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रूसी तेल ढो रहे 'जॉम्बी' जहाज... इन खतरों को नजरअंदाज क्यों कर रही कंपनियां

होर्मुज स्ट्रेट में रुकावट के कारण भारत, चीन और अन्य एशियाई देशों के लिए सस्ता और भरोसेमंद तेल और गैस हासिल करना चुनौती बन गया है. रूस पर पश्चिमी प्रतिबंधों के बावजूद कई एशियाई देश रूस से तेल खरीद रहे हैं, जो डार्क फ्लीट के जरिए गुप्त रूप से पहुंचाया जा रहा है.

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रूस का तेल शैडो फ्लीट्स ढो रह हैं (Photo: Reuters)
रूस का तेल शैडो फ्लीट्स ढो रह हैं (Photo: Reuters)

होर्मुज स्ट्रेट ब्लॉकेड के बीच भारत-चीन जैसे एशियाई देशों के लिए इस समय सबसे बड़ी चिंता सस्ता और भरोसेमंद तेल और गैस हासिल करना है. एक्सपर्ट्स का कहना है कि इसी कारण कई एशियाई देश रूस पर लगे पश्चिमी प्रतिबंधों को नजरअंदाज कर तेल खरीद रहे हैं.

अभी राजनीतिक स्तर पर भी इस बात को लेकर ज्यादा चिंता नहीं दिख रही कि रूस का तेल बड़ी मात्रा में एक तथाकथित 'डार्क फ्लीट' यानी गुप्त टैंकर बेड़े के जरिए एशिया पहुंच रहा है.

ईरान पर अमेरिका-इजरायल युद्ध की वजह से मार्च से ब्रेंट क्रूड की कीमत 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर पहुंच गई थी. हालांकि, हाल के दिनों में अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत शुरू होने से कीमतें कुछ नरम हुई हैं और करीब 93 डॉलर प्रति बैरल पर आ गई हैं.

लेकिन होर्मुज स्ट्रेट में रुकावट से मध्य-पूर्वी देशों का तेल-गैस एशिया के बाकी हिस्सों तक नहीं पहुंच रहा जिससे भारत-चीन जैसी बड़ी अर्थव्यवस्थाओं पर भी असर हुआ है. ऐसे में देशों के लिए सबसे अहम सवाल यह है कि उन्हें लगातार और भरोसेमंद ईंधन कहां से मिलेगा.

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रूस ने यूक्रेन पर हमला किया था, जिसके बाद अमेरिका और यूरोपीय संघ ने उसकी तेल और गैस कंपनियों पर प्रतिबंध लगाए. लेकिन इसके बावजूद रूस एशिया में पुराने और नए दोनों तरह के ग्राहकों को बड़ी मात्रा में तेल बेच रहा है.

कमोडिटी एनालिटिक्स फर्म केप्लर के आंकड़ों के मुताबिक मई 2026 में भारत ने रूस से रोजाना करीब 19 लाख बैरल कच्चा तेल आयात किया, जबकि मई 2022 में यह आंकड़ा सिर्फ 7.68 लाख बैरल प्रतिदिन था.

इंडोनेशिया ने भी कच्चे तेल के लिए कर ली रूस से डील

इंडोनेशिया ने भी कहा है कि वो इस साल रूस से 15 करोड़ बैरल कच्चा तेल आयात करने की योजना के लिए नियम-कानून तैयार कर रहा है. मार्च में इंडोनेशिया के राष्ट्रपति प्रबोवो सुबियांतो और रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की बैठक के बाद यह योजना सामने आई थी. इंडोनेशिया का टार्गेट रूस से हर दिन लगभग 7 लाख बैरल तेल खरीदना है. हालांकि अब तक सिर्फ एक खेप ही इंडोनेशिया पहुंची है.

उधर, चीन ने फरवरी 2026 में रूस से करीब 19.2 लाख बैरल प्रतिदिन कच्चा तेल आयात किया था, हालांकि मार्च से मई के बीच इसमें कुछ कमी आई.

चीन रूस से ज्यादातर तेल और गैस पाइपलाइन के जरिए मंगाता है, जबकि दक्षिण-पूर्व एशियाई देश मुख्य रूप से समुद्री मार्गों पर निर्भर हैं.

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डार्क फ्लीट क्या है?

विशेषज्ञों के मुताबिक, रूस समेत प्रतिबंध झेल रहे देशों का तेल एक 'डार्क फ्लीट' के जरिए दुनिया भर में पहुंचाया जा रहा है. यह ऐसे टैंकरों का नेटवर्क है जो अक्सर अपनी पहचान और गतिविधियां छिपाकर काम करते हैं.

समुद्री व्यापार से जुड़ी संस्था लॉयड्स लिस्ट की जुलाई 2025 की रिपोर्ट में मलेशिया को प्रतिबंधित तेल के ट्रांसफर का बड़ा केंद्र बताया गया था. रिपोर्ट के अनुसार हर महीने 50 से ज्यादा मामलों में जहाजों ने अपने AIS (Automatic Identification System) ट्रैकिंग सिग्नल बंद किए या गलत जानकारी दी ताकि उनकी सही स्थिति और गतिविधियां छिपी रहें.

डार्क फ्लीट्स में बहुत से कबाड़ हो चुके जहाज भी शामिल होते हैं जिन्हें 'जॉम्बी' जहाज कहा जाता है. जॉम्बी जहाज ऐसे पुराने या संदिग्ध जहाजों को कहा जाता है जो अपनी असली पहचान छिपाकर समुद्र में काम करते हैं. इन्हें 'जॉम्बी जहाज' इसलिए कहा जाता है क्योंकि कागजों में इनकी पहचान बार-बार बदल जाती है और कई बार ये ऐसे जहाज लगते हैं जो मानो 'मरे हुए' रिकॉर्ड से फिर जिंदा होकर लौट आए हों.

मलेशिया के समुद्री इलाकों में पुराने और बार-बार नाम बदलने वाले इन जहाजों में आग लगने और तेल रिसाव जैसी घटनाएं भी होती रही है. वहीं, यूरोप में समुद्र के नीचे बिछी कम्यूनिकेशन केबलों को नुकसान पहुंचाने के आरोप भी कुछ ऐसे जहाजों पर लगे हैं.

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संघर्ष निगरानी संस्था आर्मर्ड कनफ्लिक्ट लोकेशन एंड इवेंट डेटा (ACLED) के वरिष्ठ विश्लेषक वितोल्ड स्तुपनिकी ने कहा, 'मुझे नहीं लगता कि एशियाई समंदर में इस तरह के तोड़फोड़ की घटनाएं दर्ज हैं जिनकी तुलना बाल्टिक सागर में देखी जा रही घटनाओं से की जा सके. लेकिन यह भी सच है कि वही जहाजों का बेड़ा रोजाना एशिया भी आता-जाता है.'

रिस्क के बावजूद यह उम्मीद की जा रही है कि ASEAN देश रूस से जुड़े मुद्दों को उठाने से बचेंगे, क्योंकि उनकी प्राथमिकता फिलहाल अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा करना है.

काउंसिल ऑन फॉरेन रिलेशन्स में दक्षिण-पूर्व एशिया और दक्षिण एशिया मामलों के वरिष्ठ फेलो जोशुआ कर्लांजिक ने कहा, 'रूस के इस क्षेत्र के कई देशों के साथ करीबी संबंध हैं. मौजूदा ऊर्जा संकट में दक्षिण-पूर्व एशिया के कई देश बुरी तरह प्रभावित हुए हैं और वे रूस की ओर रुख कर रहे हैं. ये हकीकत और ASEAN की पारंपरिक धीमी कार्यशैली को देखते हुए, वे इस मुद्दे को जितना संभव हो सके उतना नजरअंदाज करेंगे.'

रूस पर निर्भरता बहुत सी शर्तों के साथ आती है

हालांकि जकार्ता स्थित सेंटर फॉर स्ट्रैटेजिक एंड इंटरनेशनल स्टडीज के शोधकर्ता निकी डोमिनिक फहरिजाल ने चेतावनी दी कि रूस पर निर्भरता अक्सर बहुत सी शर्तों के साथ आती है.

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उन्होंने कहा, 'कूटनीतिक दुविधा पैदा होना तय है. सवाल यह नहीं है कि ऐसा होगा या नहीं, बल्कि यह है कि यह कब होगा.'

उन्होंने यह भी कहा कि रूस से जुड़े टैंकरों पर विशेष नजर रखने की जरूरत है, खासकर तब जब उनकी गतिविधियां सिर्फ तेल आयात तक सीमित न रहें.

फहरिजाल ने कहा, 'जैसे-जैसे पश्चिमी देश, खासकर अमेरिका और यूरोपीय संघ, रूस को एक खतरे के रूप में पेश कर रहे हैं, वैसे-वैसे यह रिस्क भी बढ़ रहा है कि कूटनीतिक दुविधा आगे चलकर सुरक्षा संकट का रूप ले ले.'

ACLED का कहना है कि शैडो फ्लीट समुद्र में संदिग्ध गतिविधियों के लिए संभावित प्लेटफॉर्म बन सकता है. संस्था ने समुद्र के नीचे केबलों को कथित नुकसान, ड्रोन से जुड़ी घटनाओं, जहाजों की जब्ती और बाल्टिक तथा उत्तरी सागर में रूस की जवाबी गतिविधियों का हवाला दिया.

रूस पर कड़े होते प्रतिबंध

इस बीच यूरोपीय संघ, ब्रिटेन और अमेरिका लगातार प्रतिबंध कड़े कर रहे हैं, फिर भी रूस वैश्विक बाजार में तेल की आपूर्ति बनाए हुए है.

30 अप्रैल को जारी ब्रिटेन की संसद, हाउस ऑफ कॉमन्स की एक ब्रीफिंग के मुताबिक, ब्रिटेन ने रूस से जुड़े 3,252 व्यक्तियों, संस्थाओं और जहाजों पर प्रतिबंध लगाए हैं. वहीं यूरोपीय संघ ने 2,700 से अधिक व्यक्तियों और संस्थाओं तथा 623 शैडो फ्लीट जहाजों के खिलाफ कार्रवाई की है.

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हालांकि पश्चिमी देशों के प्रतिबंध अपने-आप तटीय देशों को संदिग्ध जहाजों पर चढ़ने या उन्हें जब्त करने का अधिकार नहीं देते.

संयुक्त राष्ट्र समुद्री कानून संधि (UNCLOS) के तहत किसी जहाज के खिलाफ कार्रवाई के लिए अधिकारियों को आपराधिक गतिविधि के सबूत या यह साबित करना होता है कि जहाज प्रभावी रूप से किसी देश के अधिकार क्षेत्र में नहीं है. इसी कानूनी खामी की वजह से रूस का शैडो फ्लीट अब भी सक्रिय है.

एशिया के लिए अब यह सवाल खड़ा हो गया है कि क्षेत्रीय सरकारें कानूनी या राजनीतिक रूप से आखिर क्या कर सकती हैं.

समुद्री कानून विशेषज्ञों का कहना है कि मलेशिया जैसे दक्षिण-पूर्व एशियाई तटीय देश अपने विशेष आर्थिक क्षेत्र (EEZ) में सिर्फ इसलिए किसी जहाज पर चढ़ नहीं सकते या उसे रोक नहीं सकते क्योंकि उस पर पश्चिमी देशों ने प्रतिबंध लगाए हैं.

यूनिवर्सिटी सैन्स इस्लाम मलेशिया के रिसर्चर मोहद हाजमी मोहद रुस्ली ने कहा, 'मलेशिया सिर्फ इसलिए किसी जहाज पर चढ़ नहीं सकता या उसे हिरासत में नहीं ले सकता क्योंकि उस पर यूरोपीय संघ, अमेरिका या ब्रिटेन ने प्रतिबंध लगाए हैं.'

विशेषज्ञों का कहना है कि अगर किसी शैडो फ्लीट जहाज को समुद्र के नीचे केबलों या महत्वपूर्ण ढांचे के पास संदिग्ध गतिविधियां करते देखा जाता है, तो संबंधित देश निगरानी बढ़ा सकते हैं और जानकारी मांग सकते हैं. लेकिन बिना स्पष्ट सबूत के सीधे कार्रवाई करना अब भी कानूनी रूप से मुश्किल है.

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यानी एशिया के सामने फिलहाल दुविधा साफ है- एक तरफ सस्ते और भरोसेमंद रूसी तेल की जरूरत है, दूसरी तरफ उसी तेल को ढोने वाले जहाजों से जुड़े सुरक्षा और कूटनीतिक जोखिम भी लगातार बढ़ रहे हैं.

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