मंगलवार को जब अरब लीग, यूरोपीय संघ, रूस, चीन समेत 85 देशों के एक ग्रुप ने वेस्ट बैंक पर इजरायल की एकतरफा कार्रवाइयों की आलोचना करते हुए एक बयान जारी किया तब भारत ने उससे दूरी बनाए रखी. लेकिन अब खबर है कि भारत ने अपना नाम इस लिस्ट में जोड़ दिया है.
इस बयान का समर्थन अरब लीग, यूरोपीय संघ, ब्रिक्स के संस्थापक- रूस, चीन, ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका- भारत के क्वाड पार्टनर्स ऑस्ट्रेलिया और जापान, पड़ोसी देशों बांग्लादेश, मालदीव, मॉरीशस और पाकिस्तान ने किया.
यह बयान संयुक्त राष्ट्र की उस बैठक से पहले जारी किया गया जिसमें वेस्ट बैंक में इजरायली कार्रवाइयों पर चर्चा होनी थी. गुरुवार को वॉशिंगटन में अमेरिका की अगुवाई में 'बोर्ड ऑफ पीस' मीटिंग से पहले ये बयान जारी कर इजरायल और उसके सहयोगी अमेरिका पर दबाव बनाने की कोशिश हो रही है.
'स्टेकआउट' के दौरान 85 देशों का यह संयुक्त बयान जारी किया गया और संयुक्त राष्ट्र में फिलिस्तीन के राजदूत ने इसे पढ़कर सुनाया. इस दौरान संयुक्त राष्ट्र में फिलिस्तीनी राजदूत के साथ उन दर्जनों देशों के डिप्लोमैट मौजूद थे, जिन्होंने इस डॉक्यूमेंट पर हस्ताक्षर किए थे.
संयुक्त राष्ट्र में फिलिस्तीन के राजदूत रियाद मंसूर ने कहा, 'हम वेस्ट बैंक में इजरायल की अवैध उपस्थिति को और बढ़ाने के मकसद से लिए गए इजरायल के एकतरफा फैसलों और कदमों की कड़ी निंदा करते हैं. हम किसी भी तरह के विलय का कड़ा विरोध करते हैं.'
मंसूर ने यह भी कहा कि देशों का बयान 1967 से कब्जे में लिए गए फिलिस्तीनी क्षेत्रों, जिसमें पूर्वी यरुशलम भी शामिल है, की जनसंख्या, स्वरूप और स्थिति को बदलने के लिए उठाए गए सभी कदमों को खारिज करता है.
लिस्ट में भारत का नाम न होने पर तीखी आलोचना हुई थी
पहले बयान में भारत का नाम शामिल न होने पर सोशल मीडिया पर डिप्लोमैट्स ने तीखी आलोचना की. ईरान में भारत के पूर्व राजदूत के.सी. सिंह ने इसे निराशाजनक बताते हुए कहा कि भारत ने खुलकर इजरायल का पक्ष चुना है, और यह भी सवाल उठाया कि क्या भारत सरकार का ये कदम अमेरिका के साथ संबंधों को मजबूत करने से जुड़ा है.
पूर्व विदेश सचिव निरुपमा मेनन राव ने इजरायल-फिलीस्तीन संघर्ष पर भारत के पारंपरिक रुख का जिक्र करते हुए लिखा, 'रणनीतिक स्वायत्तता का मकसद भारत के विकल्पों का विस्तार करना था, न कि उसकी नैतिक भाषा को सीमित करना. अगर स्वायत्तता जो मानक रुख से हटने पर बदल जाए, तो यह स्वतंत्रता कम और संतुलन साधने की कोशिश ज्यादा लगने लगती है.'
गाजा युद्धविराम के बाद वेस्ट बैंक पर इजरायल ने अपना कंट्रोल बढ़ाया
इजरायल गाजा में युद्धविराम के लिए तो राजी हो गया है लेकिन पिछले कुछ महीनों में उसने फिलीस्तीनी क्षेत्र वेस्ट बैंक पर अपना कंट्रोल बढ़ा दिया है. इजरायल की संसद नेसेट ने इस दौरान वेस्ट बैंक के 'ए' और 'बी' क्षेत्रों में जमीन पर अपना कंट्रोल बढ़ाने के लिए कई योजनाएं पारित की हैं.
इन क्षेत्रों का प्रशासन ओस्लो समझौतों (1993–1995) के बाद से फिलीस्तीनी प्राधिकरण के पास रहा है. पहले वेस्ट बैंक में बाहरी लोगों के जमीन खरीद पर पाबंदी थी लेकिन इजरायली संसद ने इस पाबंदी को हटा दिया है. वेस्ट बैंक में लंबे समय से जो फिलिस्तीनी रह रहे हैं, उनके डॉक्यूमेंट्स की जांच की जा रही है. इजरायल के इस कदम को उस क्षेत्र पर कब्जा करने और उसे अपने में मिलाने की तैयारी के रूप में देखा जा रहा है. इजरायल इसी तरह से वेस्ट बैंक में बहुत सी बस्तियां बसा चुका है.
संयुक्त राष्ट्र ने इजरायल पर आरोप लगाया है कि वो वेस्ट बैंक में नस्लभेद कर रहा है. 85 देशों की तरफ से जारी बयान में कहा गया है, 'ऐसे कदम अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन करते हैं, क्षेत्र में शांति और स्थिरता की कोशिशों को कमजोर करते हैं और संघर्ष को समाप्त करने वाले शांति समझौते की संभावनाओं को खतरे में डालते हैं.'
इधर, इजरायल के खिलाफ लिस्ट में डला भारत का नाम, उधर, इजरायल जा रहे पीएम
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अगले रविवार को इजरायल दौरे पर जा रहे हैं. इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने इस दौरे की जानकारी देते हुए एक कॉन्फ्रेंस में कहा कि पीएम मोदी अगले हफ्ते इजरायल आएंगे. उन्होंने कहा कि भारत और इजरायल के बीच अद्भुत संबंध हैं और पीएम मोदी के दौरे में दोनों देश हर तरह के सहयोग पर चर्चा करेंगे.
आगामी दौरा प्रधानमंत्री मोदी का दूसरा इजरायल दौरा होने वाला है. पीएम 2017 में पहली बार इजरायल गए थे जिसके बाद अगले साल 2018 में नेतन्याहू ने भारत का दौरा किया था.