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'हम हैं असली पार्टी', बागी सांसदों ने TMC के सिंबल पर ठोका दावा, कोर्ट जाने की तैयारी

तृणमूल कांग्रेस के 20 बागी सांसदों द्वारा अलग गुट बनाने और पार्टी के चुनाव चिन्ह पर दावा ठोकने से पश्चिम बंगाल की राजनीति में नया संकट खड़ा हो गया है. बागी नेताओं का कहना है कि वे पार्टी छोड़कर नहीं गए हैं, बल्कि उसे सुधारने की कोशिश कर रहे हैं. वहीं ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली टीएमसी ने इस कदम को दल-बदल विरोधी कानून के खिलाफ बताते हुए कानूनी लड़ाई का ऐलान किया है.

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टीएमसी के बागी सांसदों ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को पत्र सौंपकर सदन में अलग बैठने की व्यवस्था की मांग की. (Photo: PTI)
टीएमसी के बागी सांसदों ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को पत्र सौंपकर सदन में अलग बैठने की व्यवस्था की मांग की. (Photo: PTI)

तृणमूल कांग्रेस (TMC) के बागी सांसद अरूप चक्रवर्ती ने सोमवार को कहा कि अलग हुआ गुट पार्टी छोड़कर नहीं गया है, बल्कि वह पार्टी को सुधारने की कोशिश कर रहा है. उन्होंने दावा किया कि उनका गुट टीएमसी के चुनाव चिन्ह पर भी दावा करेगा. वहीं, ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली पार्टी ने इस कदम को संविधान की 10वीं अनुसूची (दल-बदल विरोधी कानून) के तहत अवैध बताया है.

टीएमसी के 20 बागी सांसदों ने 14 जून को लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला से मुलाकात की थी और घोषणा की थी कि वे त्रिपुरा स्थित पंजीकृत लेकिन गैर-मान्यता प्राप्त राजनीतिक दल 'नेशनलिस्ट सिटिजंस पार्टी ऑफ इंडिया' (NCPI) में विलय कर रहे हैं. अरूप चक्रवर्ती ने न्यूज एजेंसी पीटीआई से बातचीत में कहा, 'हमने टीएमसी नहीं छोड़ी है. हम टीएमसी में ही हैं और पार्टी को सुधारने की कोशिश कर रहे हैं. पार्टी को नुकसान क्यों हुआ, इस पर कोई चर्चा नहीं हो रही है. हमारे पास 20 सांसद हैं, तो हम चुनाव चिन्ह के लिए लड़ाई क्यों नहीं लड़ सकते?'

ममता डरी हुई हैं: अरूप चक्रवर्ती

उन्होंने कहा, 'एक नया खेल शुरू हो गया है... खेला होबे.' चक्रवर्ती ने दावा किया कि उनके कदम से पश्चिम बंगाल में विकास और रोजगार को बढ़ावा मिलेगा. ममता बनर्जी पर निशाना साधते हुए उन्होंने कहा, 'वह डरी हुई हैं. पार्टी की बैठक तक नहीं बुला पा रही हैं. चुनाव से पहले वह अपने निर्वाचन क्षेत्र में भी बैठक नहीं कर सकीं.' अरूप चक्रवर्ती ने यह भी कहा कि काकोली घोष दस्तिदार और सुदीप बंद्योपाध्याय टीएमसी के बागी गुट के प्रमुख नेता हैं. वहीं, टीएमसी की राज्यसभा सांसद सागरिका घोष ने कहा कि संविधान की 10वीं अनुसूची स्पष्ट रूप से कहती है कि केवल सांसदों का नहीं, बल्कि पूरे राजनीतिक दल का विलय होना चाहिए.

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उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर लिखा, 'दो-तिहाई बहुमत और दल-बदल विरोधी कानून को लेकर गलत जानकारी फैलाई जा रही है. 10वीं अनुसूची और सुप्रीम कोर्ट के फैसले पूरी तरह स्पष्ट हैं.' सागरिका घोष ने कहा कि संसद के बाहर राजनीतिक दल का पहले विभाजन या विलय होना चाहिए. इसके बाद ही यदि दो-तिहाई सदस्य अलग होते हैं तो उन पर दल-बदल कानून लागू नहीं होगा. टीएमसी के वरिष्ठ सांसद सौगत रॉय ने कहा कि ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस एकमात्र वैध पार्टी है, जिसकी अध्यक्ष ममता बनर्जी हैं और जिसका चुनाव चिन्ह 'जुड़वा फूल' है.

बागियों ने किया विश्वासघात: सौगत रॉय

उन्होंने कहा, 'टीएमसी के टिकट पर चुने गए 20 सांसदों ने मतदाताओं के साथ विश्वासघात किया है. उन्होंने एक गैर-प्रभावशाली पार्टी एनसीपीआई में शामिल होकर अवैध तरीके से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाले एनडीए को समर्थन देने की घोषणा की है.' सौगत रॉय ने आरोप लगाया कि इन सांसदों ने संविधान की 10वीं अनुसूची की धारा 10(4) के प्रावधानों से बचने के लिए यह कदम उठाया है. लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला से 14 जून को मुलाकात के दौरान बागी सांसदों ने संसद में अलग बैठने की व्यवस्था की भी मांग की थी.

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दूसरी ओर, टीएमसी संसदीय दल के नेता अभिषेक बनर्जी ने लोकसभा अध्यक्ष से अनुरोध किया कि बागी गुट को किसी भी प्रकार की मान्यता न दी जाए. छह बार सांसद रह चुके सुदीप बंद्योपाध्याय ने कहा कि उनका गुट अदालत में जाकर खुद को असली टीएमसी साबित करने की लड़ाई लड़ेगा और पार्टी के चुनाव चिन्ह पर दावा पेश करेगा. एनसीपीआई त्रिपुरा की एक पंजीकृत लेकिन गैर-मान्यता प्राप्त पार्टी है, जिसकी राजनीतिक उपस्थिति बेहद सीमित है. 2023 के त्रिपुरा विधानसभा चुनाव में पार्टी ने तीन सीटों पर उम्मीदवार उतारे थे, लेकिन उसके उम्मीदवार या तो नोटा से पीछे रहे या बहुत कम वोट हासिल कर सके.

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टीएमसी के 64 विधायकों का भी अलग गुट

टीएमसी पर नियंत्रण की लड़ाई फिलहाल संसद और पश्चिम बंगाल विधानसभा दोनों जगह जारी है. हाल ही में ऋतब्रत बनर्जी  के नेतृत्व में पार्टी के 80 में से 64 विधायकों ने बगावत कर दिया था. इन विधायकों ने ममता और अभिषेक बनर्जी के नेतृत्व वाली टीएमसी से अलग होकर खुद को एक अलग विधायी समूह के रूप में मान्यता दिलाई थी और ऋतब्रत बनर्जी को विपक्ष का नेता चुना था. ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली टीएमसी ने इस फैसले को कलकत्ता हाई कोर्ट में चुनौती दी है.

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