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खतरनाक 'K-Travel' का जुनून, बच्चों के लिए 'साइलेंट किलर' बन रही है ये सनक

K-Culture अब भारत में सिर्फ एंटरटेनमेंट नहीं रह गया है. इसका असर अब बच्चों की सोच, उनकी पसंद और उनकी असल पहचान की परतों तक पहुंच चुका है. गाजियाबाद में 3 बच्चियों की खुदकुशी की घटना ने इस चमकदार दुनिया के पीछे छिपे उस खौफनाक अंधेरे को उजागर किया है.

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कोरिया जाने की सनक कैसे बनी जानलेवा (Photo-ITG)
कोरिया जाने की सनक कैसे बनी जानलेवा (Photo-ITG)

मोबाइल स्क्रीन पर चमकती एक जादुई दुनिया, बैकग्राउंड में बजता सुकून भरा कोरियन संगीत और वह 'परफेक्ट' लाइफस्टाइल आज के दौर में K-Culture की यह रील बच्चों के लिए केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि एक खतरनाक जुनून बन चुकी है. किसी देश को जानने या वहां घूमने की ख्वाहिश होना सामान्य है, लेकिन भारत में आज यह चाहत एक ऐसी जानलेवा सनक में बदल चुकी है जो हंसते-खेलते परिवारों को उजाड़ रही है.

इस डिजिटल दीवानगी का सबसे खौफनाक चेहरा गाजियाबाद में देखने को मिला, जहां तीन बच्चियों ने 'कोरियन वर्ल्ड' के काल्पनिक जाल में फंसकर अपनी जिंदगी खत्म कर ली. यह  घटना आगाह कर रही है कि बच्चे अब सिर्फ वीडियो नहीं देख रहे, बल्कि वे उस स्क्रीन के भीतर की आभासी दुनिया को ही अपनी असली हकीकत मान चुके हैं.

जब कोरिया जाने और वैसी ही जिंदगी जीने की सनक किसी मासूम के दिमाग पर हावी होती है, तो मोबाइल की वह चमकदार स्क्रीन मौत के अंधेरे कुएं में तब्दील हो जाती है.

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उस रात की हकीकत भी कुछ ऐसी ही रूह कपा देने वाली थी...

रात के करीब दो बज रहे थे, चारों तरफ गहरा सन्नाटा पसरा हुआ था और पूरा शहर अंधेरे में डूबा था. लोग अपने घरों में गहरी नींद में सो रहे थे, लेकिन गाजियाबाद की भारत सिटी सोसायटी के एक फ्लैट की नौवीं मंजिल का एक फ्लैट ऐसा था जहां अब भी रोशनी थी. किसी को अंदाजा नहीं था कि अगले ही पल वहां से एक ऐसी खबर आएगी जो पूरे देश को झकझोर कर रख देगी. उस फ्लैट में रहने वाली तीन नाबालिग बहनें, जिनकी उम्र सिर्फ 15, 14 और 12 साल थी अचानक एक साथ बालकनी से नीचे कूद गईं.

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पीछे छूट गई 18 पन्नों की एक डायरी, कुछ तस्वीरें और ढेर सारे ऐसे सवाल जिनका जवाब न पुलिस के पास है और न परिवार के पास. पुलिस की शुरुआती जांच में जो सामने आया, वो किसी को भी डरा सकता है. ये तीनों बहनें कोरियन कल्चर और संगीत से इस कदर जज्बाती तौर पर जुड़ गई थीं कि खुद को भारतीय मानने को तैयार ही नहीं थीं. वे अक्सर कहती थीं आप लोग इंडियन हैं, हम तो कोरियन हैं. जब घर वालों ने उनकी इस सनक को देखते हुए मोबाइल फोन छीना, तो उनके लिए यह सिर्फ एक फोन का जाना नहीं था, बल्कि अपनी उस पूरी काल्पनिक दुनिया का उजड़ जाना था, जिसे उन्होंने मोबाइल स्क्रीन पर बसा रखा था.

पुलिस का कहना है कि गाजियाबाद की ये तीनों बहनें कोरियन कल्चर से खुद की दूरी बर्दाश्त नहीं कर पा रही थीं. पिता का मानना है कि ऑनलाइन कोरियन गेम्स भी इसकी एक वजह हो सकते हैं, जिनमें कई बार ऐसे 'टास्क' दिए जाते हैं जो बच्चों पर मानसिक दबाव बनाते हैं. कोविड के बाद से ये तीनों बहनें स्कूल नहीं जा रही थीं. घर के हालात भी कुछ ठीक नहीं थे. ऐसे में मोबाइल ही उनका सबसे अच्छा दोस्त था और वही बाहर की दुनिया से जुड़ने का जरिया भी. यही नहीं, जब वही फोन उनसे लिया गया, तो उन्हें लगा कि अब जीने की कोई वजह ही नहीं बची.

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Ghaziabad three sisters death case
गाजियाबाद की घटना ने खड़े किए कई सवाल (Photo: Screengrab)

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K-Culture का सफर

कोरियन ड्रामा की वो दिल को छू लेने वाली कहानियां, वहां के कलाकारों का परफेक्ट अंदाज, चमकती हुई त्वचा और एक ऐसी दुनिया जहां सब कुछ बड़ा सुंदर और व्यवस्थित दिखता है. आज की नई पीढ़ी के लिए यह सिर्फ देखने की चीज नहीं रह गई है. यही कारण है कि बहुत से बच्चे अब कोरियन भाषा सीख रहे हैं, उन्हीं की तरह कपड़े पहनना चाहते हैं, वैसा ही खाना खाना चाहते हैं और सियोल की तरह अपनी जिंदगी जीने की कोशिश कर रहे हैं. इंस्टाग्राम रील्स इस असर को और तेज कर रहे हैं, जहां दो मिनट के भीतर एक परफेक्ट लाइफ का सपना दिखा दिया जाता है. धीरे-धीरे बच्चों के दिमाग में यह फर्क खत्म होने लगता है कि क्या रील है और क्या रीयल.

दोष किसका? कल्चर का या हमारी अनदेखी का

यह कहना बहुत आसान है कि 'कोरियन कल्चर खराब है.' लेकिन सच ऐसा नहीं है. कोई भी फिल्म या संगीत अपने आप में एक कला होती है. समस्या तब शुरू होती है जब बच्चे अपनी पहचान, अपने रिश्तों और अपनी असलियत से कटकर सिर्फ स्क्रीन की उस चमक-धमक वाली दुनिया में जीने लगते हैं. जहां रील की जिंदगी आसान लगती है और असल जिंदगी की चुनौतियां बहुत भारी.

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गाजियाबाद की यह घटना एक बहुत बड़ी चेतावनी है. यह बताती है कि बच्चों की ऑनलाइन दुनिया को हल्के में लेना कितना खतरनाक हो सकता है. संक्षेप में कहें तो, जरूरत इस बात की है कि माता-पिता सिर्फ फोन न छीनें, बल्कि बच्चों से बात करें. स्कूल सिर्फ किताबी ज्ञान न दें, बल्कि बच्चों के मन की बात भी सुनें. 

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