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पहले चोटी, फिर घूसखोर पंडत, अब अवसरवादी... ब्राह्मणों पर यूपी में बार-बार विवाद!

उत्तर प्रदेश में एक के बाद एक विवाद ब्राह्मण समुदाय से जुड़े हो रहे हैं. यूपी में बटुक ब्राह्मणों के चोटी खींचने का मामला अभी शांत भी नहीं हुआ था कि यूपी दरोगा भर्ती की परीक्षा में अवसरवादी का विकल्प के रूप में पंडित को रखे जाने का मामला गर्मा गया है. इतना ही नहीं पहले घूसखोर पंडत फिल्म को लेकर ब्राह्मण नाराज हैं.

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यूपी में ब्राह्मण समुदाय पर बार बार विवाद क्यों (Photo-PTI)
यूपी में ब्राह्मण समुदाय पर बार बार विवाद क्यों (Photo-PTI)

उत्तर प्रदेश की सियासत पूरी तरह से 2027 के चुनावी मोड में नजर आ रही है. यूपी में दरोगा भर्ती की परीक्षा में पूछे गए एक सवाल ने ब्राह्मण समुदाय की नाराजगी को बढ़ा दिया है. परीक्षा में 'अवसर के अनुसार बदल जाने' वाले सवाल के विकल्प 'पंडित' ऑप्शन दिया गया था,  जिसे लेकर सियासी बवाल मच गया है. 

योगी सरकार के डिप्टी सीएम ब्रजेश पाठक ने भी इसे गलत ठहराते हुए इसकी निंदा की है. बढ़ते विवाद के बीच सूबे के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भी सख्त हिदायत दी है कि भविष्य में होने वाली परिक्षा में ख्याल रखा जाए. उन्होंने कहा कि किसी जाति, पंथ और संप्रदाय की मर्यादा का ख्याल रखते हुए अमर्यादित टिप्पणी ना करने को कहा है. 

यूपी में ब्राह्मण को अवसरवादी बताया जाना पहली घटना नहीं है बल्कि पिछले कुछ दिनों में कई मामले हुए हैं. ब्राह्मण विधायकों की बैठक पर नोटिस दी जाती है तो माघ मेले में बटुक ब्राह्मणों की पिटाई का मामला सामने आता है. ऐसी कई घटनाएं हुई है, जिससे ब्राह्मण समाज की भावनाओं की ठेस पहुंची है. हालांकि, इन मामलों में प्रत्यक्षरूप से शामिल न होने के बाद भी सरकार को जवाब देना पड़ रहा है और पार्टी की छवि को झटका लग रहा है. 

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अवसरवादी सवाल में 'पंडित' का ऑप्शन
उत्तर प्रदेश में 14 और 15 मार्च को दरोगा यानी यूपी सब इंस्पेक्टर की परीक्षा आयोजित की गई थी. भर्ती परीक्षा में सामान्य हिंदी के प्रश्नपत्र में सवाल पूछा गया था, 'अवसर के हिसाब से बदल जाने वाले को क्या कहेंगे? इस सवाल के जवाब के लिए 4 विकल्प दिए गए थे, जिसमें पहला पंडित, दूसरा अवसरवादी, तीसरा निष्कपट और चौथा विकल्प के रूप में सदाचारी. यह सवाल सामने आते ही विरोध शुरू हो गया, पंडित को गलत अर्थों में दिखाए जाने को लेकर ब्राह्मण समुदाय नाराज है. 

डिप्टीसीएम बृजेश पाठक ने पूरे  कहा कि है कि पुलिस भर्ती परीक्षा के प्रश्न को लेकर जो विवादित विकल्प दिए गए उन पर हमे कड़ी आपत्ति है. उन्होंने कहा कि सरकार ने इस मामले को गंभीरता से संज्ञान में लिया है. किसी भी प्रश्न से किसी समाज या वर्ग की गरिमा को ठेस पहुंचती है तो यह बिल्कुल स्वीकार्य नहीं है.  इतना ही नहीं सीएम योगी ने भी  सभी भर्ती बोर्ड को निर्देश दिए कि किसी जाति, धर्म को लेकर अमर्यादित टिप्पणी न की जाए. यह कतई बर्दाश्त नहीं है. बार-बार ऐसी गलती करने वालों को प्रतिबंधित किया जाए.  

पुलिस परीक्षा के प्रश्न पत्र बनाने वाली की मंशा पर सवाल खड़े हो रहे हैं,   लेकिन सपा के निशाने पर योगी सरकार है. सपा के तमाम ब्राह्मण नेताओं ने इसे लेकर योगी सरकार को कठघरे में खड़े करते नजर आए. इतना ही नहीं बीजेपी के कई ब्राह्मण विधायकों ने भी सवाल पर अपनी नाराजगी जाहिर करते नजर आए.  यह पहली घटना नहीं है बल्कि कई यूपी में ब्राह्मणों को लेकर कई मामले हो गए हैं. 

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ब्राह्मण विधायकों की बैठक पर सख्त चेतावनी
उत्तर प्रदेश में दिसंबर 2025 में विधानसभा सत्र के दौरान बीजेपी के कुछ विधायकों ने लखनऊ में बैठक की थी, जिसे ब्राह्मण विधायकों के शक्ति प्रदर्शन के तौर पर देखा गया था. यह बात जैसे सामने आते ही बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी ने बैठक करने वाले ब्राह्मण विधायकों को सख्त चेतावनी दी थी. साथ ही उन्होंने कहा था कि ऐसी जाति आधारित बैठक वाली राजनीति को किसी भी सूरत में स्वीकार्य नहीं किया जाएगा. 

हालांकि, यूपी में बीजेपी के विधायकों की यह पहली बैठक नहीं थी, उससे पहले अगस्त 2025 में पार्टी के ठाकुर विधायकों ने लखनऊ में बैठक की थी. ठाकुर समाज के 40 से अधिक ठाकुर (क्षत्रिय) विधायकों और नेताओं की बैठक ने हलचल पैदा कर दी. यह बैठक एक फाइव-स्टार होटल में हुई, जिसे 'कुटुंब परिवार' नाम दिया गया था. ऐसे ही लोध और कुर्मी समुदाय के बीजेपी विधायकों की बैठक हुई थी, लेकिन उन्हें न ही कोई नोटिस दी गई और न ही चेतावनी.  

ब्राह्मण विधायकों की बैठक पर बीजेपी प्रदेश की चेतावनी के बाद भले ही पार्टी का कोई भी नेता न बोला हो, लेकिन सपा से लेकर कांग्रेस तक से सवाल उठाए थे. सपा ने कहा था कि बीजेपी के ब्राह्मण विधायक एक जगह न एकजुट हो सकते हैं और न ही आपस में वो कोई बात कर सकते हैं. सपा ने बीजेपी की ब्राह्मण पॉलिटिक्स पर सवाल खड़े कर दिए थे. 

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बटुक ब्राह्मणों की चोटी खींचने का विवाद
माघ मेले के दौरान प्रयागराज में ब्राह्मणों के साथ जो हुआ, वह विवाद अभी बना हुआ है. माघ मेले के दौरान शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद अपनी पालकी पर सवार होकर स्नान के लिए जा रहे थे, लेकिन कानून व्यवस्था का हवाला देकर पुलिस प्रशासन ने उन्हें रोका तो शंकराचार्य के समर्थक और पुलिस के बीच धक्का-मुक्की शुरू हो गई. ऐसे में पुलिस पर शंकराचार्य के साथ स्नान करने जा रहे बटुक ब्राह्मणों की चोटियां खींचने के आरोप लगाए गए. यह विवाद इतना ज्यादा बढ़ गया कि शंकराचार्य धरने पर बैठ गए और बिना स्नान के वापस लौट गए थे. 

शंकराचार्य के साथ प्रशासन के रवैए और बटुक ब्राह्मणों की चोटी खींचने का मामले को सपा और कांग्रेस ने राजनीतिक मुद्दा बना दिया.  मामला बहुत ज्यादा बढ़ा और ब्राह्मणों की नाराजगी को देखते हुए डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य ने इस घटने का विरोध किया तो डिप्टी सीएम बृजेश पाठक ने अपने सरकारी आवास पर करीब एक महीने के बाद  100 बटुकों को बुलाकर सम्मानित किया. इस तरह से ब्राह्मणों की नाराजगी को दूर करने की कवायद बृजेश पाठक करते नजर? 

‘घूसखोर पंडत’ फिल्म के टीचर पर संग्राम
सिनेमा को समाज का आइना माना जाता है. OTT प्लेटफॉर्म नेटफ्लिक्स के लिए एक फिल्म बनी ‘घूसखोर पंडत’. फरवरी 2026 को फिल्म का टीज़र जारी हुआ, जिसमें मनोज बाजपेयी एक भ्रष्ट पुलिस ऑफिसर की भूमिका हैं. जिन्हें पुलिस महकमे में 'पंडत' कहा जाता है. फिल्म के नाम को लेकर ब्राह्मण समुदाय ने देशभर में विरोध जताया. सड़क पर प्रदर्शन हुए, फिल्म के पोस्टर जलाए गए.  यूपी में सबसे ज्यादा विरोध हुआ. ब्राह्मण संगठनों ने इसे अपमानजनक बताते हुए विरोध किया, जिससे उत्तर प्रदेश में FIR और सुप्रीम कोर्ट तक मामला पहुंचा. 

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ब्राह्मण समुदाय के लोग फिल्म के टाइटल ‘घूसखोर पंडत’ रखने को लेकर 'ब्राह्मण समाज' को बदनाम करने साजिश बतायी थी. विवाद बढ़ने पर निर्माता नीरज पांडे ने शीर्षक बदलने और प्रोमोशनल सामग्री हटाने का फैसला किया है. मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा था. अदालत ने फिल्म रिलीज़ करने से पहले नाम बदलने का आदेश दिया. साथ ही फिल्म सर्टिफिकेट जारी करने वाली संस्था CBFC को नोटिस भी जारी किया. अब तक फिल्म का बदला हुआ नाम तय नहीं हो सका है.  

यूजीसी के नए नियम को लेकर सवर्ण नाराज
देश के शिक्षण संस्थानों में दलित और ओबीसी समुदाय के छात्रों के साथ होने वाले भेदभाव को खत्म करने के लिए यूजीसी ने नए नियम बनाए थे. इस लेकर सवर्ण समुदाय के लोग सड़क पर उतर गए थे. सड़क से सोशल मीडिया तक सबसे ज्यादा यूजीसी नियमों का विरोध ब्राह्मण समुदाय करता नजर आया. इसके बाद बरेली के सिटी मजिस्ट्रेट पद से अलंकार अग्निहोत्री नेअपने पद से इस्तीफा दे दिया. उन्होंने अपने इस्तीफे की वजह प्रयागराज माघ मेले में शंकराचार्य के शिष्यों के साथ कथित दुर्व्यवहार और नए यूजीसी नीतियों को कारण बताया था. 

यूजीसी का विरोध इतना ज्यादा हुआ कि सुप्रीम कोर्ट को सुनवाई करनी पड़ी. अदालत ने UGC एक्ट 2026 पर रोक लगा दी.  कोर्ट ने पाया कि ये नियम सामान्य वर्ग को लक्षित कर सकते हैं और जाति-आधारित भेदभाव के नियम अस्पष्ट हैं. मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की बेंच ने इस बात पर चिंता जताई कि नए नियम समाजिक बंटवारा कर सकते हैं तो
जस्टिस जॉयमाल्य बागची ने कहा कि नियम ऐसे लगते हैं जैसे कि वे किसी विशेष समुदाय (सामान्य वर्ग) को टारगेट कर रहे हैं, जो संवैधानिक एकजुटता के खिलाफ है. ऐसे में केंद्र सरकार फिर से नए नियम बनाकर अदालत के सामने रखे. 

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ब्राह्मण वोटों की नाराजगी महंगी न पड़ जाए
उत्तर प्रदेश में ब्राह्मणों की नाराजगी बीजेपी के लिए सियासी टेंशन बढ़ा सकती है. यूपी में करीब 10 फीसदी से ज्यादा ब्राह्मण वोटर हैं, जो बीजेपी का परंपरागत वोटबैंक माने जाते हैं. ब्राह्मण समाज का 85 से 90 फीसदी के बीच ब्राह्मण समाज बीजेपी को वोट कर रहा है. ऐसे में ब्राह्मणों की नाराजगी का सीधा मतलब बीजेपी को नुकसान. बीजेपी में ब्राह्मणों की उपेक्षा का मुद्दा उठाया 2017 के बाद से लगातार उठ रहा है. 

ब्राह्मण विधायकों की बैठक ने इस असंतोष को उजागर किया, जिसके बाद पार्टी को डैमेज कंट्रोल करना पड़ा. अब जिस तरह के एक बाद एक मामले सामने आ रहे हैं, उससे  चुनावों में भाजपा के लिए एक बड़ा खतरा बन सकती है. ब्राह्मणों की शिकायत है कि उन्हें पार्टी और सरकार में उचित सम्मान नहीं मिल रहा है और उनकी बात नहीं सुनी जा रही है. 

कुशीनगर के विधायक पीएन पाठक ने बैठक करके ब्राह्मणों के 'कर्तव्य' और अन्याय के खिलाफ खड़े होने की बात कहकर पार्टी नेतृत्व को परोक्ष संदेश दिया है, लेकिन पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष की सख्त चेतावनी के बाद वो भी खामोश बैठ गए. अब यूपी दरोगा भर्ती में जिस तरह से प्रश्नपक्ष में ब्राह्मणों को अवसरवादी कतार में लाकर खड़ा कर दिया है, उसके चलते सियासी बेचैनी बढ़ गई है. 

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