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अब 'डैडी' ट्रंप भी आएंगे बातचीत की टेबल पर... भारत-EU ट्रेड डील है मास्टरस्ट्रोक!

भारत और यूरोपीय संघ ने लंबे समय से रुके हुए ट्रेड डील को आखिरकार अंतिम रूप दे दिया है. यह समझौता अमेरिका के साथ व्यापार संबंधों में तनाव के बीच भारत की स्वतंत्र व्यापार नीति को दिखाता है. इस समझौते से भारत के निर्यात को बढ़ावा मिलेगा और यूरोप के लिए भी नए बाजार खुलेंगे.

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भारत-ईयू ट्रेड डील अमेरिका के लिए झटका माना जा रहा है
भारत-ईयू ट्रेड डील अमेरिका के लिए झटका माना जा रहा है

भारत और यूरोपीय संघ (ईयू) ने मंगलवार को जिस ‘मदर ऑफ ऑल ट्रेड डील्स’ कहे जा रहे समझौते का ऐलान किया, वो ‘डैडी’ ट्रंप को कतई पसंद नहीं आएगा. ग्रीनलैंड को लेकर ट्रंप ने यूरोप का मजाक बनाया, लगातार दबाव बना रहे थे, उसी यूरोप ने भारत के साथ व्यापार समझौता कर लिया है जिस पर ट्रंप ने हाई टैरिफ लगाकर घेरने की कोशिश की है. जाहिर तौर पर यह ट्रेड डील ट्रंप को चुभने वाली है.

भारत-यूरोपीय संघ की ट्रेड डील ऐसे वक्त में हुई है जब भारत के साथ अमेरिका का व्यापार समझौता अटका हुआ है. सनकी अमेरिकी राष्ट्रपति इसे खुलेआम चुनौती के रूप में देख सकते हैं.

भारत-अमेरिका व्यापार समझौते में रुकावट की वजह कोई पॉलिसी नहीं बल्कि यह है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ट्रंप के अहंकार को सहलाने से इनकार कर दिया. दूसरी ओर, यूरोपीय संघ ने भी अमेरिका के साथ अपने व्यापार समझौते को मंजूरी देने की प्रक्रिया रोक दी है.

पिछले साल नाटो प्रमुख ने ट्रंप को 'डैडी' सरनेम दिया था और यह सरनेम अब ट्रंप के लिए एक ऐसे दबंग और सत्तावादी नेता के प्रतीक के तौर पर इस्तेमाल किया जाने लगा है, जो विरोधियों और सहयोगियों, दोनों पर कंट्रोल करना पसंद करता है.

India-EU ट्रेड डील ने 'डैडी' ट्रंप को असहज कर दिया है

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ये बात तो है कि भारत-ईयू ट्रेड डील ने ‘डैडी’ ट्रंप को असहज किया है. ट्रंप प्रशासन की यह असहजता सोमवार को तब साफ दिखी जब ट्रंप के करीबी अमेरिकी ट्रेजरी सेक्रेटरी स्कॉट बेसेंट ने यूरोप पर आरोप लगाया कि वो भारत के रास्ते ऊर्जा व्यापार कर रूस-यूक्रेन युद्ध को अप्रत्यक्ष तरीके से फंड कर रहा है.

एबीसी न्यूज को दिए एक इंटरव्यू में बेसेंट ने कहा, 'हमने भारत पर रूसी तेल खरीदने के लिए 25 फीसदी टैरिफ लगाए. और अंदाजा लगाइए, पिछले हफ्ते क्या हुआ? यूरोप ने भारत के साथ व्यापार समझौता कर लिया.'

हालांकि, बेसेंट यह नहीं समझ पा रहे कि इस समझौते का कुछ श्रेय खुद ट्रंप को भी जाता है. भारत-ईयू के बीच यह व्यापार वार्ता करीब दो दशकों से चल रही थी. अगर ट्रंप बार-बार टैरिफ की धमकियां न देते और अपने सहयोगियों को अलग-थलग न करते तो शायद भारत और ईयू को इस समझौते की इतनी जल्दबाजी नहीं होती.

प्रधानमंत्री मोदी ने व्यापार समझौते की घोषणा करते हुए इसी ओर इशारा किया और ट्रंप पर तंज कसते हुए कहा, 'ग्लोबल ऑर्डर में उथल-पुथल है. यह समझौता उस हलचल को स्थिर करेगा.'

क्या भारत-ईयू व्यापार समझौते के पीछे ट्रंप हैं?

अमेरिका के साथ बिगड़ते संबंधों के बीच भारत पर कुल 50 फीसदी टैरिफ लगाए गए हैं- 25 फीसदी रेसिप्रोकल टैरिफ और 25 फीसदी टैरिफ रूसी तेल की खरीद पर सजा के तौर पर.

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पिछले साल ट्रंप और उनके सहयोगियों, जिनमें यूरोपीय संघ के देश भी शामिल थे, उन्होंने रूस के व्यापार को लेकर भारत की तीखी आलोचना की. कभी भारत को ‘क्रेमलिन का लॉन्ड्रोमैट’ कहा तो कभी यूक्रेन युद्ध को 'मोदी की जंग' बताया. मकसद सिर्फ भारत पर अमेरिका के पक्ष में एक असंतुलित व्यापार समझौते के लिए दबाव बनाना था.

हालांकि भारत ने ट्रंप की धमकियों और दबंगई के बावजूद अपने रुख से समझौता नहीं किया और कभी सीधे अमेरिकी राष्ट्रपति पर हमला भी नहीं बोला.

दूसरी ओर, ग्रीनलैंड को लेकर ट्रंप की महत्वाकांक्षा का यूरोप ने विरोध किया. यूरोपीय विरोध ने ट्रंप को नाराज कर दिया और ट्रंप ने टैरिफ की धमकी देते हुए यूरोप को ‘कमजोर’ तक कहा. जवाब में यूरोप ने ईयू-अमेरिका व्यापार समझौते को ठंडे बस्ते में डाल दिया और कई देशों ने ट्रंप के ‘गाजा बोर्ड ऑफ पीस’ में शामिल होने के न्योते ठुकरा दिए.

इस माहौल में भारत-ईयू ट्रेड डील अमेरिका और चीन पर निर्भरता कम करने की एक रणनीतिक कोशिश के रूप में सामने आया है. अमेरिका-चीन एक्सपोर्ट कंट्रोल के जरिए अपने अहम तकनीकों की रक्षा कर रहे हैं, ऐसे में भारत-ईयू ट्रेड डील और जरूरी हो जाती है.

यह व्यापार समझौता भारत और यूरोप के लिए क्या मायने रखता है?

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भारत के लिए यह समझौता अमेरिका को साफ संदेश देता है कि वो ट्रंप की धमकियों के आगे झुकने वाला नहीं है. हाल के महीनों में भारत ने ब्रिटेन, न्यूजीलैंड और ओमान के साथ अहम व्यापार समझौते तेजी से पूरे किए हैं.

Photo: PTI

भारत जानता है कि ट्रंप ताकत का सम्मान करते हैं और प्रधानमंत्री मोदी ने उनके दबाव में आए बिना इस वैश्विक उथल-पुथल को संभाला है.

उदाहरण के तौर पर, कनाडा हाल ही में चीन के साथ व्यापार समझौता करने जा रहा था लेकिन जब ट्रंप ने चेतावनी दी कि अगर कनाडा ने चीन से समझौता किया तो उस पर 100 फीसदी टैरिफ लगाए जाएंगे. ट्रंप की चेतावनी के बाद कनाडा ने चीन के साथ अपनी डील रोक ली थी.

ईयू के साथ ट्रेड डील में भी कृषि और डेयरी इंडस्ट्री शामिल नहीं

इधर, ईयू ने भारत की कृषि और डेयरी से जुड़े संवेदनशील मुद्दों को समझते हुए उन्हें इस समझौते से बाहर रखा है. यह भारत के घरेलू किसानों की रक्षा करने की लंबे समय से चली आ रही नीति के अनुरूप है. इसके उलट अमेरिका इन क्षेत्रों में व्यापक पहुंच चाहता रहा है और ट्रेड डील के रुकने की एक बड़ी वजह ये भी है.

हालांकि यूरोप ने रूस के साथ भारत के करीबी संबंधों पर असंतोष जताया है, लेकिन यूरोप के देशों ने कभी अपमानजनक भाषा, धमकियों या सजा के तौर पर प्रतिबंधों का सहारा नहीं लिया.

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ईयू के लिए, दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन चुका भारत एक स्थिर और लगातार बढ़ता बाजार है. मतभेदों के बावजूद भारत ने कभी यूरोप पर दबाव बनाने या उसे अपमानित करने की कोशिश नहीं की.

इस तरह, अगले साल से लागू होने वाला यह व्यापार समझौता भारत और यूरोप, दोनों के लिए फायदे का सौदा है.

ट्रंप के टैरिफ दबाव को कम करेगा ईयू के साथ डील

भारत के लिए यह समझौता ट्रंप के लगाए गए टैरिफ के दबाव को कम करेगा, जिसका सबसे ज्यादा असर कपड़ा, केमिकल, रत्न और आभूषण जैसे श्रम-प्रधान क्षेत्रों पर पड़ा है. एफटीए के तहत इन क्षेत्रों को ड्यूटी फ्री या रियायती पहुंच मिलेगी.

यूरोपीय संघ पहले से ही भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है. एफटीए के जरिए 90 फीसदी से ज्यादा वस्तुओं पर टैरिफ हटने और टेलीकम्युनिकेशन व अकाउंटिंग जैसी सर्विसेज में दिक्कतें कम होने से भारत के निर्यात में और बढ़ोतरी होगी.

व्यापार समझौते से ईयू को भी फायदा होगा. भारत यूरोप से आयात होने वाली कारों पर टैरिफ 110 फीसदी से घटाकर 40 फीसदी करेगा. इससे फॉक्सवैगन, मर्सिडीज-बेंज और बीएमडब्ल्यू जैसी कंपनियों को दुनिया के तीसरे सबसे बड़े कार बाजार में बेहतर पहुंच मिलेगी.

भारत-ईयू ट्रेड डील दिखाता है कि धमकियों और दबाव के बिना, रचनात्मक बातचीत के जरिए भी एक व्यावहारिक व्यापार समझौता किया जा सकता है. भारत-यूरोप ने यही करके दिखाया है.

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क्या ट्रंप बातचीत की मेज पर आएंगे?

अब बड़ा सवाल यह है कि भारत-यूरोपीय संघ के बीच एफटीए के बाद क्या अमेरिका भारत से डील के लिए राजी होगा. विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसा होगा. 

रेमंड ग्रुप के मैनेजिंग डायरेक्टर गौतम सिंघानिया ने कहा, 'अगर भारत ईयू के साथ बहुत अच्छी डील करता है, तो यह अमेरिका को बातचीत की टेबल पर लाने की दिशा में बड़ा कदम होगा.'

कनाडा, जिस पर ट्रंप अक्सर हमला बोलते रहे हैं, वो भी भारत के करीब आता दिख रहा है. खालिस्तानी आतंकवादी हरदीप सिंह निज्जर की हत्या को लेकर आई कड़वाहट के बाद अब भारत-कनाडा रिश्तों में नरमी है. कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी मार्च की शुरुआत में भारत आ सकते हैं. उनके आगामी दौरे में यूरेनियम, ऊर्जा और खनिजों से जुड़े समझौतों पर हस्ताक्षर हो सकते हैं.

व्हाइट हाउस में ट्रंप की वापसी ने यूरोप और भारत- दोनों के लिए अमेरिका की भूमिका को लेकर अनिश्चितता और अविश्वास बढ़ा दिया है, भले ही कारण अलग-अलग हों. इसके बावजूद, प्रधानमंत्री मोदी ने दिखाया है कि अमेरिका के दबावों के बीच भी भारत ग्लोबल ट्रेड के नए संतुलन में अपनी स्वतंत्र जगह बना सकता है.

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