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ढलती शाम, गहरा होता दर्द... हकीमपुर बॉर्डर पर जमा हुए अवैध बांग्लादेशियों की कहानी

बांग्लादेश बॉर्डर पर मौजूद हकीमपुर चेकपोस्ट पर शाम ढलते ही वहां का माहौल राहत और गहरे दुख के मिले-जुले भावों से भर जाता है. भारत से बांग्लादेश में घुसते ही जिंदगी के सारे सपने दम तोड़ देंगे. लेकिन भारत में 'अवैध' होने का तमगा लेकर कब चला जा सकता है. ये प्रश्न बड़ा है.

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हकीमपुर बॉर्डर चेकपोस्ट पर बांग्लादेश जाने के लिए पहुंचे अवैध अप्रवासी. (Photo: ITG)
हकीमपुर बॉर्डर चेकपोस्ट पर बांग्लादेश जाने के लिए पहुंचे अवैध अप्रवासी. (Photo: ITG)

एक साल से भी कम समय में उत्तर 24 परगना में स्थित हाकिमपुर बॉर्डर एक बार फिर फोकस में है. अभी पिछले अगस्त में ही 'विशेष गहन संशोधन' (SIR) के शुरू होने से ठीक पहले हजारों बिना दस्तावेज वाले अप्रवासी इसी चेकपोस्ट पर जमा हुए थे. आज सैकड़ों लोग एक बार फिर कतार में खड़े हैं. उनका अंतिम लक्ष्य वही है. बांग्लादेश लौटना. लेकिन इस बार उन्हें एक निर्णायक नई राजनीतिक वास्तविकता ने अपने घर लौटने पर मजबूर किया है. 

पश्चिम बंगाल की नई बनी सरकार ने सीमा सुरक्षा से जुड़ी पुरानी चिंताओं को दूर करने के लिए तेजी से कदम उठाए हैं और अपनी सख़्त "3D नीति" लागू की है. ये 3 D नीति है- पता लगाना (Detect), हिरासत में लेना (Detain), और देश से निकालना (Deport). 

घुसपैठियों की पहचान करने और उसे खत्म करने के लिए बनाई गई यह नीति हर ज़िले के लिए विशेष "होल्डिंग सेंटर" स्थापित करना अनिवार्य बनाती है.

राज्य के भीतर बिना वैध दस्तावेजों के पाए जाने वाले लोगों को पकड़कर उन्हें उनके मूल देश वापस भेजे जाने तक इन सेंटरों में रखा जाएगा. 

इस मजबूत नीति का असर तुरंत दिखाई दिया. नए सख्त उपायों से जुड़े कानूनी नतीजों और जेल जाने के डर से ग्रेटर कोलकाता इलाके में बसे हजारों अवैध अप्रवासी खुद ही हरकत में आ गए हैं; वे कानूनी पचड़ों से बचना चाहते हैं और जैसे भी बांग्लादेश वापस लौटना चाहते हैं. इसी उम्मीद में ये लोग हकीमपुर सीमा की ओर तेज़ी से बढ़ रहे हैं. 

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अवैध अप्रवासियों संख्या में अचानक हुई भारी बढ़ोतरी के बावजूद भारतीय सुरक्षा बलों ने पूरी तरह से व्यवस्था बनाए रखी है और सीमा पर मची अफरा-तफरी को एक अनुशासित और बेहद सुरक्षित जांच-पड़ताल वाली प्रक्रिया में बदल दिया है. 

हकीमपुर बॉर्डर पर इंतजार करते अवैध अप्रवासी (Photo: ITG)

वापसी की यह प्रक्रिया एक सख़्त और कई चरणों वाली जांच-पड़ताल के बाद पूरी की जाती है.

शुरुआती जांच

भीड़ को व्यवस्थित तरीके से अलग-अलग समूहों में बांटा जाता है और सीमा सुरक्षा बल (BSF) द्वारा उनके पहचान-पत्रों की पूरी तरह से जांच की जाती है. 

बायोमेट्रिक पंजीकरण

शुरुआती मंजूरी मिलने के बाद हर व्यक्ति को उंगलियों के निशान और बायोमेट्रिक जानकारी दर्ज कराने की एक सख़्त प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है; इससे यह सुनिश्चित होता है कि भारत सरकार के पास देश छोड़कर जाने वाले सभी व्यक्तियों का एक स्थायी डिजिटल रिकॉर्ड मौजूद रहे ताकि भविष्य में वे बिना अनुमति के दोबारा देश में प्रवेश न कर सकें. 

दोबारा जांच

एक बार जब भारतीय अधिकारी उन्हें मंजूरी दे देते हैं तो बॉर्डर गार्ड बांग्लादेश (BGB) अपने सर्वर रिकॉर्ड से उनके दस्तावेजों की बारीकी से जांच करता है. व्यक्ति को बांग्लादेश की धरती पर कदम रखने की अनुमति तभी दी जाती है जब डिजिटल मिलान हो जाता है. आधिकारिक सूत्रों के अनुसार यह प्रणाली बहुत ही कुशल साबित हो रही है. लगभग 50 व्यक्तियों का पहला जत्था सोमवार को बांग्लादेश में सफलतापूर्वक स्वीकार कर लिया गया, जबकि दूसरा, इससे बड़ा जत्था, इस समय चेकपॉइंट पर अंतिम रवानगी का इंतज़ार कर रहा है.

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सीमा संकट के मानवीय पहलू

हकीमपुर का मौजूदा दृश्य उन जटिल मानवीय कहानियों की एक कड़वी और मार्मिक याद दिलाता है, जो अवैध रूप से देश क्रॉस करने की वजह से पैदा होता है. 

केस स्टडी 1: कैंसर इलाज के लिए भारत आए

रोजीना बीबी के लिए बॉर्डर एक अस्थायी जिंदगी के अंत को दिखाती है. वो डरी हुई हैं और धीरे से बोलती हैं, "हम सात साल पहले अपने पति सैदुल के कैंसर के इलाज के लिए भारत आए थे. क्योंकि इलाज की प्रक्रिया लंबी चली इसलिए परिवार गैर-कानूनी तौर पर यहीं रह गया. लेकिन नए कानूनी आदेश ने पूरी स्थिति ही बदल दी है. नए निर्देशों के तहत सरकारी कार्रवाई के डर से उनके मकान मालिक ने हाल ही में उनसे घर खाली करने को कहा जिससे उनके पास वापस जाने के अलावा कोई चारा नहीं बचा. 

हकीमपुर की तस्वीर (Photo: ITG)

केस स्टडी 2: बंटे हुए परिवार

सबीना खातून (36 वर्ष ) चेकपॉइंट के पास बैठी है, अपने दो छोटे बच्चों को कसकर पकड़े हुए. सालों पहले वह दलालों के जरिए गैर-कानूनी तौर पर भारत में दाखिल हुई थी और बाद में एक भारतीय नागरिक से शादी कर ली. उसे याद है कि उसने अपने पति के पहचान पत्रों का इस्तेमाल करके RG कर अस्पताल में अपने बच्चों को जन्म दिया था. अब नए कानून ने उन्हें एक दिल तोड़ने वाले मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया है. क्योंकि उसका पति एक भारतीय नागरिक है इसलिए वह उनके साथ नहीं जा सकता. सबीना और उसके बेबस बच्चे सीमा पर अकेले इंतजार कर रहे हैं. "सतखिरा में मेरा परिवार तो है, लेकिन मुझे नहीं पता कि हम दोबारा कैसे मिल पाएंगे," सबीना अपने बच्चों की ओर देखते हुए आंखों में आंसू भरकर कहती है. उसका सवाल है, "क्या मेरे बच्चे कभी अपने पिता को दोबारा देख पाएंगे?"

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केस स्टडी 3: टूटे हुए सपने

25 साल के अखरुजमान के लिए भारत का सपना मुश्किल से दो महीने ही चला. उसने इसी मार्च में ही सीमा पार की थी. उसने बताया, "भारत पहुंचने के लिए मैंने रात में सोनई नदी तैरकर पार की. खुलना के एक आर्थिक रूप से कमजोर परिवार से आने वाले अखरुज़मान ने बेहतर जिंदगी की उम्मीद में सब कुछ दांव पर लगा दिया था. आज वे सारे सपने हकीकत के बोझ तले टूटकर बिखर गए हैं. वो कहता है, "अब मेरे पास कोई और रास्ता नहीं बचा है. मैं बस BSF और BGB से मंज़ूरी मिलने का इंतजार कर रहा हूं."

जैसे ही हकीमपुर चेकपोस्ट पर शाम ढलती है, वहां का माहौल राहत और गहरे दुख के मिले-जुले भावों से भर जाता है. जहां एक ओर सरकार का प्रशासनिक तंत्र देश की सीमाओं को सुरक्षित रखने के लिए पूरी सटीकता से काम करता है, वहीं दूसरी ओर हवा में छोटे बच्चों की चीखें और टूटे हुए परिवारों का खामोश रुदन गूंजता रहता है.

इन लंबी और घुमावदार कतारों में खड़े कई लोगों के लिए बांग्लादेश लौटना एक कानूनी जरूरत होने के साथ-साथ अपनी जड़ों की ओर वापसी भी है. लेकिन इसकी कीमत उन्हें अपने अधूरे सपनों के रूप में चुकानी पड़ती है.
 

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