25 जून 1950 को उत्तर कोरिया की सेना ने दक्षिण कोरिया पर अचानक हमला कर दिया. नॉर्थ कोरिया की सेना तेजी से राजधानी सियोल की ओर बढ़ गई. इससे कोरियाई युद्ध शुरू हो गया. इस पर संयुक्त राज्य अमेरिका ने तुरंत दक्षिण कोरिया की रक्षा के लिए कदम उठाया और अगले तीन वर्षों तक एक खूनी और निराशाजनक युद्ध लड़ाई जारी रही.
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद जापान के कब्जे वाले कोरिया को विभाजित कर दिया गया था. अमेरिकी सेनाओं ने दक्षिणी कोरिया में जापानी सेनाओं के आत्मसमर्पण को स्वीकार किया, जबकि सोवियत सेनाओं ने उत्तरी कोरिया में ऐसा ही किया. हालांकि, जर्मनी की तरह, यह अस्थायी विभाजन जल्द ही स्थायी हो गया. सोवियत संघ ने उत्तरी कोरिया में कम्युनिस्ट शासन की स्थापना में सहायता की, जबकि संयुक्त राज्य अमेरिका दक्षिणी कोरिया के लिए वित्तीय और सैन्य सहायता का मुख्य स्रोत बन गया.
25 जून, 1950 को उत्तर कोरियाई सेना ने दक्षिण कोरियाई सेना और देश में तैनात अमेरिकी सेना पर अचानक हमला कर दिया. इसके जवाब में, संयुक्त राज्य अमेरिका ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में एक प्रस्ताव पारित कराया, जिसमें दक्षिण कोरिया को सैन्य सहायता देने का आह्वान किया गया था. उस समय रूस सुरक्षा परिषद का बहिष्कार कर रहा था, इसलिए वह इस प्रस्ताव को वीटो करने के लिए उपस्थित नहीं था.
इस प्रस्ताव के पारित होते ही राष्ट्रपति हैरी एस. ट्रूमैन ने कोरिया में अमेरिकी थल, वायु और नौसेना बलों को शीघ्रता से भेजा और इसे पुलिस कार्रवाई करार दिया. अमेरिकी हस्तक्षेप ने युद्ध का रुख मोड़ दिया और अमेरिकी एवं दक्षिण कोरियाई सेनाएं उत्तर कोरिया में घुस गईं. हालांकि, इस कार्रवाई ने 1950 के अंत में कम्युनिस्ट चीनी सेनाओं के बड़े पैमाने पर हस्तक्षेप को जन्म दिया. इसके परिणामस्वरूप कोरिया युद्ध एक खूनी गतिरोध में उलझ गया.
1953 में अमेरिका और उत्तर कोरिया ने एक युद्धविराम समझौते पर हस्ताक्षर किए जिससे संघर्ष समाप्त हो गया. इस युद्धविराम समझौते के परिणामस्वरूप उत्तर और दक्षिण कोरिया का विभाजन लगभग उसी भौगोलिक बिंदु पर बना रहा जहां संघर्ष से पहले था.
कोरियाई युद्ध शीत युद्ध की पहली लड़ाई थी. इस संघर्ष में 55,000 से अधिक अमेरिकी सैनिक मारे गए. कोरिया पहला "सीमित युद्ध" था, जिसमें अमेरिका का उद्देश्य दुश्मन को पूरी तरह से हराना नहीं था, बल्कि दक्षिण कोरिया की रक्षा करना था. अमेरिकी सरकार के लिए, तीसरे विश्व युद्ध से बचने और सीमित अमेरिकी संसाधनों को वैश्विक स्तर पर अत्यधिक खर्च होने से रोकने के लिए यही एकमात्र तर्कसंगत विकल्प था.
द्वितीय विश्व युद्ध में मिली पूर्ण विजय के आदी अमेरिकी लोगों के लिए यह एक निराशाजनक अनुभव साबित हुआ. जनता को सीमित युद्ध की अवधारणा को समझना और उसका समर्थन करना कठिन लगा और कोरियाई युद्ध को कभी भी वास्तव में जनसमर्थन नहीं मिला.