भुवनेश्वरी जयंती (Bhuvaneshwari Jayanti) हिंदू धर्म में देवी भुवनेश्वरी की आराधना से जुड़ा एक प्रमुख धार्मिक अवसर है. देवी भुवनेश्वरी को दस महाविद्याओं में चौथी महाविद्या के रूप में जाना जाता है. धार्मिक मान्यताओं में उन्हें जगत की अधिष्ठात्री शक्ति और सृष्टि की मूल ऊर्जा का स्वरूप माना गया है. भुवनेश्वरी नाम का अर्थ भुवन की ईश्वरी अर्थात तीनों लोकों की स्वामिनी से जोड़ा जाता है.
भुवनेश्वरी जयंती का आयोजन देवी भुवनेश्वरी के प्राकट्य दिवस के रूप में किया जाता है. इस दिन श्रद्धालु देवी की पूजा और आराधना करते हैं. धार्मिक मान्यता के अनुसार देवी भुवनेश्वरी का स्वरूप शक्ति, प्रकृति और सृष्टि से जुड़ा हुआ है. कई स्थानों पर इस अवसर पर विशेष पूजा, हवन और धार्मिक अनुष्ठान भी किए जाते हैं.
इस दिन सुबह स्नान आदि से निवृत होकर पूजा स्थल की सफाई की जाती है. इसके बाद देवी भुवनेश्वरी की प्रतिमा या तस्वीर को स्थापित करके विधि विधान से पूजा की जाती है. पूजा में देवी को फूल, फल, धूप, दीप और नैवेद्य अर्पित किए जाते हैं. श्रद्धालु अपनी श्रद्धा के अनुसार देवी के मंत्रों का जाप और स्तुति करते हैं.
भुवनेश्वरी जयंती के अवसर पर मंदिरों में भी विशेष आयोजन किए जाते हैं. कुछ स्थानों पर भजन, कीर्तन और धार्मिक कथाओं का आयोजन होता है. भक्त देवी की पूजा के साथ उनके स्वरूप और धार्मिक महत्व से जुड़ी कथाओं का श्रवण भी करते हैं.
दस महाविद्याओं की परंपरा में देवी भुवनेश्वरी का विशेष स्थान माना जाता है. धार्मिक ग्रंथों और परंपराओं में उनके स्वरूप का वर्णन अलग अलग तरीके से मिलता है. देवी को संसार की पालन करने वाली शक्ति के रूप में भी देखा जाता है.
भुवनेश्वरी जयंती के दिन श्रद्धालु व्रत भी रखते हैं. व्रत रखने की विधि अलग अलग परिवारों और धार्मिक परंपराओं के अनुसार हो सकती है. कुछ लोग दिनभर उपवास रखते हैं, जबकि कुछ लोग फलाहार करते हैं. पूजा और व्रत के साथ जरूरतमंद लोगों को भोजन, वस्त्र या अन्य सामग्री दान करने की परंपरा भी कई जगह देखने को मिलती है.
इस अवसर पर श्रद्धालु देवी भुवनेश्वरी का स्मरण करते हुए पूजा पाठ करते हैं और धार्मिक गतिविधियों में शामिल होते हैं. देवी से जुड़े मंत्रों, स्तोत्रों और कथाओं का पाठ भी किया जाता है. इस तरह भुवनेश्वरी जयंती देवी भुवनेश्वरी की उपासना और शक्ति परंपरा से जुड़ा धार्मिक पर्व है.