Uttar Pradesh News: बदायूं के मूसाझाग थाना क्षेत्र स्थित सैजनी HPCL प्लांट में 12 मार्च को जनरल मैनेजर सुधीर कुमार गुप्ता और एजीएम हर्षित मिश्रा की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी. इस दोहरे हत्याकांड के मुख्य आरोपी अजय प्रताप सिंह के दो भाइयों, केशव और चंद्रशेखर ने बुधवार को न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम सौम्या अरुण की अदालत में सरेंडर कर दिया. पुलिस इन आरोपियों पर इनाम घोषित कर लगातार तलाश करने का दावा कर रही थी, लेकिन वे पुलिस की पकड़ में नहीं आए. साजिशकर्ता केशव ने खुद को बचाने के लिए HPCL कांड के बजाय किसी अन्य पुराने मामले में सरेंडर किया, जिससे मौके पर मौजूद पुलिस टीम को भनक तक नहीं लग सकी. अब पुलिस रिमांड के जरिए इनसे पूछताछ की तैयारी कर रही है.
इनाम की राशि पर उलझा पुलिस का दावा
इस मामले में पुलिस की कार्यशैली पर सबसे बड़ा सवाल इनाम की राशि को लेकर उठ रहा है. पहले आरोपियों पर 25-25 हजार रुपये का इनाम था.सरेंडर के बाद पुलिस ने बताया कि इनाम बढ़ाकर 50 हजार कर दिया गया था, जिससे दबाव में आकर आरोपियों ने सरेंडर किया.
हालांकि, यह जानकारी न तो मीडिया को दी गई और न ही सोशल मीडिया पर साझा की गई. बरेली रेंज के डीआईजी अजय साहनी ने सफाई दी कि इनाम 7 अप्रैल की शाम को ही बढ़ा दिया गया था, लेकिन तकनीकी कारणों से इसकी जानकारी सार्वजनिक नहीं हो सकी.
पुलिस की घेराबंदी को चकमा देकर पहुंचे कोर्ट
वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक अंकिता शर्मा ने बताया कि पुलिस की टीमें अदालत के आसपास तैनात थीं, लेकिन आरोपियों ने चतुराई दिखाते हुए मुख्य हत्याकांड के बजाय दूसरे मामलों में सरेंडर किया. मुख्य आरोपी अजय प्रताप का भाई केशव इस हत्याकांड में नामजद साजिशकर्ता है.
एसएसपी के मुताबिक, गुरुवार को केशव को रिमांड पर लेकर एचपीसीएल कांड में कोर्ट में पेश किया जाएगा. उन्होंने स्पष्ट किया कि प्लांट के अधिकारियों और कर्मचारियों की सुरक्षा उनकी प्राथमिकता है और प्लांट शुरू करने के लिए पुलिस पूरी तरह तैयार है.
एक आरोपी अब भी पुलिस की पकड़ से दूर
HPCL प्लांट हत्याकांड में नामजद पांच आरोपियों में से अब तक चार की गिरफ्तारी या सरेंडर हो चुका है. हालांकि, मुख्य आरोपी का एक और सहयोगी अभय प्रताप सिंह उर्फ कल्लू अभी भी फरार है. पुलिस की टीमें उसकी तलाश में जगह-जगह छापेमारी कर रही हैं. चर्चा यह भी है कि आरोपी पिछले कई दिनों से सरेंडर की फिराक में थे, लेकिन पुलिस उन्हें गिरफ्तार करने में नाकाम रही. अब सवाल यह है कि इतने संवेदनशील मामले में फरार आरोपियों को अदालत तक पहुंचने का मौका कैसे मिल गया.