बांग्लादेश को आज तारिक रहमान के रूप में नया प्रधानमंत्री मिल गया है. बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) ने 12 फरवरी को हुए चुनाव में भारी जीत हासिल की है और अब पार्टी आज सरकार बना रही है. मंगलवार को तारिक रहमान को बीएनपी के संसदीय दल का नेता चुना गया जिसके बाद उन्होंने प्रधानमंत्री पद की शपथ ले ली है. उनकी जीत और शपथ ग्रहण की चर्चा पाकिस्तान की मीडिया में भी खूब हो रही है.
बांग्लादेश से अवामी लीग की नेता शेख हसीना का जाना पाकिस्तान के हित में रहा है क्योंकि उन्होंने पाकिस्तान को लेकर कड़ा रुख अपनाया था. अवामी लीग के समय पाकिस्तान-बांग्लादेश के रिश्ते निचले स्तर पर रहे. 1971 में पाकिस्तान से अलग होकर नए बने बांग्लादेश ने पाकिस्तान के साथ दुश्मनी वाला रुख कायम रखा लेकिन शेख हसीना के जाते ही सारा पासा पलट गया. जमात-ए-इस्लामी के प्रभाव वाली मोहम्मद यूनुस की अंतरिम सरकार ने पाकिस्तान के साथ अपने रिश्तों को मजबूत किया और भारत बांग्लादेश से दूर होता गया.
बीएनपी जमात की तरह पाकिस्तान के करीब नहीं है लेकिन पाकिस्तान के प्रति इसने नरम रुख अपनाया है. इसे देखते हुए बीएनपी की जीत को पाकिस्तान में सकारात्मक तरीके से देखा जा रहा है. हालांकि, तारिक रहमान ने साफ कर दिया है कि उनके लिए न तो भारत, न ही पाकिस्तान बल्कि बांग्लादेश पहले है.
तारिक रहमान के पीएम बनने को पाकिस्तानी मीडिया कैसे देख रहा?
पाकिस्तान के प्रमुख अखबार 'द एक्सप्रेस ट्रिब्यून' के एक लेख में लिखा गया है कि बांग्लादेश आम चुनावों के नतीजों ने न केवल ढाका की घरेलू राजनीति को नई दिशा दी है, बल्कि दक्षिण एशिया की क्षेत्रीय भू-राजनीति को फिर से संतुलित करने की प्रक्रिया शुरू कर दी है.
इस लेख का शीर्षक है- 'दिल्ली की उलझन, इस्लामाबाद का मौका' (Delhi's dilemma, Islamabad's moment)
लेख में शेख हसीना के कार्यकाल पर कई आरोप लगाए गए जैसे उन्होंने चुनावी हेरफेर किया, लोकतंत्र को कमजोर किया और ध्रुवीकरण को बढ़ावा दिया.
पाकिस्तानी अखबार में लिखा गया, 'तारिक रहमान की जीत पर क्षेत्र के देशों की प्रतिक्रिया भी तुरंत सामने आई. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और शहबाज शरीफ उन पहले वर्ल्ड लीडर्स में शामिल थे जिन्होंने तारिक रहमान को बधाई दी. इन बधाई संदेशों के मायने अहम हैं. भारत, जिसने शेख हसीना के साथ संबंधों में भारी निवेश किया था, के लिए यह संदेश एक व्यावहारिक बदलाव का संकेत था, जबकि पाकिस्तान के लिए यह दशकों बाद उभरता मौका था.'
पाकिस्तानी अखबार ने आगे लिखा कि भारत शेख हसीना को एक भरोसेमंद साझेदार मानता था, खासकर अपने संवेदनशील पूर्वोत्तर क्षेत्र से जुड़ी सुरक्षा चिंताओं को देखते हुए. वहीं BNP ऐतिहासिक रूप से पाकिस्तान के प्रति नरम रुख रखती रही है और भारत की क्षेत्रीय भूमिका पर शक करती है.
लेख में लिखा गया, 'बांग्लादेश में भारत-विरोधी भावनाएं अब भी एक अहम पॉलिटिकल फैक्टर हैं, खासकर उन लोगों के लिए जो भारत की आर्थिक असमानता और राजनीतिक दखलंदाजी महसूस करते हैं. BNP की चुनावी जीत कुछ हद तक लोगों की इसी मनोदशा को दिखाती है. हालांकि, भारत-बांग्लादेश संबंधों की आगे की राह आसान नहीं होगी.'
पाकिस्तान के लिए डिप्लोमेसी का मौका
पाकिस्तान के ब्रॉडकास्टर जियो टीवी पर पाकिस्तानी पत्रकार अजाज सईद लिखते हैं कि '2024 में भारत ने बांग्लादेश को लेकर गलत आकलन किया और उसी का नतीजा आज भुगत रहा है. इधर, पाकिस्तान को डिप्लोमेसी के नए मौके मिल रहे हैं. 5 अगस्त 2024 को शेख हसीना के भारत जाने के बाद आम लोगों में भारत-विरोधी भावना बनी हुई है, लेकिन यह भावना भारतीय लोगों के खिलाफ ज्यादा नहीं बल्कि उनकी सरकार के खिलाफ है.'
लेख में आगे लिखा गया, 'भारत की यह नीति कि उसने अपना सारा दांव आवामी लीग और शेख हसीना पर लगाया, महंगी साबित हुई है. हालांकि, अब वो संबंधों को फिर से मजबूत करने की कोशिश कर रहा है. भारत को लगता है कि उसकी नीति में गलतियां हुईं, या कम से कम अब वो ये बात तो समझ चुका है कि BNP अब जनादेश के साथ नई राजनीतिक सच्चाई बन चुकी है.'