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कहानी मेरी जुबानी: बेरूत में जंग के बीच इंसानियत की मिसाल... लोग बांट रहे उम्मीद और भोजन, मौत के साये में जिंदगी

बेरूत में जंग और विस्थापन के बीच आम लोग एक-दूसरे की मदद कर इंसानियत की मिसाल पेश कर रहे हैं, जहां हर दिन छोटे प्रयास बड़ी उम्मीद बन रहे हैं. लोग खाना, पानी, गर्म कपड़े जैसे चीजों दूसरे लोगों को देकर इस संकट की घड़ी में मदद कर रहे हैं.

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जंग के साये में जिंदगी - विस्थापन के बीच एक-दूसरे को संभालते लोग (Photo: ITG)
जंग के साये में जिंदगी - विस्थापन के बीच एक-दूसरे को संभालते लोग (Photo: ITG)

लेबनान की राजधानी बेरूत में सूरज अभी पूरी तरह निकला भी नहीं था. एक पुरानी, घिसी हुई वैन एक तरफ रुकी. पीछे का दरवाजा खुला. अंदर चावल, दाल, और अभी-अभी बनी गर्म रोटियां, करीने से लपेटी हुई. सौ खाने के डिब्बे.

हुसैन ने मुझसे कहा, लगभग माफी मांगते हुए, "सौ खाने हैं. शायद कम पड़ें." वो पिछले दस दिनों से यही कर रहा है. हर सुबह त्रिपोली से बेरूत. जब से लोगों को घर छोड़ने के आदेश मिले और लाखों लोग सड़कों पर आ गए.

जब वैन रुकती है तो लोग पहले से इंतजार में होते हैं. कोई धक्का-मुक्की नहीं. कोई शोर नहीं. बस थके हुए चेहरे. बच्चों को गोद में उठाए माएं. हाथों में छोटे-छोटे थैले जिनमें शायद पूरी जिंदगी समेटी हुई है. हुसैन ने अपने साथियों से धीरे से कहा, "पहले बच्चों को दो." किसी ने कोई सवाल नहीं किया.

यहां हर तरफ कहानियां हैं. एक के बाद एक. सब एक जैसी, सब अलग. एक मां ने बताया कि वो आधी रात को घर से निकली सिर्फ कागज और एक कंबल लेकर.

एक बुजुर्ग ने कहा कि नींद नहीं आती. डर से नहीं, बल्कि इसलिए कि बार-बार यही सोचता है कि जो घर ताला लगाकर आया हूं वो अभी भी खड़ा है या नहीं.
करीब दस लाख लोग बेघर हैं. आधे से ज्यादा सिर्फ दक्षिणी बेरूत से. यह संख्या इतनी बड़ी है कि दिमाग इसे समझ नहीं पाता. जब तक आप किसी स्कूल में न जाएं जो अब शरणस्थली बन गया हो. जहां क्लासरूम में किताबों की जगह गद्दे बिछे हों. जहां हर कोना किसी और का दर्द उठाए हो.

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लेकिन इस सब के बीच कुछ और भी हो रहा है. जिस औरत ने कल हुसैन से खाना लिया था वो आज खाना बांटने में मदद कर रही है. जो लड़का कल खाली हाथ आया था वो आज रात को कंबल बांट रहा है. किसी ने गाड़ी की बैटरी से फोन चार्ज करने का इंतजाम किया. ताकि लोग अपने घरवालों को बता सकें कि "हम ठीक हैं. हम जिंदा हैं."

हुसैन ज्यादा देर नहीं रुकता. सारे डिब्बे बंट जाते हैं. वो हाथ पोंछता है. एक बार चारों तरफ नजर घुमाता है. जैसे सब कुछ याद कर रहा हो और फिर वैन में बैठ जाता है. मैंने पूछा, "कल भी आओगे?" उसने कहा, "इंशाअल्लाह. अगर रास्ता खुला रहा."

कोई नाटक नहीं. कोई बड़ी बात नहीं. बस एक वादा - जो हर रोज नए सिरे से करना पड़ता है. अनिश्चितता के बावजूद. जैसे ही वो जाता है दूसरा ग्रुप आता है. अलग चेहरे, एक ही मकसद. रोटी, पानी, दवाई. छोटी-छोटी चीजें जो ऐसे वक्त में सब कुछ बन जाती हैं.

जंग जिंदगी को उसकी सबसे कठोर हद तक ले जाती है. लेकिन यहां डर और जिंदगी के इस संकरे रास्ते पर लोग चुपचाप एक-दूसरे को थामे हुए हैं.
और कभी-कभी यह कुछ ऐसा दिखता है एक आदमी, भोर में, सौ खाने लेकर निकलता है. यह मानते हुए कि यह मायने रखता है.

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