
अमेरिकी राजनीति में एक पुरानी कहावत है, "The Third Rail of American Politics." यह शब्द आमतौर पर ऐसे मुद्दों के लिए इस्तेमाल होता है जिन्हें छूना राजनीतिक आत्महत्या के बराबर माना जाता है. अगर अमेरिकी राजनीति में कोई "Third Rail" है जिसका असर व्हाइट हाउस के अंदर तक महसूस किया जाता है, तो वह इजरायल है. जब भी कोई अमेरिकी राष्ट्रपति इजरायल पर ज्यादा दबाव डालने की कोशिश करता है, तो उसके फैसलों को सिर्फ पश्चिम एशिया की नजर से नहीं देखा जाता बल्कि अमेरिका की घरेलू राजनीति के चश्मे से भी परखा जाता है.
आज जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और इजरायली पीएम बेंजामिन नेतन्याहू के बीच तनाव की खबरें सुर्खियों में हैं, तब अमेरिकी इतिहास के कुछ पुराने अध्याय फिर चर्चा में आ गए हैं. क्योंकि पिछले 50 वर्षों में कई ऐसे अमेरिकी राष्ट्रपति हुए जिन्होंने इजरायल से टकराव मोल लिया और बाद में उन्हें राजनीतिक नुकसान उठाना पड़ा. हालांकि, यह कहना गलत होगा कि उनकी हार की वजह सिर्फ इजरायल था, लेकिन इतिहास बताता है कि इजरायल के साथ टकराव ने उनके लिए मुश्किलें जरूर बढ़ाईं.
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दुनिया अमेरिका को इजरायल का सबसे बड़ा समर्थक मानती है. यह धारणा भी गलत नहीं है. अमेरिका हर साल अरबों डॉलर की सैन्य और आर्थिक मदद इजरायल को देता है. संयुक्त राष्ट्र, फिलिस्तीनियों के नरसंहार के आरोपों से लेकर अंतरराष्ट्रीय मंचों तक अमेरिका हमेशा इजरायल के पक्ष में खड़ा रहा है. लेकिन अमेरिका की राजनीति की कहानी सिर्फ इतनी नहीं है. इसके पीछे एक दूसरा पक्ष भी मौजूद है.
ऐसा पक्ष जिसमें कई अमेरिकी नेताओं ने कभी इजरायल की नीतियों पर सवाल उठाने की कोशिश की, कभी फिलिस्तीनियों के अधिकारों की बात की, तो कभी अमेरिकी हितों को प्राथमिकता देने की कोशिश की. लेकिन इसके बाद उन्हें राजनीतिक कीमत भी चुकानी पड़ी.
जिमी कार्टर: शांति समझौते के नायक, लेकिन इजरायल से पंगा पड़ा महंगा
1977 में जब जिमी कार्टर अमेरिका के राष्ट्रपति बने, तब पश्चिम एशिया लगातार संघर्षों से जूझ रहा था. कार्टर ने अपने कार्यकाल की सबसे बड़ी उपलब्धि 1978 के कैंप डेविड समझौते के रूप में हासिल की. उनकी मध्यस्थता में मिस्र और इजरायल के बीच ऐतिहासिक शांति समझौता हुआ. उस समय दुनिया ने उन्हें शांति निर्माता के रूप में देखा. लेकिन बाद के वर्षों में कार्टर ने इजरायल की कुछ नीतियों पर खुलकर सवाल उठाने शुरू कर दिए.

जिमी कार्टर ने वेस्ट बैंक और गाजा में बन रही इजरायली बस्तियों को अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत अवैध तक बता दिया था. साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि फिलिस्तीनियों के अधिकारों को नजरअंदाज करके स्थायी शांति नहीं लाई जा सकती. उनके इस बयान को एंटी-इजरायल के रूप में देखा गया. इस रुख ने कई इजरायल समर्थक समूहों को नाराज कर दिया.
आंकड़े भी इस बदलाव को दिखाते हैं. 1976 के चुनाव में कार्टर को अमेरिकी यहूदी मतदाताओं का लगभग 71 फीसदी समर्थन मिला था. लेकिन 1980 तक यह समर्थन घटकर करीब 45 फीसदी रह गई. उसी साल कार्टर को रिपब्लिकन उम्मीदवार रोनाल्ड रीगन के हाथों हार का सामना करना पड़ा. बेशक उनकी हार के पीछे ईरान बंधक संकट और कमजोर अर्थव्यवस्था जैसी बड़ी वजहें भी थीं. लेकिन कई राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इजरायल को लेकर उनका रुख भी उनके लिए राजनीतिक बोझ बन गया.
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बाद में जब कार्टर ने अपनी चर्चित किताब "Palestine: Peace Not Apartheid" लिखी. इस किताब के पब्लिश होने के बाद विवाद और बढ़ गया. आलोचकों ने उन पर तीखे हमले किए और धीरे-धीरे उन्हें अमेरिकी मुख्यधारा की राजनीति से लगभग अलग-थलग कर दिया गया.
जॉर्ज डब्ल्यू. बुश: जब राष्ट्रपति खुद को अकेला महसूस करने लगा
1991 में खाड़ी युद्ध जीतने के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू. बुश की लोकप्रियता आसमान छू रही थी. उनकी अप्रूवल रेटिंग लगभग 90 फीसदी तक पहुंच गई थी. ऐसा लग रहा था कि अगला चुनाव उनके लिए आसान होगा. लेकिन इसी दौरान इजरायल ने अमेरिका से 10 अरब डॉलर की लोन गारंटी की मांग कर दी. बुश प्रशासन चाहता था कि इजरायल पहले वेस्ट बैंक में नई बस्तियों का विस्तार रोके.

इजरायल इसके लिए तैयार नहीं हुआ. इसके बाद वाशिंगटन में तीखी लॉबिंग शुरू हुई. कांग्रेस के कई सदस्य खुलकर इजरायल के समर्थन में उतर आए. सितंबर 1991 में बुश ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में खुद को "One Lonely Little Guy" करार दिया था. वह संकेत दे रहे थे कि उनके सामने बेहद प्रभावशाली लॉबिंग नेटवर्क खड़ा है.
एक साल बाद 1992 का चुनाव हुआ और बुश बिल क्लिंटन से हार गए. फिर से यह कहना सही नहीं होगा कि हार की एकमात्र वजह इजरायल था. आर्थिक मंदी और घरेलू मुद्दे भी अहम थे. लेकिन कई राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि इजरायल को लेकर टकराव ने उनकी राजनीतिक मुश्किलें और बढ़ा दी थीं.
नेतन्याहू बनाम अमेरिकी राष्ट्रपति
बेंजामिन नेतन्याहू के दौर में अमेरिका और इजरायल के बीच यह शक्ति संघर्ष और ज्यादा खुलकर दिखाई दिया. 1996 में राष्ट्रपति बिल क्लिंटन और नेतन्याहू के रिश्ते तनावपूर्ण रहे. क्लिंटन को कई बार लगा कि इजरायली नेतृत्व अमेरिकी दबाव और सलाह को गंभीरता से नहीं ले रहा. लेकिन सबसे बड़ा टकराव बराक ओबामा के दौर में सामने आया.

ओबामा प्रशासन ईरान के साथ परमाणु समझौते की दिशा में आगे बढ़ रहा था. नेतन्याहू इसका खुलकर विरोध कर रहे थे. 2015 में उन्होंने अमेरिकी कांग्रेस में जाकर सीधे ओबामा की नीति की आलोचना कर दी. यह अमेरिकी राजनीति में बेहद असाधारण घटना थी. किसी विदेशी नेता द्वारा अमेरिकी राष्ट्रपति की विदेश नीति को कांग्रेस के मंच से चुनौती देना बहुत कम देखने को मिलता है. दिलचस्प बात यह है कि तमाम तनाव के बावजूद 2016 में ओबामा प्रशासन ने इजरायल के साथ 38 अरब डॉलर के सैन्य आर्थिक पैकेज पर हस्ताक्षर किए, जो उस समय का सबसे बड़ा मिलिट्री पैकेज था.
चार्ल्स पर्सी: एक सीनेटर जिसे उदाहरण बना दिया गया
अगर अमेरिकी राजनीति में किसी नेता की हार को इजरायल लॉबी की ताकत का सबसे चर्चित उदाहरण माना जाता है, तो वह नाम है चार्ल्स पर्सी. पर्सी अमेरिकी सीनेट की विदेश संबंध समिति के अध्यक्ष थे और विदेश नीति के प्रभावशाली चेहरों में गिने जाते थे. उन्होंने सवाल उठाया कि अमेरिका बिना किसी शर्त के इजरायल को इतनी बड़ी आर्थिक और सैन्य सहायता क्यों देता है. उन्होंने फिलिस्तीनी मुद्दों पर भी संतुलित रुख अपनाने की वकालत की.
यह बात कई प्रभावशाली समूहों को पसंद नहीं आई. 1984 के चुनाव में उनके खिलाफ एक बड़ा राजनीतिक अभियान चलाया गया. उनके विरोधियों के समर्थन में भारी फंडिंग की गई और चुनावी मशीनरी सक्रिय हो गई. आखिरकार पर्सी चुनाव हार गए. वाशिंगटन में आज भी उनकी हार को एक राजनीतिक चेतावनी की तरह याद किया जाता है. कई विश्लेषकों का मानना है कि इस घटना ने दूसरे नेताओं को संदेश दिया कि इजरायल से जुड़े मुद्दों पर सार्वजनिक रूप से असहमति महंगी पड़ सकती है.
आखिर इजरायल को इतनी ताकत आती कहां से है?
यह सवाल अक्सर पूछा जाता है. अमेरिका में चुनाव बेहद महंगे होते हैं. राष्ट्रपति से लेकर सांसद तक, सभी को चुनाव लड़ने के लिए करोड़ों डॉलर जुटाने पड़ते हैं. यहीं से राजनीतिक फंडिंग और लॉबिंग की भूमिका शुरू होती है. प्रो-इजरायल समूह, राजनीतिक एक्शन कमेटियां (PACs) और उनसे जुड़े सुपर PACs चुनावी अभियानों में बड़ी भूमिका निभाते हैं.
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राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि अक्सर किसी नेता पर सीधे हमला करने के बजाय उसके विरोधी को मजबूत किया जाता है. यानी विरोधी उम्मीदवार को ज्यादा संसाधन, ज्यादा कैंपेन और ज्यादा समर्थन मिलता है. नतीजा यह होता है कि कई नेता अपनी ही पार्टी के प्राथमिक चुनावों में कमजोर पड़ जाते हैं.
क्या हर हार की वजह इजरायल होता है?
यह कहना पूरी तरह ठीक नहीं होगा कि नेताओं के राजनीतिक नुकसान के पीछे सिर्फ इजरायल ही होता है. जिमी कार्टर सिर्फ इजरायल की वजह से नहीं हारे थे. जॉर्ज बुश सीनियर की हार में आर्थिक मंदी बड़ी वजह थी. चार्ल्स पर्सी की हार के पीछे भी कई स्थानीय राजनीतिक कारण थे. लेकिन इतिहास में कई ऐसे उदाहरण मौजूद हैं जहां इजरायल की नीतियों से असहमति रखने वाले नेताओं को राजनीतिक नुकसान उठाना पड़ा.
भले ही हर चुनावी हार के पीछे कई कारण रहे हों, लेकिन यह भी उतना ही सच है कि इजरायल और उससे जुड़ी लॉबियां अमेरिकी राजनीति में लंबे समय से प्रभावशाली रही हैं. शायद यही वजह है कि अमेरिका में आज भी यह धारणा बनी हुई है कि इजरायल से टकराव सिर्फ विदेश नीति का सवाल नहीं होता. कई बार यह किसी नेता के राजनीतिक भविष्य का भी सवाल बन जाता है.