scorecardresearch
 

जंग के बीच अमेरिका ने खोजा कमाई का नया रास्ता! अरब देशों से मोटा पैसा बनाने की तैयारी

ईरान जंग के बीच अमेरिका अब सिर्फ हथियारों की बिक्री तक सीमित नहीं रहना चाहता. ट्रंप प्रशासन खाड़ी देशों से कह रहा है कि वे अपने तबाह इंफ्रास्ट्रक्चर को दोबारा खड़ा करने के लिए अमेरिकी कंपनियों का इस्तेमाल करें. अरब देशों को यह कदम थोड़ा असहज लग रहा है, लेकिन इसमें अरबों डॉलर के बड़े कारोबार की संभावना छिपी है.

Advertisement
X
ट्रंप प्रशासन खाड़ी देशों पर कॉन्ट्रेक्ट के लिए दबाव भी बना रहा है. (Photo- ITG)
ट्रंप प्रशासन खाड़ी देशों पर कॉन्ट्रेक्ट के लिए दबाव भी बना रहा है. (Photo- ITG)

ईरान के साथ जंग के बीच अमेरिका अब कमाई के नए रास्ते तलाशता नजर आ रहा है. आम तौर पर यह धारणा रही है कि अमेरिका युद्ध के दौरान हथियार बेचकर मुनाफा कमाता है, लेकिन इस बार मामला थोड़ा अलग दिख रहा है. डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन अब खाड़ी देशों के पुनर्निर्माण में अपनी कंपनियों को आगे लाने की रणनीति पर काम कर रहा है.

रिपोर्ट्स के मुताबिक, अमेरिका ने कुवैत, बहरीन और यूएई जैसे देशों से कहा है कि वे ईरान के हमलों से हुए नुकसान की भरपाई के लिए अमेरिकी इंजीनियरिंग, मैन्युफैक्चरिंग और कंस्ट्रक्शन कंपनियों की सेवाएं लें. अमेरिकी अधिकारियों का कहना है कि यह "अमेरिका फर्स्ट" नीति का हिस्सा है.

दरअसल, ईरान के जवाबी हमलों में खाड़ी क्षेत्र को भारी नुकसान हुआ है. ऊर्जा क्षेत्र से जुड़े इंफ्रास्ट्रक्चर की मरम्मत पर ही करीब 39 अरब डॉलर तक का खर्च आ सकता है. ऐसे में यह बिजनेस का  एक बड़ा मौका बनकर सामने आया है. हालांकि, अरब बेस्ड मीडिया रिपोर्ट्स की मानें तो कुछ अरब देशों का मानना है कि अमेरिका का यह कदम "थोड़ा असंवेदनशील" है, क्योंकि क्षेत्र में अभी भी युद्ध का खतरा बना हुआ है.

ईरान जंग में कहां कितना नुकसान हुआ?

Advertisement

कुवैत और बहरीन जैसे देशों को इस जंग में भारी नुकसान झेलना पड़ा है. कुवैत में एयरबेस, एयरपोर्ट और पावर प्लांट्स को नुकसान पहुंचा, जबकि बहरीन के पोर्ट, रिफाइनरी और इंडस्ट्रियल साइट्स पर भी हमले हुए. यहां तक कि टेक कंपनियों के इंफ्रास्ट्रक्चर को भी नुकसान की खबरें सामने आई हैं.

खाड़ी के उत्तर-पूर्वी हिस्से में स्थित कुवैत आमतौर पर लो प्रोफाइल में रहता है, लेकिन यहां दुनिया में चौथी सबसे बड़ी अमेरिकी सैन्य मौजूदगी है. ईरानी हमलों में अमेरिका के अहम ठिकानों जैसे कैम्प आरिफजान और अली अल-सलेम एयरबेस को निशाना बनाया गया. इसके अलावा कुवैत इंटरनेशनल एयरपोर्ट को भी भारी नुकसान पहुंचा. रिपोर्ट्स के मुताबिक, देश के कम से कम दो बड़े पावर प्लांट और पानी के डिसैलिनेशन प्लांट भी हमलों की चपेट में आए, जिससे ऊर्जा और पानी सप्लाई पर दबाव बढ़ा.

बहरीन पर भी खूब बरसे ईरानी मिसाइल-ड्रोन

इसी तरह बहरीन को भी ईरानी हमलों का गंभीर खामियाजा भुगतना पड़ा. यह छोटा सा द्वीपीय देश, जो सऊदी अरब से किंग फहद कॉजवे के जरिए जुड़ा है, रणनीतिक रूप से बेहद अहम है. बहरीन का पोर्ट, जहां अमेरिकी नौसेना का फिफ्थ फ्लीट तैनात है, सीधे हमलों का निशाना बना. इसके अलावा कई इंडस्ट्रियल साइट्स को भी नुकसान पहुंचा. इन हमलों ने देश की आर्थिक गतिविधियों और लॉजिस्टिक्स सिस्टम को बुरी तरह प्रभावित किया.

Advertisement

हमलों का असर सिर्फ पारंपरिक इंफ्रास्ट्रक्चर तक सीमित नहीं रहा, बल्कि टेक और इंडस्ट्री सेक्टर भी इससे अछूते नहीं रहे. अमेजन के क्लाउड ऑपरेशंस पर भी हमला हुआ, जबकि एल्यूमिनियम बहरीन जैसे बड़े इंडस्ट्रियल प्लांट को भारी नुकसान के बाद 'फोर्स मेज्योर' घोषित करना पड़ा. इसी तरह बैपको रिफाइनरी को भी ऑपरेशन रोकने पड़े.

इन हालातों के बीच अमेरिकी और अरब अधिकारियों का कहना है कि फिलहाल अमेरिका ने किसी खास कंपनी के लिए लॉबिंग नहीं की है, लेकिन उसकी कोशिश है कि खाड़ी देशों के पुनर्निर्माण में अमेरिकी कंपनियों को सबसे आगे रखा जाए.

डॉलर सपोर्ट चाहिए तो देना पड़ेगा कॉन्ट्रेक्ट!

मसलन, अमेरिका की योजना सिर्फ सुझाव देने तक सीमित नहीं है. रिपोर्ट्स के मुताबिक, अगर खाड़ी देश अमेरिका से वित्तीय मदद या डॉलर सपोर्ट (स्वैप लाइन) चाहते हैं, तो बदले में उन्हें अमेरिकी कंपनियों को ठेके देने पड़ सकते हैं. यानी यह एक तरह का "ट्रेड-ऑफ" मॉडल हो सकता है, जहां आर्थिक मदद के बदले बिजनेस अवसर हासिल किए जाएंगे.

हालांकि, खाड़ी देशों के पास खुद भी भारी आर्थिक संसाधन हैं. कुवैत का सॉवरेन वेल्थ फंड ही करीब 1 ट्रिलियन डॉलर का बताया जाता है. इसके बावजूद, मौजूदा अनिश्चित माहौल और तेल निर्यात पर पड़ रहे असर के कारण ये देश लंबी अवधि की आर्थिक चुनौतियों को लेकर सतर्क हैं.

---- समाप्त ----
Live TV

Advertisement
Advertisement