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होली खेलनी है तो मथुरा-वृंदावन है बेस्ट, यात्रा से पहले जानें ये टिप्स

ब्रज में होली का उत्सव एक-दो दिन नहीं, बल्कि बसंत पंचमी से शुरू होकर हफ्तों तक चलने वाली एक जीवंत परंपरा है. अगर आप इस बार होली पर कुछ अलग और यादगार अनुभव चाहते हैं, तो ब्रज का यह रंगोत्सव आपके ट्रैवल प्लान में जरूर होना चाहिए.

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अबीर-गुलाल से सराबोर ब्रज की गलियों का ये मनमोहक नजारा (Photo: Pexels)
अबीर-गुलाल से सराबोर ब्रज की गलियों का ये मनमोहक नजारा (Photo: Pexels)

देश भर में भले ही होली को दो दिनों के त्योहार के तौर पर मनाया जाता हो, लेकिन ब्रज में इसकी शुरुआत कई दिनों पहले से हो गई है. अगर आप इस बार कुछ अलग अनुभव करना चाहते हैं, तो आपको एक बार ब्रज जरूर जाना चाहिए. उत्तर प्रदेश के ब्रज क्षेत्र में होली का खुमार एक-दो दिन नहीं, बल्कि पूरे 40 दिनों तक चलता है.

भगवान कृष्ण और राधा रानी के प्रेम में डूबा यह उत्सव भक्ति, परंपरा और मस्ती का ऐसा संगम है, जो दुनिया में कहीं और देखने को नहीं मिलता. मथुरा की गलियों से लेकर नंदगांव के मंदिरों तक, यहां हर दिन होली का एक नया और अनोखा रंग देखने को मिलता है. 

ब्रज की होली का मतलब सिर्फ रंग और गुलाल नहीं है, बल्कि यह कान्हा के बचपन की यादों और लोक परंपराओं से जुड़ा एक बड़ा आयोजन है. इसे 'रंगोत्सव' इसलिए कहा जाता है क्योंकि यह एक लंबा कैलेंडर फॉलो करता है, जिसमें सिर्फ रंगों से खेलना ही नहीं बल्कि मंदिरों की खास रस्में भी शामिल होती हैं. संगीत, समाज गायन और गुलाल की ऐसी बारिश यहां होती है कि आपको लगेगा जैसे आप किसी और ही दुनिया में आ गए हैं. यहां हर शहर और गांव की अपनी एक अलग कहानी और परंपरा है, जो इसे बाकी दुनिया से अलग बनाती है.

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40 दिनों तक चलता है जश्न?

ब्रज में होली की तैयारी बसंत पंचमी से ही शुरू हो जाती है. इस बार भी त्योहार का ये सफर 23 जनवरी से शुरू हो चुका है. शुरुआत में यह उत्सव मंदिरों के अंदर भजनों और हल्के गुलाल के साथ धीमे-धीमे चलता है, लेकिन जैसे-जैसे दिन बीतते हैं, यह जोश सड़कों और गलियों तक पहुंच जाता है. यह पूरा कार्यक्रम 'रंग पंचमी' तक चलता है, जो मुख्य होली के भी कुछ दिनों बाद आती है. यानी आपके पास पूरा सवा महीना होता है ब्रज की संस्कृति को करीब से देखने और उसे जीने का.

इन जगहों पर दिखेगा होली का सबसे अनोखा रूप

ब्रज का हर कोना होली मनाता है, लेकिन कुछ खास जगहों का अपना ही रुतबा है. कान्हा के जन्मस्थान मथुरा से इस उत्सव का भव्य आयोजन होता है, जहां विश्राम घाट की आरती और मंदिरों के सांस्कृतिक कार्यक्रम देखने लायक होते हैं. वहीं बरसाना की लठमार होली तो पूरी दुनिया में मशहूर है, जहां महिलाएं लाठियां चलाकर अपनी शक्ति दिखाती हैं और नंदगांव के पुरुष ढाल लेकर अपना बचाव करते हैं. इसके अलावा वृंदावन की फूलों वाली होली का अपना ही आकर्षण है. बांके बिहारी मंदिर में जब भक्तों पर क्विंटलों फूलों की बारिश होती है, तो वह नजारा किसी जन्नत से कम नहीं लगता. यहां लड्डू होली और लाठी मार होली जैसे आयोजन भी पर्यटकों को मंत्रमुग्ध कर देते हैं.

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ब्रज जाने वालों के लिए कुछ जरूरी टिप्स

अगर आप इस बार होली का जश्न ब्रज में मनाना चाहते हैं तो कुछ बातें पहले ही नोट कर लें क्योंकि यहां इस दौरान बहुत भीड़ होती है. इसलिए, होटल या धर्मशाला की बुकिंग समय से पहले कर लेना ही समझदारी है, ताकि बाद में भटकना न पड़े. कपड़ों की बात करें तो ऐसे कपड़े पहनें जो खराब होने पर आपको दुख न दें और सफेद कुर्ता-पायजामा यहां सबसे ज्यादा पसंद किया जाता है.

भीड़ बहुत ज्यादा होती है, इसलिए अपने मोबाइल और कीमती सामान का खास ख्याल रखें. अच्छा होगा अगर आप अपने फोन को वॉटरप्रूफ कवर में रखें ताकि रंग और पानी से उसे बचाया जा सके. ब्रज की होली का मतलब ही है 'आनंदमयी अराजकता', इसलिए यहां पूरी मस्ती और खुले मन के साथ ही आएं.

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