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28 की उम्र में पॉलिटिक्स में एंट्री, शिवलिंग विवाद और अब पालाबदल... सयानी की कहानी!

ममता बनर्जी को अपना सियासी आदर्श बताने वाली सयानी घोष भी बगावत की राह पर चल पड़ी हैं. टीएमसी के उन 20 बागी सांसदों के साथ है, जिन्होंने संसद में अलग बैठने का फैसला किया है. 28 साल की उम्र में सियासत में कदम रखने वाली सयानी घोष की कहानी क्या है?

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ममता बनर्जी का सयानी घोष क्या छोड़ रही साथ (Photo-PTI)
ममता बनर्जी का सयानी घोष क्या छोड़ रही साथ (Photo-PTI)

पश्चिम बंगाल की सियासत की सबसे चर्चित चेहरों में एक सयानी घोष को ममता बनर्जी और अभिषेक बनर्जी की करीबी माना जाता रहा, लेकिन सत्ता बदलते ही पाला बदल लिया है. सयानी भी टीएमसी के उन बागी सांसदों की फेहरिश्त में शामिल हो गई हैं, जिन्होंने लोकसभा के स्पीकर ओम बिरला को पत्र लिखकर सदन में अलग बैठने और एनडीए को समर्थन करने का फैसला किया है. 

अभिनेत्री से राजनेता बनीं सयानी घोष ने अपने करियर की शुरुआत बहुत कम उम्र में थी. 2010 में उन्होंने महज 17 साल की उम्र में बांग्ली फिल्म से कदम रखा और समूचे बंगाल में उन्हें पहचान मिली. 

राजनीति में आने से पहले ही सयानी घोष सांस्कृतिक जगत का एक चर्चित चेहरा बन चुकी थीं, जिसके बाद 28 साल की उम्र में सियसत में कदम रखा और बहुत ही तेजी से ममता बनर्जी के भरोसेमंद बन गई. सयानी घोष बंगाल की राजनीति में एक प्रमुख युवा चेहरा हैं. ममता बनर्जी के करीबी नेता बनने से लेकर सयानी घोष के सियासी पाला बदलने की कहानी काफी रोचक है. 

अभिनेत्री से कैसी सयानी बनी नेता
सयानी घोष बंगाली सीरियल से अपनी अभिनय क्षमता साबित करने के बाद बांग्ला सिनेमा (टॉलीवुड) का रुख किया. 2011 में उन्होंने फिल्म 'शत्रु' में एक छोटी भूमिका निभाई, जिसने उन्हें काफी बड़ा बना दिया. ये उनके करियर के लिए एक बड़ा टर्निंग पॉइंट साबित हुई और उन्हें बंगाली सिनेमा में एक पहचान मिली. यही नहीं सयानी केवल स्क्रीन तक सीमित नहीं रहीं, बल्कि उन्होंने थियेटर (रंगमंच) में भी काम किया, जिसके चलते बंगाल के सामाजिक आंदोलन के जुड़े हुए लोगों की बीच अपनी जगह बनाई. 

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सयानी ने अपने अभिनय करियर में एक दशक से ज्यादा का समय बिताने के बाद राजनीति में कदम रखा. 2021 के चुनाव से ठीक पहले ममता बनर्जी को बंगाल में एक युवा महिला नेता की जरूरत थी, जिसके लिए सयानी घोष पूरी तरह फिट बैठ रही थी. सयानी एक महिला और युवा होने के साथ-साथ चर्चित थीं. इस तरह से उनकी पहचान पूरे बंगाल में थी, जिसे देखते हुए ममता बनर्जी ने उन्हें फरवरी 2021 में टीएमसी में एंट्री कराई. 

2021 में हार और 2024 में बनी सांसद
टीएमसी में शामिल होने के बाद सयानी को पार्टी ने आसनसोल सीट से विधानसभा चुनाव लड़ा, लेकिन बीजेपी की उम्मीदवार अग्निमित्रा पॉल से हार गईं. इसके बाद भी सयानी सियासी पिच पर खड़ी रही. 2021 में ही सयानी घोष को त्रिपुरा में गिरफ़्तार भी किया गया था.त्रिपुरा में स्थानीय चुनावों के समय सयानी ने बीजेपी की एक नुक्कड़ सभा के पास से गुज़रते हुए नारा लगाया था 'खेला होबे'. इस नारेबाज़ी के बाद अगरतला के एक पुलिस थाने में सयानी घोष पर मुक़दमा दर्ज कर लिया गया था और उन्हें गिरफ़्तार कर लिया गया था.

सयानी घोष जरूर गिरफ्तार हुई, लेकिन ममता बनर्जी का विश्वास जीतने में कामयाब रही. इसी का नतीजा है कि 2023 में ममता बनर्जी ने उनको टीएमसी की यूथ विंग का अध्यक्ष बना गिया. पश्चिम बंगाल के कथित भर्ती घोटाले की जांच कर रही ईडी ने उनसे दस घंटों तक पूछताछ की तो चर्चा के केंद्र में आ गईं. सयानी घोष के आक्रामक तेवर को देखते हुए ममता बनर्जी ने 2024 के लोकसभा चुनाव में जादवपुर संसदीय सीट से प्रत्याशी बनाया, जहां से सयानी घोष जीतकर सांसद बनी. 

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सड़क से संसद तक टीएमसी की आवाज
लोकसभा सांसद बनते ही सयानी घोष टीएमसी की सड़क से संसद तक एक सशक्त आवाज़ बनकर उभरी हैं. संसद के बाहर और अंदर दोनों फ्रंट पर मोदी सरकार को घेरती नजर आने लगी. इस तरह पार्टी के लिए सयानी एक क्राउड पुलर बनकर उभरीं. इसके साथ ममता बनर्जी और अभिषेक बनर्जी के करीबी और वफादार के रूप में पहचानी जाने लगी. 

सयानी घोष की लोकप्रियता को देखते हुए ममता बनर्जी ने उन्हें पश्चिम बंगाल के बाहर त्रिपुरा और असम में भी चुनाव प्रचार की ज़िम्मेदारी दी, जिससे उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर छवि बनाने में मदद मिली. पश्चिम बंगाल की राजनीति में उनका उभार नेता के तौर पर हुआ है और एक कार्यकर्ता के रूप में उन्होंने काम नहीं किया है. बंगाल चुनाव के दौरान  उनकी रैलियों और जनसभाओं में जमकर भीड़ जुट रही थी. ममता बनर्जी और अभिषेक बनर्जी के बाद सबसे ज्यादा रैलियां 2026 में सयानी घोष ने किया था. 

सयानी घोष का विवादों से नाता
सयानी घोष अपने भाषणों और अपनी गायकी से भी लोगों का ध्यान खींच रही थी, जिसके चलते विवादों में घिरीं. चुनाव प्रचार के दौरान धार्मिक गीत गाकर लोगों का विश्वास जीतने की कवायद कर रही थी.इस मद्देनजर एक चुनावी मंच से उन्होंने बंगाली में नज़्म गई, जिसका हिंदी अनुवाद 'मेरे दिल में काबा है और आंखों में मदीना है.

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सयानी के इस गीत को एक तरफ़ सराहा गया तो कुछ लोगों ने इसे मुसलमानों के वोट खींचने की कोशिश बताते हुए उन्हें ट्रोल भी किया. बीजेपी नेताओं ने इस गीत के लिए सयानी घोष पर सवाल खड़े करने से लेकर ममता बनर्जी तक पर निशाना साधा और इसे टीएमसी का तुष्टीकरण करार दिया था. इसके चलते बाद के चुनावी सभाओं में सयानी हनुमान चालीसा का भी पाठ किया और अन्य धर्म ग्रंथों से भी पाठ किए.

राजनीति में आने से पहले सयानी घोष का नाम विवादों में आया था. साल 2015 में सयानी घोष ने अपने सोशल मीडिया हैंडल से शिवलिंग पर कंडोम से जुड़ा एक आपत्तिजनक कार्टून साझा किया था, इस पोस्ट के बाद देश भर में हिंदू धर्म की भावनाओं को ठेस पहुंचाने को लेकर भारी विवाद हुआ था. ऐसे में सयानी घोष 2021 में राजनीति में आईं थी तो उन्होंने सार्वजानिक रूप से माफी मांगी थी. 

बंगाल में सत्ता बदलते ही यह मामला उठा था. इसके बाद उन्होंने कहा था कि किसी को भी किसी की धार्मिक भावनाओं को ठेस नहीं पहुंचानी चाहिए. मैं खुद एक हिंदू हूं. उन्होंने कहा कि यह 2015 की पोस्ट है और तब मैं 22 साल की थी. टि्वटर मेरे लिए नया था, मैंने यह पोस्ट नहीं की थी,और मैंने यह कार्टून भी नहीं बनाया था. अगर किसी की जांच होनी चाहिए,तो उस व्यक्ति की होनी चाहिए जिसने यह कार्टून बनाया था. 

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अब बदल रही सियासी पाला
सयानी घोष अपने पांच साल के सियासी सफर में ख़ुद को ममता बनर्जी और अभिषेक बनर्जी की करीबी की तरह पेश करती हैं और अपने भाषणों में बार-बार ममता बनर्जी का ज़िक्र करती हैं.सयानी ममता बनर्जी की तरह ही साड़ी पहनती हैं और कई बार उन्हीं की तरह चप्पल पहनकर सभाएं करती हैं. इतना ही नहीं ममता कई बार कह चुकी हैं कि वो ममता बनर्जी को फ़ॉलो करती हूं. 

ममता बनर्जी को अपना राजनीतिक आदर्श और अभिषेक बनर्जी को नेता बताने वाली सयानी घोष बंगाल की सत्ता बदलते ही सियासी मिजाज भी बदल रहा. सयानी भी टीएमसी की उन बागी नेताओं की फेहरिश्त में शामिल हो गई हैं, जो अभिषेक बनर्जी को लोकसभा संसदीय दल के टीएमसी के नेता पद से हटाना चाहती हैं और काकोली घोष को बनाना चाहते हैं. इतना ही नहीं संसद में अलग बैठने और एनडीए को समर्थन करना चाहता है. 

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