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ईरान-अमेरिका में दोबारा जंग होना तय, सुप्रीम लीडर के इस बयान से भड़क उठेंगे ट्रंप

ईरान और अमेरिका के बीच परमाणु कार्यक्रम को लेकर तनाव फिर बढ़ गया है. सुप्रीम लीडर अली खामेनेई ने लगभग वेपन-ग्रेड यूरेनियम देश से बाहर भेजने से इनकार कर दिया है, जबकि डोनाल्ड ट्रंप और बेंजामिन नेतन्याहू लगातार ईरान पर दबाव बना रहे हैं.

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राष्ट्रपति ट्रंप, ईरानी सुप्रीम लीडर मोजतबा खामेनेई. (Photo- ITG)
राष्ट्रपति ट्रंप, ईरानी सुप्रीम लीडर मोजतबा खामेनेई. (Photo- ITG)

ईरान और अमेरिका के बीच तनाव एक बार फिर खतरनाक मोड़ पर पहुंचता दिख रहा है. युद्धविराम जैसे हालात बनने के बावजूद दोनों देशों के बीच अविश्वास इतना गहरा है कि किसी भी वक्त हालात फिर भड़क सकते हैं. अब ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला मोजतबा खामेनेई के एक बड़े फैसले ने डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन की चिंता बढ़ा दी है. रिपोर्ट्स के मुताबिक, खामेनेई ने साफ निर्देश दिया है कि ईरान अपने "लगभग वेपन-ग्रेड" यूरेनियम का भंडार देश से बाहर नहीं भेजेगा. यही मुद्दा अमेरिका और इजरायल की सबसे बड़ी मांगों में शामिल रहा है.

रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, ईरान के दो वरिष्ठ अधिकारियों ने बताया कि सुप्रीम लीडर का मानना है कि अगर यूरेनियम बाहर भेज दिया गया तो भविष्य में अमेरिका और इजरायल के किसी नए हमले की स्थिति में ईरान कमजोर पड़ जाएगा. इसी वजह से तेहरान अब अपने परमाणु भंडार को देश के भीतर ही सुरक्षित रखना चाहता है.

उधर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने गुरुवार को साफ कहा कि अमेरिका ईरान को उच्च संवर्धित यूरेनियम रखने नहीं देगा. ट्रंप ने व्हाइट हाउस में कहा, "हम उसे हासिल करेंगे. हमें उसकी जरूरत नहीं है, लेकिन हम ईरान को इसे रखने नहीं देंगे. संभव है कि हम उसे नष्ट कर दें." ट्रंप के बयान से साफ है कि वॉशिंगटन इस मुद्दे पर पीछे हटने को तैयार नहीं है.

इजरायल भी लगातार दबाव बना रहा है. प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू पहले ही कह चुके हैं कि जब तक ईरान अपना संवर्धित यूरेनियम बाहर नहीं भेजता, प्रॉक्सी मिलिशिया का समर्थन बंद नहीं करता और बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम खत्म नहीं करता, तब तक जंग को खत्म नहीं माना जाएगा.

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ईरान के पास 60% संवर्धित यूरेनियम

पश्चिमी देशों का आरोप है कि ईरान 60 प्रतिशत तक यूरेनियम संवर्धन कर चुका है, जो नागरिक उपयोग से कहीं ज्यादा है और परमाणु हथियार बनाने के स्तर के करीब माना जाता है. हालांकि ईरान लगातार इन आरोपों से इनकार करता रहा है और कहता है कि उसका परमाणु कार्यक्रम सिर्फ शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए है.

रिपोर्ट के मुताबिक, ईरान के भीतर यह डर गहरा है कि मौजूदा युद्धविराम सिर्फ अमेरिका की रणनीति हो सकती है ताकि तेहरान को सुरक्षित महसूस कराया जाए और फिर दोबारा हमला किया जा सके. इसी वजह से ईरान की सत्ता और सैन्य नेतृत्व अब ज्यादा सख्त रुख अपना रहा है. ईरान के शीर्ष वार्ताकार मोहम्मद बाघेर ग़ालिबाफ ने भी कहा कि अमेरिका खुले और छिपे तरीके से नए हमलों की तैयारी कर रहा है.

होर्मुज पर ईरान की पाबंदी, अमेरिका की नाकेबंदी

फरवरी 2026 में शुरू हुए संघर्ष के बाद से हालात लगातार तनावपूर्ण बने हुए हैं. अमेरिका और इजरायल ने 28 फरवरी को ईरान के सैन्य और परमाणु ठिकानों पर बड़े हमले किए थे, जिसके जवाब में ईरान ने खाड़ी देशों में अमेरिकी ठिकानों और इजरायल पर मिसाइल और ड्रोन हमले किए. इसके बाद होर्मुज स्ट्रेट पर ईरान की पाबंदी और अमेरिका की नाकेबंदी ने वैश्विक तेल सप्लाई को भी प्रभावित किया.

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इस बीच पाकिस्तान की मध्यस्थता में दोनों देशों के बीच बातचीत जारी है, लेकिन अब तक कोई बड़ी सफलता नहीं मिली है. सूत्रों का कहना है कि कुछ मुद्दों पर दूरी कम हुई है, लेकिन यूरेनियम भंडार और संवर्धन के अधिकार जैसे सवाल अब भी सबसे बड़ी बाधा बने हुए हैं.

ट्रंप की धमकियों के बाद बदला ईरान का रुख

रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि युद्ध से पहले ईरान 60 प्रतिशत संवर्धित यूरेनियम का आधा भंडार बाहर भेजने पर विचार कर रहा था, लेकिन ट्रंप की सैन्य धमकियों के बाद उसने अपना रुख बदल लिया. हालांकि ईरानी अधिकारियों का कहना है कि कुछ "व्यावहारिक समाधान" अब भी मौजूद हैं. इनमें अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी की निगरानी में यूरेनियम को कम संवर्धित स्तर पर लाने का विकल्प शामिल है.

IAEA के मुताबिक, हमलों से पहले ईरान के पास 60 प्रतिशत तक संवर्धित करीब 440 किलोग्राम यूरेनियम था. एजेंसी का अनुमान है कि इसका बड़ा हिस्सा इस्फहान और नतांज परमाणु केंद्रों में मौजूद है, हालांकि हमलों के बाद की स्थिति साफ नहीं है.

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