वामन जयंती (Vamana Jayanti) हिंदू धर्म में भगवान विष्णु के वामन अवतार से जुड़ा प्रमुख धार्मिक पर्व है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन भगवान विष्णु ने वामन रूप में अवतार लिया था. वामन को भगवान विष्णु का पांचवा अवतार माना जाता है. यह पर्व भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की द्वादशी तिथि को मनाया जाता है.
पौराणिक कथाओं में वामन अवतार का संबंध राजा बलि से बताया गया है. राजा बलि असुर कुल से संबंधित थे और अपनी शक्ति तथा दानशीलता के लिए प्रसिद्ध माने जाते थे. कहा जाता है कि उन्होंने तीनों लोकों पर अपना अधिकार स्थापित कर लिया था. देवताओं की प्रार्थना पर भगवान विष्णु ने वामन रूप धारण किया और राजा बलि के पास पहुंचे.
कथा के अनुसार भगवान वामन ने राजा बलि से तीन पग भूमि दान में मांगी. राजा बलि ने उनकी मांग स्वीकार कर ली. इसके बाद वामन रूप में आए भगवान विष्णु ने विशाल रूप धारण कर लिया. उन्होंने एक पग में पृथ्वी और दूसरे पग में आकाश को नाप लिया. तीसरे पग के लिए स्थान नहीं बचा तो राजा बलि ने अपना सिर आगे कर दिया. इस प्रकार भगवान विष्णु ने राजा बलि की परीक्षा ली.
वामन जयंती के दिन भगवान विष्णु के वामन स्वरूप की पूजा की जाती है. भक्त सुबह स्नान आदि से निवृत होकर पूजा की तैयारी करते हैं. पूजा स्थल की सफाई के बाद भगवान विष्णु की प्रतिमा या चित्र स्थापित किया जाता है. इसके बाद जल, फूल, फल, दीप और नैवेद्य अर्पित किए जाते हैं. इस दिन वामन अवतार की कथा का पाठ या श्रवण भी किया जाता है.
धार्मिक मान्यता के अनुसार वामन जयंती के अवसर पर व्रत रखने की परंपरा भी है. कुछ लोग पूरे दिन उपवास रखते हैं, जबकि कुछ लोग फलाहार करते हैं. पूजा के दौरान भगवान विष्णु के मंत्रों का जाप किया जाता है. मंदिरों में भी इस अवसर पर विशेष पूजा और धार्मिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं.
वामन जयंती भगवान विष्णु के वामन अवतार से जुड़ी धार्मिक परंपराओं और पौराणिक कथाओं को याद करने का अवसर माना जाता है. इस दिन भगवान विष्णु की पूजा, व्रत, कथा श्रवण और दान आदि धार्मिक कार्य किए जाते हैं. अलग अलग क्षेत्रों में वामन जयंती मनाने की परंपराओं में कुछ अंतर भी देखने को मिलता है.