अमेरिका-ईरान के बीच समझौते को लेकर राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक ऐसा बयान दिया, जिसने कूटनीतिक गलियारों से लेकर मीडिया तक सबको उलझन में डाल दिया है. ट्रंप ने सोशल मीडिया पर ऐलान किया कि "ईरान के साथ डील पूरी हो चुकी है" और सभी को बधाई भी दे दी. लेकिन इसके बाद सबसे बड़ा सवाल यही बन गया कि आखिर यह "डील" है क्या?
क्या यह परमाणु समझौता (न्यूक्लियर डील) है? क्या यह शांति समझौता (पीस डील) है? या फिर सिर्फ बातचीत आगे बढ़ाने का एक खाका है? इस पर अमेरिका, ईरान और अन्य देशों की तरफ से अलग-अलग संकेत मिल रहे हैं.
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राष्ट्रपति ट्रंप के बयान के बाद अमेरिकी मीडिया ने इस समझौते को अलग-अलग नाम दिए. किसी ने इसे "एग्रीमेंट" कहा, किसी ने "टेंटेटिव डील", तो किसी ने "फ्रेमवर्क डील". वहीं पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने इसे "पीस डील" बताया. दूसरी तरफ कई विशेषज्ञों का कहना है कि यह न तो पूरी तरह शांति समझौता है और न ही पारंपरिक न्यूक्लियर डील.
अमेरिका-ईरान में डील हुई या समझौता?
असल में अमेरिका और ईरान के अधिकारी इसे "मेमोरेंडम ऑफ अंडरस्टैंडिंग" यानी MOU कह रहे हैं. कतर के प्रधानमंत्री ने भी इसे "मेमोरेंडम ऑफ अंडरस्टैंडिंग पर बनी सहमति" बताया. अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने भी अपने बयान में इसे "डील" नहीं कहा है, जबकि MoU ही कहा है. यही वजह है कि समझौते की असली प्रकृति को लेकर भ्रम बना हुआ है.
विशेषज्ञों के हवाले से सीएनएन ने अपनी एक रिपोर्ट में बताया, "डील" कोई औपचारिक कूटनीतिक शब्द नहीं है. अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में आमतौर पर "एग्रीमेंट", "फ्रेमवर्क", "ट्रीटी" या "मेमोरेंडम ऑफ अंडरस्टैंडिंग" जैसे शब्द इस्तेमाल किए जाते हैं. लेकिन ट्रंप लंबे समय से खुद को एक बड़े "डीलमेकर" के रूप में पेश करते रहे हैं. उनकी चर्चित किताब द आर्ट ऑफ द डील भी इसी छवि पर आधारित थी.
यही वजह है कि ट्रंप ने समझौते को सीधे "डील" कहकर पेश किया. इससे यह मैसेज गया कि उन्होंने एक बड़ी कूटनीतिक सफलता हासिल कर ली है. हालांकि बाद में उनके बयानों में भी बदलाव देखने को मिला.
ट्रंप ने ईरान पर हमले करने की चेतावनी भी दी
पहले ट्रंप ने कहा कि डील पूरी हो चुकी है. फिर उन्होंने कहा कि होर्मुज स्ट्रेट शुक्रवार को समझौते पर हस्ताक्षर होने के बाद पूरी तरह खोला जाएगा. इसके बाद G7 सम्मेलन में उन्होंने खुद इसे "मेमोरेंडम ऑफ अंडरस्टैंडिंग" बताया. इतना ही नहीं, उन्होंने यह भी कहा कि अगर ईरान इसका पालन नहीं करता है तो अमेरिका फिर से सैन्य कार्रवाई कर सकता है.
यहीं से सवाल और गहरे हो गए. अगर यह शांति समझौता है तो सैन्य कार्रवाई की बात क्यों हो रही है? और अगर यह न्यूक्लियर डील है तो यूरेनियम भंडार, परमाणु कार्यक्रम और निरीक्षण व्यवस्था जैसे मुद्दों पर अभी भी मतभेद क्यों बने हुए हैं? अमेरिका ईरान इन मुद्दों पर अगले 60 दिनों में आगे की चर्चा करेंगे और फाइनल करेंगे. इस बीच ईरान का एनरिच्ड यूरेनियम जमीन के भीतर ही दबा रहेगा.
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तो फिर इसे डील कहा जाए या MoU?
अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकारों का कहना है कि फिलहाल इसे "फ्रेमवर्क" या "MoU" कहना ज्यादा सही होगा. इसका मतलब है कि दोनों पक्ष कुछ मूल सिद्धांतों पर सहमत हुए हैं, लेकिन कई महत्वपूर्ण तकनीकी और राजनीतिक मुद्दों पर अभी बातचीत बाकी है.
कुछ विश्लेषकों का मानना है कि इस तरह की अस्पष्ट भाषा जानबूझकर इस्तेमाल की जाती है. इससे दोनों पक्षों को बातचीत जारी रखने और अपने-अपने देशों में राजनीतिक दबाव संभालने का मौका मिलता है. वहीं आलोचकों का आरोप है कि ट्रंप "डील" शब्द का इस्तेमाल करके यह दिखाना चाहते हैं कि उन्होंने संकट का समाधान निकाल लिया है, जबकि जमीन पर कई मुद्दे अब भी अनसुलझे हैं.
फिलहाल तस्वीर यही है कि अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत आगे बढ़ी है, तनाव कम करने की कोशिश हो रही है और होर्मुज स्ट्रेट को फिर से सामान्य बनाने पर सहमति बनती दिख रही है. लेकिन इसे अंतिम शांति समझौता या पूर्ण न्यूक्लियर डील कहना अभी जल्दबाजी होगी.
यानी ट्रंप ने भले ही इसे "डील" बता दिया हो, लेकिन दुनिया अभी भी यही समझने की कोशिश कर रही है कि आखिर यह डील है क्या. फिलहाल इतना तय है कि यह समझौता जितना अहम है, उससे कहीं ज्यादा चर्चा उसके नाम को लेकर हो रही है.