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कैसे ग्रीनलैंड के एक कस्बे ने अमेरिका को द्व‍ितीय व‍िश्व युद्ध जिताया? जानें वो कहानी जो ट्रंप भूल जाते हैं

ट्रंप आज भी ग्रीनलैंड के साथ खनिजों को लेकर सौदे की बात करते हैं ताकि चीन की रेयर-अर्थ मिनरल्स पर पकड़ को कमजोर किया जा सके. लेकिन 1940 के दशक में ग्रीनलैंड ने अमेरिका को उससे भी कहीं ज्यादा दुर्लभ संसाधन मुहैया कराया था.

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द्वितीय विश्व युद्ध के दौर के अमेरिकी सेना वायुसेना के P-51 मस्टैंग फाइटर-बॉम्बर विमान (फोटो: यूएस एयर फोर्स)
द्वितीय विश्व युद्ध के दौर के अमेरिकी सेना वायुसेना के P-51 मस्टैंग फाइटर-बॉम्बर विमान (फोटो: यूएस एयर फोर्स)

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप बार-बार यह दावा करते रहे हैं कि द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान अमेरिका ने डेनमार्क के नाजी जर्मनी के कब्जे में चले जाने के बाद ग्रीनलैंड की रक्षा की थी और बाद में बिना किसी स्वार्थ के उसे लौटा दिया. लेकिन ट्रंप एक बेहद अहम तथ्य का जिक्र कभी नहीं करते.  आइए जानते हैं- वो क्या है. 

इतिहास में क्या छुपा है 
उस दौरान ग्रीनलैंड की रक्षा के बदले अमेरिका और उसके सहयोगियों को एक बेहद दुर्लभ और कीमती खनिज तक पहुंच भी मिली थी. वो था क्रायोलाइट. यही खनिज युद्ध के दौरान फाइटर विमानों के निर्माण में निर्णायक साबित हुआ.

ट्रंप आज भी ग्रीनलैंड के साथ खनिजों को लेकर सौदे की बात करते हैं ताकि चीन की रेयर-अर्थ मिनरल्स पर पकड़ को कमजोर किया जा सके. लेकिन 1940 के दशक में ग्रीनलैंड ने अमेरिका को उससे भी कहीं ज्यादा दुर्लभ संसाधन मुहैया कराया था.

द्वितीय विश्व युद्ध में मित्र देशों की जीत का एक बड़ा कारण उनकी जबरदस्त हवाई ताकत थी. लेकिन इतने बड़े पैमाने पर विमान बनाने के लिए एल्यूमीनियम चाहिए था. और उस समय एल्यूमीनियम बनाने के लिए क्रायोलाइट अनिवार्य था जो पर्याप्त मात्रा में पूरी दुनिया में सिर्फ एक ही जगह मिलता था, वो था ग्रीनलैंड के इविटूट कस्बे में.

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क्या है क्रायोलाइट, जिसने अमेरिका को युद्ध में जीत दिलाने में मदद की?

क्रायोलाइट, जिसे वैज्ञानिक भाषा में सोडियम हेक्साफ्लोरोएल्यूमिनेट कहा जाता है, एक दुर्लभ खनिज है. यह देखने में बर्फ जैसा पारदर्शी और सफेद होता है. इसका नाम ग्रीक शब्द 'क्रायोस' (ठंड) और 'लिथोस' (पत्थर) से निकला है.

इतिहास में इसका इस्तेमाल एल्यूमीनियम बनाने की हॉल-हेरोल्ट प्रक्रिया में फ्लक्स के तौर पर होता था, जिससे बॉक्साइट का गलनांक कम हो जाता था और धातु बनाना आसान होता था.

प्राकृतिक क्रायोलाइट बेहद दुर्लभ है. इसका एकमात्र व्यावसायिक रूप से उपयोगी भंडार दक्षिण-पश्चिमी ग्रीनलैंड के इविटूट में था, जहां 1854 से 1987 तक खनन हुआ. आज इसके सिंथेटिक विकल्प का इस्तेमाल किया जाता है.

ग्रीनलैंड के इवित्तुत कस्बे में क्रायोलाइट की खदान, वर्ष 1940 की गर्मियों में (फोटो: यूनाइटेड स्टेट्स जियोलॉजिकल सर्वे)

इविटूट: ग्रीनलैंड का वो कस्बा जिसने इतिहास बदल दिया

इविटूट आज एक वीरान कस्बा है. साल 2000 के आसपास आखिरी निवासी यहां से चले गए. अब यहां खंडहर, पानी से भरी खुली खदान और एक कब्रिस्तान बचा है.

लेकिन कभी यही जगह दुनिया में प्राकृतिक क्रायोलाइट का इकलौता स्रोत थी. डेनमार्क द्वारा संचालित यह खनन बस्ती रणनीतिक रूप से बेहद अहम थी, जहां अस्पताल, बैरक, प्रशासनिक दफ्तर और प्रोसेसिंग यूनिट मौजूद थीं.

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क्रायोलाइट की पहचान 1799 में डेनिश रसायनशास्त्री पीडर क्रिश्चियन एबिल्डगार्ड ने की थी. 1854 में इसका व्यावसायिक खनन शुरू हुआ और धीरे-धीरे यह एल्यूमीनियम उत्पादन के लिए बेहद अहम बन गया.

ग्रीनलैंड जियोलॉजिकल सर्वे के मुताबिक, 1854 से 1987 के बीच यहां से करीब 37 लाख मीट्रिक टन अयस्क निकाला गया.

द्वितीय विश्व युद्ध में इविटूट की निर्णायक भूमिका

युद्ध के दौरान विमानन शक्ति निर्णायक थी. लड़ाकू और बमवर्षक विमानों के लिए हल्का और जंग-रोधी एल्यूमीनियम जरूरी था. बिना क्रायोलाइट के बड़े पैमाने पर एल्यूमीनियम बनाना लगभग असंभव था.

1940 में जब नाजी जर्मनी ने डेनमार्क पर कब्जा किया, तब ग्रीनलैंड के अधिकारियों ने क्रायोलाइट को सौदेबाजी के हथियार की तरह इस्तेमाल किया. अमेरिकी सुरक्षा के बदले अमेरिका को इस खनिज तक पहुंच दी गई. 9 अप्रैल 1941 को अमेरिका और डेनमार्क के बीच हुल-कॉफमैन समझौता हुआ, जिसके तहत अमेरिका ने ग्रीनलैंड की रक्षा की जिम्मेदारी ली. उस समय अमेरिका औपचारिक रूप से युद्ध में भी शामिल नहीं हुआ था.

अमेरिका ने वहां सैन्य ठिकाने बनाए, नौसैनिक अड्डे स्थापित किए और खदान की सुरक्षा सुनिश्चित की. 1942 में क्रायोलाइट का उत्पादन अपने चरम पर था करीब 86,000 टन, जो अमेरिका और कनाडा भेजा गया. उसी साल जर्मनी और जापान ने मिलकर करीब 25,000 विमान बनाए, जबकि अमेरिका अकेले 47,000 से ज्यादा विमान बनाने में सफल रहा. ग्रीनलैंड के एक इतिहासकार के मुताबिक क्रायोलाइट के बिना मित्र राष्ट्र ब्रिटेन की लड़ाई नहीं जीत पाते और जर्मनी पर बमबारी संभव नहीं होती.

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डावोस में दिए गए अपने हालिया भाषण में ट्रंप ने कहा कि अमेरिका ने ग्रीनलैंड की रक्षा की और बदले में कुछ नहीं लिया. लेकिन हकीकत यह है कि ग्रीनलैंड के बिना द्वितीय विश्व युद्ध में अमेरिका की जीत कहीं ज्यादा लंबी और कठिन होती. सच्चाई ये है कि ग्रीनलैंड ने आसमान में ज्यादा पंख देकर अमेरिका को युद्ध जिताने में मदद की.

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रिपोर्ट: शौनक सान्याल
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