उत्तर प्रदेश में ग्राम पंचायतों का कार्यकाल समाप्त होने के बाद ग्राम प्रधानों को प्रशासक नियुक्त किए जाने के मामले पर इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच ने अहम टिप्पणी की है. कोर्ट ने कहा कि इस मामले में सिर्फ प्रशासनिक व्यवस्था का सवाल नहीं है, बल्कि इससे जुड़े गंभीर संवैधानिक पहलुओं पर भी विचार किया जाना जरूरी है.
दरअसल, यह सुनवाई संजय कुमार शर्मा की ओर से दाखिल जनहित याचिका पर हुई. याचिका में सवाल उठाया गया है कि जब किसी ग्राम प्रधान का कार्यकाल समाप्त हो चुका है, तो उसी व्यक्ति को प्रशासक बनाकर पंचायत की कमान सौंपना क्या संविधान के अनुरूप है?
सुनवाई के दौरान अदालत ने सबसे अहम सवाल यही उठाया कि क्या ग्राम प्रधान को प्रशासक बनाना, उसके कार्यकाल को परोक्ष रूप से बढ़ाने जैसा नहीं है? अगर ऐसा है, तो फिर लोकतांत्रिक व्यवस्था और नियमित चुनाव कराने की संवैधानिक व्यवस्था का क्या होगा?
कोर्ट ने कहा कि इस मामले में गंभीर संवैधानिक प्रश्न उठते हैं और उत्तर प्रदेश पंचायती राज अधिनियम की संबंधित धारा की वैधता पर विचार किया जाना आवश्यक है. कोर्ट ने पंचायती राज विभाग के अपर मुख्य सचिव को अगली सुनवाई पर वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से पेश होकर अपना पक्ष स्पष्ट करने का निर्देश दिया.
कोर्ट ने कहा कि विचारणीय प्रश्न यह है कि ग्राम प्रधान को प्रशासक नियुक्त करने से क्या पंचायत का कार्यकाल अप्रत्यक्ष रूप से बढ़ जाता है. कोर्ट ने यह भी पूछा कि क्या इस व्यवस्था से राज्य निर्वाचन आयोग के संवैधानिक अधिकार प्रभावित होते हैं? क्योंकि पंचायत चुनाव कराना और समय पर लोकतांत्रिक प्रक्रिया पूरी कराना राज्य निर्वाचन आयोग की जिम्मेदारी है.
इन सवालों के जवाब के लिए हाई कोर्ट ने पंचायती राज विभाग के अपर मुख्य सचिव को अगली सुनवाई में वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होने का निर्देश दिया है. अदालत चाहती है कि सरकार स्पष्ट करे कि इस व्यवस्था का कानूनी आधार क्या है और इसे संविधान के अनुरूप कैसे माना जा सकता है. मामले की संवैधानिक गंभीरता को देखते हुए कोर्ट ने इसे पंचायत व्यवस्था से जुड़ी अन्य लंबित जनहित याचिकाओं के साथ टैग कर सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करने का आदेश दिया है. यानी अब इस मुद्दे पर व्यापक स्तर पर सुनवाई होगी.