खतरा हो सकता है. ईरान की दुश्मनी, जहां इजरायल से पुरानी है. वहीं, सऊदी अरब से भी ईरान के कई मुद्दों पर तनाव है...इजरायल और सऊदी अरब दोनों अमेरिका के सहयोगी देश हैं....ये दोनों देश भी नहीं चाहते की ईरान इतना शक्तिशाली बन जाए की उनके लिए सुरक्षा चुनौतियां खड़ी हो जाए.
न्यूज एजेंसी रॉयटर्स के मुताबिक जिनेवा में होने वाली बातचीत में अमेरिका ईरान से मांग करेगा कि तेहरान यूरेनियम संवर्धन को खत्म करें, या बेहद कम कर दे...बदले में अमेरिका तेहरान पर लगे प्रतिबंधों में छूट दे सकता है. साथ ही अमेरिका ईरान से उसके मिसाइल कार्यक्रम को रोकने या मिसाइलों की रेंज सीमित करने की मांग करेगा.
संयुक्त राष्ट्र की परमाणु निगरानी एजेंसी IAEA के मुताबिक, ईरान ने यूरेनियम संवर्धन की दर को बढ़ा कर 60 प्रतिशत तक पहुंचा दिया है. ये बिजली उत्पादन के लिए जरूरी 4.5 प्रतिशत से बहुत ज्यादा और परमाणु हथियार बनाने के लिए जरूरी 90 प्रतिशत के काफी करीब है. वहीं, ईरान के मिसाइलों की जद में पूरा इजरायल आ चुका है....यानी ईरान के पास वो क्षमता है, जिससे वो इजरायल के अंदर कहीं भी हमला कर सकता है. ऐसे में अमेरिका हर हाल में ईरान पर दबाव डालेगा कि वो अपने परमाणु कार्यक्रम को रोके. और मिसाइलों की रेंज को सीमित करे.
ईरान के पास अमेरिका की भारी सैन्य तैनाती
इस बातचीत से पहले अमेरिका ने अपने विमानवाहक पोत USS अब्राहम लिंकन को मध्य-पूर्व में तैनात कर दिया है और रविवार को अमेरिकी सैनिकों ने ईरान पर संभावित हमले का अभ्यास भी किया है....अमेरिकी अधिकारियों ने रॉयटर्स को बताया कि राष्ट्रपति ट्रंप का आदेश आते ही सैन्य कार्रवाई शुरू हो जाएगी...यही नहीं, अमेरिका अपने सबसे बड़े विमानवाहक पोत USS गेराल्ड आर. फोड को भी मध्य-पूर्व के लिए रवाना कर चुका है, जिसमें हजारों सैनिक, लड़ाकू विमान, गाइडेड मिसाइल सहित कई हथियार भेजे गए हैं..कहा जा रहा है कि अगर ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम को रोकने और मिसाइल कार्यक्रमों को सीमित करने पर राजी नहीं होता तो राष्ट्रपति ट्रंप ईरान के परमाणु और सैन्य ठिकानों पर बमबारी के आदेश दे सकते हैं.
US ने ईरान के परमाणु ठिकानों पर बरसाए थे बम
पिछले साल इजरायल और ईरान के बीच 12 दिनों तक चले युद्ध के दौरान अमेरिका ने ईरान के परमाणु ठिकानों पर हवाई हमले किए थे...ये हमले ईरान के तीन परमाणु ठिकानों फ़ोर्दो, नतांज़ और इस्फ़हान पर किए गए थे. बी-2 स्टेल्थ बॉम्बर्स से किए गए इन हमलों के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने ईरान को भारी नुकसान पहुंचाने का दवा किया था. हालांकि, कई विशेषज्ञों का मानना था कि हमले से नुकसान जरूर हुआ, लेकिन उस स्तर पर तबाही नहीं हुई कि ईरान की परमाणु क्षमता ही नष्ट हो जाए.
जानकारों के मुताबिक, मौजूदा वक़्त में भी ईरान में तीन बड़ी परमाणु फ़ैसिलिटीज़ काम कर रही है- इनमें नतांज़ और फ़ोर्दो यूरेनियम एनरिचमेंट सेंटर्स हैं और इस्फ़हान परमाणु रिसर्च सेंटर है. इसके अलावा बुशहर, दरखोविन और सिरिक में परमाणु ऊर्जा संयंत्र हैं. वहीं, अरक में जो परमाणु ढांचा है वो दरअसल हैवी वॉटर प्लांट है जिसका इस्तेमाल काफी हद तक सीमित है.
इजरायल की प्रतिक्रिया
मंगलवार को होने वाली अमेरिका और ईरान की बातचीत पर इजरायल ने प्रतिक्रिया दी है...इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने कहा कि उन्होंने पिछले सप्ताह राष्ट्रपति ट्रंप से कहा था कि ईरान के साथ किसी भी समझौते में तेहरान के परमाणु ढांचे को नष्ट करना शामिल होना चाहिए...न कि केवल यूरेनियम के संवर्धन प्रक्रिया को रोकना पर बातचीत होनी चाहिए.
अमेरिकी यहूदी संगठनों के अध्यक्षों के सम्मेलन में बोलते हुए नेतन्याहू ने कहा कि मैं आपसे ये नहीं छिपाऊंगा कि मैंने ईरान के साथ किसी भी समझौते पर संदेह व्यक्त किया था, क्योंकि सच कहूं तो ईरान एक बात में पक्का है: वे झूठ बोलते हैं और धोखा देते हैं, लेकिन मैंने कहा था कि अगर कोई समझौता होना है, तो उसमें कई मुद्दे शामिल होने चाहिए, ऐसे मुद्दे जो केवल इजरायल की सुरक्षा के लिए नहीं बल्कि दुनिया की सुरक्षा के लिए भी अहम हैं. बातचीत में ना सिर्फ ईरान को यूरेनियम संवर्धन को रोकने के लिए कहा जाना चाहिए, बल्कि उन उपकरणों और बुनियादी ढांचों को भी नष्ट करने की शर्त शामिल होनी चाहिए...जिससे ईरान परमाणु हथियार बना सकता है.....
दअसल, ओमान की राजधानी मस्कट में अमेरिका और ईरान के अधिकारों के बीच पहले दौर की बातचीत के बाद इजरायली प्रधानमंत्री ने पिछले हफ्ते अमेरिका का दौरा किया था, जहां उन्होंने अपनी चिंताओं से राष्ट्रपति ट्रंप को अवगत कराया था.
ईरान का परमाणु कार्यक्रम
संयुक्त राष्ट्र के परमाणु ऊर्जा एजेंसी IAEA ने साल 2003 में कहा कि ईरान पिछले 18 सालों से एक परमाणु कार्यक्रम चला रहा है..जिसका मकसद न्यूक्लियर वेपंस को हासिल करना हो सकता है, जिसके बाद ना सिर्फ पश्चिमी देशों ने, बल्कि रूस और चीन जैसे ईरान के पुराने दोस्तों ने भी इसकी निंदा की...साथ ही अमेरिका ने अपने प्रतिबंध और कड़े कर दिए, जबकी यूरोपीय देशों और संयुक्त राष्ट्र ने भी ईरान पर कई तरह के प्रतिबंध लगा दिए....इन प्रतिंबधों को हटाने के लिए ईरान ने अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा के दौरे में 2015 में पश्चिमी देशों के साथ एक समझौता किया, जिसके बाद उसे थोड़ी राहत मिली. हालांकि, राष्ट्रपति ट्रंप ने अपने पहले कार्यकाल में इस समझौते को रद्द कर दिया और ईरान पर और कड़े प्रतिबंध लगा दिए थे.
अमेरिका ने की थी ईरान की मदद
अमेरिका और ईरान ने साल 1957 में परमाणु सहयोग के लिए एक समझौते पर हस्ताक्षर किए. उस समय ईरान में अमेरिका के समर्थन वाले शाह मोहम्मद रज़ा पहलवी का शासन था. एटम्स फॉर पीस यानी शांति के लिए परमाणु पहल के तहत इस समझौते ने ईरान के परमाणु कार्यक्रम की नींव रखी. शीत युद्ध के दौर में ईरान अमेरिका का एक अहम रणनीतिक सहयोगी था. यही नहीं, अमेरिका ने साल 1967 में ईरान को पांच मेगावाट क्षमता वाले एक परमाणु रिएक्टर की सप्लाई भी की. साथ ही रिएक्टर को चलाने के लिए यूरेनियम भी दिए....
वहीं, इसके तीन साल बाद साल 1970 में ईरान ने परमाणु अप्रसार संधि पर हस्ताक्षर किए और इस समझौते के जरिए ईरान ने वादा किया कि वो परमाणु हथियार हासिल या विकसित करने का प्रयास नहीं करेगा...लेकिन 1979 में ईरान में इस्लामिक क्रांति और शाह रज़ा पहलवी के पतन के बाद हालात बदल गए. अमेरिका, इजरायल से बढ़ते खतरे को देखते हुए नए शासक आयतुल्लाह रुहोल्लाह खुमैनी ने तेजी से अपनी सैन्य शक्ति बढ़ानी शुरू कर दी.
इसका नतीजा था कि कथित तौर पर ईरान ने परमाणु हथियार हासिल करने की कोशिश शुरू कर दी और अब ईरान ऐसे मुकाम पर पहुंच गया है जोकी अपने दम पर हथियार बना सकता है और परमाणु हथियार रखने वाले देशों जैसे अमेरिका, रूस, चीन, ब्रिटेन, फ्रांस, भारत, पाकिस्तान और उत्तर कोरिया के क्लब में शामिल हो सकता है...हालांकि इजरायल ने इस बात की कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं कि हैं, लेकिन माना जाता है कि उसे पास भी परमाणु हथियार है.