पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव और वोटों की गिनती के बाद जब नतीजे साफ हुए और बीजेपी 294 में से 207 सीटों के साथ बहुमत की सरकार बनाकर काबिज हुई, तो बहुतों को लगा कि यह अचानक आया सुनामी है. लेकिन इस बहुमत के पीछे करीब एक सदी लंबी कहानी छुपी है.
साल 1925 में नागपुर में बनी एक स्वयंसेवकों की टोली, 1930-40 के दशक का हिंदू महासभा, श्यामा प्रसाद मुखर्जी की जनसंघ, जनसंघ से बीजेपी और फिर पंचायतों से लेकर लोकसभा तक बढ़ता हुआ एक संगठनात्मक जाल.
यानी आज जो नतीजा दिख रहा है, वह महज एक चुनावी परिणाम नहीं, बल्कि बंगाल की राजनीति में धीरे–धीरे हुए वैचारिक, सामाजिक और संगठनात्मक बदलावों की परिणति है.
प्री–इंडिपेंडेंस दौर: संघ, महासभा और मुखर्जी की छाया
आरएसएस की औपचारिक एंट्री बंगाल में 1939 में होती है, लेकिन इसकी वैचारिक जमीन उससे भी पहले तैयार होने लगी थी. बंगाल उस वक्त एक साथ दो धाराओं का केंद्र था- एक तरफ राष्ट्रवादी कांग्रेस और समाजवादी-वामपंथी धारा, दूसरी तरफ हिंदू हितों की राजनीति करने वाली हिंदू महासभा.
इसी माहौल में के.बी. हेडगेवार और बाद में एम.एस. गोलवलकर जैसे नेता बंगाल आते-जाते रहे और यहां की युवा पीढ़ी में ‘सांस्कृतिक राष्ट्रवाद’ का बीज बोते रहे. हिंदू महासभा बंगाल में मुस्लिम लीग की राजनीति और सांप्रदायिक हिंसा के जवाब में हिंदू सुरक्षा की आवाज बनकर उभरी और 1947 के बंटवारे के वक्त यही धारा अलग ‘पश्चिम बंगाल’ प्रांत की मांग तक पहुंच जाती है.
इसी दौर में श्यामा प्रसाद मुखर्जी वो चेहरा बनते हैं, जो बंगाल की ज़मीन से उठकर अखिल भारतीय स्तर पर हिंदुत्व-समर्थ राष्ट्रवादी राजनीति की नींव रखते हैं. नेहरू से मतभेद, हिंदू महासभा से दूरी और फिर 1951 में जनसंघ की स्थापना. यह सब कुछ बंगाल के राजनीतिक मानस में दर्ज होता चला गया.
कांग्रेस राज: जनसंघ की पहली पैठ और आपातकाल की भट्टी
आज की बीजेपी की कथा दरअसल जनसंघ से शुरू होती है. 1952 के पहले लोकसभा चुनाव में जनसंघ सिर्फ 6 सीटों पर लड़ता है, लेकिन बंगाल में 5.5% वोट और दो सीटें जीतकर यह मैसेज दे देता है कि कांग्रेस-वाम के बीच एक तीसरी वैचारिक धारा भी मौजूद है.
कांग्रेस के लंबे शासनकाल में जनसंघ कभी मुख्य खिलाड़ी नहीं बन सका, लेकिन संघ की शाखाएं चुपचाप गांव-क़स्बों में जड़ें जमा रही थीं. रामलीला, दुर्गापूजा समितियां, सरस्वती पूजा, राष्ट्रीय पर्व इन सबके जरिए युवा स्वयंसेवकों की एक परत तैयार हुई जो सीधे राजनीति में नहीं, समाज में काम कर रही थी.
1975-77 का आपातकाल इस कहानी का टर्निंग प्वाइंट था. जनसंघ ने जेपी आंदोलन में कूदकर इंदिरा गांधी के ख़िलाफ संघर्ष किया और जनता पार्टी के रूप में 1977 के बंगाल विधानसभा चुनाव में 29 सीटें जीतने में कामयाब रहा. यही वह वक्त था, जब बंगाल के मतदाताओं ने पहली बार देखा कि कांग्रेस के बाहर भी कोई ताकत है, जो दिल्ली की सत्ता को चुनौती दे सकती है. लेकिन डबल-मेंबरशिप विवाद ने जनता पार्टी को तोड़ा, जनसंघ धारा अलग हुई और 1980 में बीजेपी बनी. बिखराव की इस प्रक्रिया ने संगठन को कमजोर जरूर किया, लेकिन संघ-भाजपा नेटवर्क वैचारिक रूप से ज्यादा साफ और केंद्रित होकर उभरा.
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CPM दौर: लाल किला, भगवा नींव
वाम मोर्चा की लंबी सरकार के दौर में बीजेपी शुरू-शुरू में ‘हाशिये की पार्टी’ लगती थी. 1982 और 1987 के विधानसभा चुनावों में उसका वोट शेयर 1% से भी कम रहा, कोई सीट नहीं मिली. लेकिन इसी वक्त भाजपा और संघ ने एक रणनीतिक फैसला लिया- पहले पंचायत और लोकल बॉडी की राजनीति में घुसो, फिर विधानसभा की ओर बढ़ो.
1980 के दशक में बीजेपी ने पश्चिम बंगाल के पंचायत चुनावों में धीरे–धीरे पांव पसारने शुरू किए. 1983 में पंचायत स्तर पर उसका वोट 0.08% था, जो 1993 में 3.89% और 1998 में 7.78% तक पहुंच गया. गांवों की यह ‘धीमी आग’ बाद के दशकों की बड़ी लपटों का आधार बनी. फिर आया 1990 का अयोध्या आंदोलन. भाजपा ने बंगाल में राम जन्मभूमि के सवाल को सिर्फ उत्तर भारत की धार्मिक भावनाओं तक सीमित नहीं रखा, बल्कि इसे बांग्लादेशी घुसपैठ, सीमा सुरक्षा और ‘बंगाल के हिंदू की असुरक्षा’ से जोड़ा.
साल 1991 के विधानसभा चुनाव में भाजपा अब भी शून्य सीट पर रही, लेकिन उसका वोट शेयर एक झटके में 11.34% तक जा पहुंचा. लोकसभा चुनाव में 11.6% वोट मिले यानी पार्टी अचानक ‘सिरियस प्लेयर’ के रूप में सामने आ गई. वाम मोर्चा ने इसे चेतावनी की तरह लिया, क्योंकि जिन ग्रामीण इलाकों में भूमि सुधार की रोशनी पूरी तरह नहीं पहुंची थी, वहां बीजेपी ने नाराज किसानों और पिछड़े वर्गों को साधना शुरू कर दिया.
TMC–BJP का उतार-चढ़ाव: दुश्मन का दुश्मन दोस्त
1990 के दशक के आख़िर में एक और बड़ा बदलाव हुआ. ममता बनर्जी ने कांग्रेस छोड़कर तृणमूल कांग्रेस (TMC) बनाई. कांग्रेस और CPM दोनों के खिलाफ माहौल था और बीजेपी ने इसे ‘नेचुरल एलायंस पार्टनर’ के रूप में देखा.
1998 के लोकसभा चुनाव में टीएमसी ने 29 और भाजपा ने 14 सीटों पर चुनाव लड़ा. भाजपा अपना पहला लोकसभा सीट (तपन सिकदर) जीतती है और उसका वोट शेयर 6.9% से बढ़कर 9.76% हो जाता है. 1999 में यह बढ़कर 11.4% तक पहुंचता है और दो सीटें (दुमदुम, कृष्णानगर) पार्टी के खाते में जाती हैं. यह गठबंधन भाजपा के लिए दो तरह से फायदेमंद था- संगठन को बूथ स्तर पर TMC के साथ-साथ चलने का मौका मिला और बंगाल के मतदाता ने पहली बार भाजपा को ‘घटक दल’ के रूप में सत्ता–समीकरणों के भीतर देखा.
लेकिन जैसे–जैसे ममता ने खुद को बंगाल की सबसे बड़ी एंटी-CPM ताकत के रूप में स्थापित किया, भाजपा का उपयोगिता फैक्टर घटता गया. पंचायत चुनावों में खराब प्रदर्शन को लेकर TMC ने भाजपा पर उंगली उठाई, रिश्ते बिगड़े और 2001 के विधानसभा चुनाव से ठीक पहले गठबंधन टूट गया.
इसके बाद जो हुआ, वह भाजपा के लिए ‘घोर वनवास’ जैसा था- 2001, 2004 और 2006-09 के बीच पार्टी लगातार सीटें हारती रही. 2006 में विधानसभा वोट शेयर गिरकर सिर्फ 1.93% रह गया.
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TMC राज: संघ की जड़ें, मोदी फैक्टर और 18 सीटों की छलांग
साल 2011 में जब ममता ने CPM को हटाकर सत्ता हासिल की, तो बहुत लोगों को लगा कि अब बंगाल की राजनीति स्थायी रूप से ‘हरी बनाम लाल’ हो गई है, लेकिन इसी वक्त ग्रामीण बेल्ट में संघ परिवार ने अपने काम को तेज कर दिया. 2014 तक राज्य में करीब 1,010 RSS शाखाओं के सक्रिय होने की रिपोर्टें आईं. SC, ST और OBC बहुल इलाकों में वीएचपी-बीजेपी के कार्यकर्ता पंचायत स्तर पर सक्रिय हुए.
TMC की ‘मुस्लिम तुष्टिकरण’ की छवि, विशेषकर इमाम भत्ता, मदरसों को बढ़ावा, और कुछ इलाकों में दुर्गापूजा-मुहर्रम टकराव को भाजपा ने लगातार अपने नैरेटिव में इस्तेमाल किया.
2014 लोकसभा में भाजपा के लिए पहला बड़ा ब्रेक आया. दार्जिलिंग और आसनसोल सीट जीतकर पार्टी 17.02% वोट शेयर तक पहुंच गई. एक ही झटके में वह लेफ्ट और कांग्रेस को पीछे छोड़कर ‘मुख्य विपक्ष’ के रूप में दिखने लगी.
2016 के विधानसभा चुनाव में अभी भी सिर्फ 3 सीटें मिल पाईं, मगर 10% वोट शेयर ने संकेत दे दिया कि ज़मीन पर कुछ बदल रहा है. फिर आया 2019 का मोदी वेव, NRC-CAA बहस, बांग्लादेशी हिंदू शरणार्थी और जंगलमहल-उत्तर बंगाल में भाजपा की जबरदस्त कैडर बिल्डिंग. 2019 लोकसभा में भाजपा 18 सीटें जीतकर 40.25% वोट तक पहुंच गई, जबकि TMC 43.3% पर सिमट गई. इस चुनाव ने दो बातें साफ कर दीं- वाम मोर्चा व्यावहारिक रूप से शून्य हो चुका है. और विरोधी वोट अब दो हिस्सों में बंटने के बजाय तेजी से भाजपा की ओर शिफ्ट हो रहे हैं.
2021 के विधानसभा चुनाव में TMC ने जरूर 213 सीटों के साथ शानदार वापसी की, लेकिन भाजपा भी 77 सीटों और 38.1% वोट शेयर के साथ पहली बार बड़े विपक्ष के रूप में विधानसभा में बैठी. कई पारंपरिक वाम-कांग्रेस वोटर बीजेपी-TMC के बीच ध्रुवीकृत हो चुके थे.
2026 की बहुमत सरकार: ‘शाखा से सत्ता’ तक की यात्रा
2026 के जिस सिनेरियो की आप कल्पना कर रहे हैं, जिसमें भाजपा 207 सीटों के साथ पूर्ण बहुमत हासिल करती है, वह ऊपर की सारी परतों का लॉजिकल एक्सटेंशन है. प्री–इंडिपेंडेंस में हिंदू महासभा और मुखर्जी की वैचारिक जमीन, कांग्रेस युग में जनसंघ–संघ की कैडर–निर्माण राजनीति, CPM राज में पंचायतों से शुरू हुआ ‘धीमा भगवा उभार’, TMC काल में RSS की जमीनी पैठ, CAA–NRC बहस और ‘मुस्लिम तुष्टिकरण बनाम हिंदू समेकन’ की राजनीति.
बीते दशक में भाजपा ने बंगाल में तीन स्तरों पर काम किया- वैचारिक स्तर: बंगाली हिंदुत्व की ऐसी भाषा गढ़ी जो बैंकिम, विवेकानंद, सुभाष और श्यामा प्रसाद को एक ही नैरेटिव में जोड़ती है. संगठनात्मक स्तर पर शाखाओं, बूथ समितियों, IT–सेल और माइक्रो–मैनेज्ड चुनावी मैनेजमेंट के जरिए गांव–गांव तक नेटवर्क फैला.
राजनीतिक स्तर पर TMC के खिलाफ एंटी–इंकम्बेंसी, भ्रष्टाचार, सिंडिकेट–राज, और हिंसा के मुद्दों पर आक्रामक अभियान. इसके साथ ही दुर्गापूजा, रामनवमी, सरस्वती पूजा जैसे आयोजनों को ‘अस्मिता’ की लड़ाई से जोड़ना. जब यह सब मिलकर 2019-2021 के बीच एक मजबूत आधार में बदल गया, तो 2026 में बहुमत की सरकार का रास्ता खुल गया. खासकर तब, जब TMC के अंदर गुटबाजी, भ्रष्टाचार-कांड और ‘कट मनी’ जैसे मुद्दों ने उसकी साख को लगातार चोट पहुंचाई हो.
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बंगाल की राजनीति का नया अध्याय
साल 1925 में नागपुर में शुरू हुई एक शाखा आधारित संगठन की सीमित कहानी अब 2026 के बंगाल में बहुमत की सरकार के रूप में खड़ी दिखाई देती है. यह सिर्फ किसी एक चुनाव या एक नेता की लहर नहीं, बल्कि करीब सौ साल की वैचारिक निरंतरता, संगठनात्मक धैर्य और सामाजिक-राजनीतिक अवसरों को पहचानकर उनका उपयोग करने की रणनीति का नतीजा है.
अब असली सवाल यह नहीं होगा कि बीजेपी बंगाल में सत्ता में कैसे आई, बल्कि यह होगा कि क्या वह भगवा उभार को सुशासन, विकास और प्रशासनिक स्थिरता में बदल पाती है या नहीं. क्योंकि बंगाल की जनता ने इतिहास में बार-बार ये साबित किया है कि जो उम्मीदों पर खरा न उतरे, उसे बदलने में वह देर नहीं लगाती.