अमेरिका-ईरान जंग के बीच राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का हालिया संबोधन सिर्फ सैन्य दावों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उन्होंने इतिहास का सहारा लेकर एक बड़ा संकेत दे दिया. यह जंग जल्दी खत्म होने वाली नहीं है. ट्रंप ने अपने भाषण में अमेरिकी जनता को समझाने की कोशिश की कि मौजूदा संघर्ष लंबा नहीं, बल्कि "छोटा" है, और इसके मुकाबले अमेरिका पहले कहीं ज्यादा लंबी और मुश्किल जंगें लड़ चुका है. इसके साथ ही उन्होंने कहा कि ईरान में उनकी जंग तो सिर्फ 32 दिनों से ही चल रही है.
अपने तर्क को मजबूत करने के लिए ट्रंप ने पुराने युद्धों का पूरा हिसाब सामने रखा. उन्होंने कहा, "पहला विश्व युद्ध एक साल, सात महीने और पांच दिन चला. दूसरा विश्व युद्ध तीन साल, आठ महीने और 25 दिन तक चला. कोरियाई युद्ध तीन साल से ज्यादा चला. वियतनाम युद्ध 19 साल, पांच महीने और 29 दिन तक चला. इराक युद्ध आठ साल से ज्यादा चला." इन उदाहरणों के जरिए ट्रंप ने यह बताने की कोशिश की कि ईरान के खिलाफ चल रहा सैन्य अभियान अभी बहुत शुरुआती चरण में है.
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ट्रंप ने कहा कि अमेरिका इस ऑपरेशन में सिर्फ 32 दिन से है और इस दौरान ईरान की सैन्य क्षमता को "लगभग खत्म" कर दिया गया है. उन्होंने दावा किया कि ईरान अब "कोई बड़ा खतरा नहीं" रहा. साथ ही उन्होंने भरोसा दिलाया कि अमेरिका जल्द ही अपने "कोर स्ट्रैटेजिक ऑब्जेक्टिव्स" पूरे कर लेगा और "काम खत्म कर देगा."
हालांकि, ट्रंप के इन दावों के पीछे एक राजनीतिक संदेश भी साफ नजर आता है. अमेरिका के भीतर इस जंग को लेकर असंतोष बढ़ रहा है. 13 अमेरिकी सैनिकों की मौत, बढ़ती महंगाई और तेल की कीमतों में उछाल ने आम जनता की चिंता बढ़ा दी है. यहां तक कि ट्रंप के अपने समर्थकों के बीच भी यह सवाल उठने लगे हैं कि अमेरिका इस जंग में क्यों शामिल है.
यही वजह है कि ट्रंप ने इस जंग को "इन्वेस्टमेंट" बताते हुए लोगों को भरोसा दिलाने की कोशिश की कि यह एक जरूरी कदम है. लेकिन दूसरी तरफ, उनके बयान खुद ही कई बार बदलते रहे हैं. कभी वह कहते हैं कि जंग जल्द खत्म हो जाएगी, तो कभी अगले 2-3 हफ्तों में और बड़े हमलों की बात करते हैं.
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जमीनी हकीकत भी ट्रंप के दावों से अलग तस्वीर दिखा रही है. एक तरफ अमेरिका सीजफायर की बात कर रहा है, तो दूसरी तरफ हजारों सैनिकों को मिडिल ईस्ट में तैनात किया जा रहा है. कूटनीतिक स्तर पर अमेरिका ने 15-सूत्रीय प्रस्ताव भी भेजा है, जिसमें होर्मुज स्ट्रेट को खोलने और ईरान के परमाणु कार्यक्रम को सीमित करने की बात कही गई है.
वहीं, ईरान ने साफ कर दिया है कि वह सीधे बातचीत के लिए तैयार नहीं है. ईरानी विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने कहा कि "भरोसे का स्तर शून्य है" और अगर अमेरिका जमीनी हमला करता है, तो ईरान जवाब देने के लिए तैयार है.