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लखनऊ के लग्जरी अपार्टमेंट में बैठकर अमेरिकी नागरिकों से कर रहे थे ठगी, पकड़ा गया इंटरनेशनल साइबर गैंग

लखनऊ के एक लग्जरी अपार्टमेंट में ऐसा 'ऑफिस' चल रहा था, जहां से रोज अमेरिका में फोन घनघनाते थे. दूसरी तरफ बैठे लोगों को बताया जाता था कि उनके कंप्यूटर में वायरस घुस गया है, बैंक अकाउंट खतरे में है और अगर तुरंत पैसे नहीं दिए तो जेल भी जाना पड़ सकता है. इसके बाद करोड़ों की साइबर ठगी का खेल शुरू होता था. अब क्राइम ब्रांच ने इसी रैकेट का भंडाफोड़ किया है.

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लखनऊ में इंटरनेशनल साइबर ठगी का अड्डा बेनकाब. (Photo: Representational)
लखनऊ में इंटरनेशनल साइबर ठगी का अड्डा बेनकाब. (Photo: Representational)

उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में क्राइम ब्रांच ने एक अंतरराष्ट्रीय साइबर फ्रॉड कॉल सेंटर का भंडाफोड़ किया है. यह फर्जी कॉल सेंटर सुशांत गोल्फ सिटी इलाके के ओमैक्स आर-2 अपार्टमेंट में चल रहा था. पुलिस ने यहां छापा मारकर सात आरोपियों को गिरफ्तार किया है. शुरुआती जांच में पता चला है कि गिरोह का निशाना मुख्य रूप से अमेरिका के नागरिक थे.

पुलिस के मुताबिक, आरोपी विदेशी नागरिकों के कंप्यूटर पर वायरस और मैलवेयर से जुड़े फर्जी पॉप-अप भेजते थे. इन पॉप-अप में एक टोल-फ्री नंबर दिया जाता था. जैसे ही कोई व्यक्ति उस नंबर पर कॉल करता, दूसरी तरफ बैठा शख्स खुद को माइक्रोसॉफ्ट टेक्निकल सपोर्ट, साइबर सिक्योरिटी एक्सपर्ट या फिर अमेरिकी सरकारी एजेंसी का अधिकारी बताता था.

इसके बाद पीड़ित को डराया जाता कि उसका बैंक अकाउंट, सोशल सिक्योरिटी नंबर और डिजिटल पहचान खतरे में है. अगर उसने तुरंत निर्देश नहीं माने तो उसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई हो सकती है या गिरफ्तारी भी हो सकती है.

यह भी पढ़ें: बेंगलुरु में फर्जी कॉल सेंटर्स का भंडाफोड़, अमेरिकी नागरिकों को ठगने वाले साइबर गैंग का पर्दाफाश

डर के माहौल में आरोपी पीड़ित से रिमोट एक्सेस सॉफ्टवेयर इंस्टॉल करा लेते थे. इसके बाद उनके कंप्यूटर का पूरा कंट्रोल अपने हाथ में ले लेते थे. फिर ठगी का खेल शुरू हो जाता था. पीड़ितों से कहा जाता कि समस्या ठीक करने या कानूनी कार्रवाई से बचने के लिए भुगतान करना होगा. यह रकम सीधे बैंक में नहीं, बल्कि अमेजन और वालमार्ट के गिफ्ट कार्ड, डिजिटल वाउचर और क्रिप्टोकरेंसी के जरिए वसूली जाती थी, ताकि ट्रांजेक्शन का पता लगाना मुश्किल हो.

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क्राइम ब्रांच की छापेमारी में पुलिस ने मौके से 8 लैपटॉप, 9 मोबाइल फोन, 9 हेडसेट, 4 वाई-फाई राउटर, विदेशी नागरिकों का डेटा, कॉलिंग स्क्रिप्ट, फर्जी सरकारी दस्तावेज, साइबर फ्रॉड में इस्तेमाल होने वाले कई इलेक्ट्रॉनिक उपकरण बरामद किए हैं.

जांच में यह भी सामने आया कि गिरोह अलग-अलग राज्यों से अंग्रेजी बोलने वाले युवाओं की भर्ती करता था. उन्हें बीपीओ कर्मचारियों की तरह काम कराया जाता था, लेकिन किसी तरह का वैध नियुक्ति पत्र नहीं दिया जाता था. कर्मचारियों को यह भी नहीं बताया जाता था कि वे जिस कॉल सेंटर में काम कर रहे हैं, वहां अंतरराष्ट्रीय साइबर ठगी का नेटवर्क चल रहा है या नहीं.

डीसीपी क्राइम अनिल कुमार यादव के अनुसार, पूरे नेटवर्क, वित्तीय लेनदेन और अंतरराष्ट्रीय कनेक्शन की जांच की जा रही है. यह पता लगाया जा रहा है कि इस साइबर फ्रॉड से अब तक कितने विदेशी नागरिकों को निशाना बनाया गया. बता दें कि लखनऊ में इंटरनेशनल साइबर फ्रॉड का यह कोई पहला मामला नहीं है. पिछले कुछ वर्षों में शहर में कई फर्जी कॉल सेंटर पकड़े जा चुके हैं.

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