क्या आप यकीन करेंगे कि संघ से जुड़े संगठन विद्या भारती के स्कूलों में इस साल 57,123 मुस्लिम छात्र और 9947 ईसाई छात्र पढ़ाई कर रहे हैं? क्या आप ये मानेंगे कि विद्या भारती के स्कूलों में इस साल अध्यापकों (आचार्यों) की संख्या बढ़कर 1,52, 624 हो गई है, जो कई राज्यों की कुल सरकारी अध्यापक संख्या की संयुक्त संख्या से भी कहीं ऊपर है? इसी सत्र में 8199 नए अध्यापकों को इन स्कूलों में रोजगार मिला है? इस सत्र में शामिल हुए 64,333 छात्रों को जोड़कर विद्या भारती के स्कूलों में कुल छात्र संख्या 33,32,774 हो गई है, इस पर आपको हैरत हो सकती है. देश के 775 जिलों में विद्या भारती से जुड़े स्कूलों का काम पहुंच चुका है. जबकि एक दौर वो था, जब 1952 में पहला सरस्वती शिशु मंदिर खोलने के लिए भाऊराव देवरस और भारत रत्न नानाजी देशमुख जैसे दिग्गजों को सहायता करनी पड़ी थी. आज विद्या भारती समेत शिक्षा के क्षेत्र में इतनी सारी संघ से जुड़ी संस्थाएं काम कर रही हैं, तो बड़ा श्रेय परिवार त्यागकर प्रचारक बने उन स्वयंसेवकों को जाना चाहिए, जिन्होंने इस ध्येय के लिए सर्वस्व होम कर दिया.
सरस्वती मंदिर खोलने वाले ‘गांधी’ की कहानी
राहुल गांधी और उनके नाम में केवल ‘गांधी’ ही एक जैसा नहीं है, बल्कि ये भी तथ्य है कि दोनों ने ‘गांधी’ उपनाम गांधीजी से ही लिया हुआ है. पहले सरस्वती शिशु मंदिर की स्थापना से नाम जुड़ा है कृष्ण चंद्र गांधी का, जिनका मूल नाम कृष्ण चंद्र मित्तल था. मेरठ के मुरारी लाल मित्तल के यहाँ उनका जन्म उसी दिन 1921 में हुआ था, जिस दिन चार साल बाद राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना हुई थी, यानी विजयादशमी को.
राहुल गांधी ने तो अब जाकर ठंड में भी टी-शर्ट पहनना शुरू किया है, लेकिन फिर भी वो विदेशों में जाकर कोट, स्वेटर, जैकेट आदि पहन लेते हैं, कृष्ण चंद्र तो सर्दियों में भी ठंडे पानी से नहाने के बाद केवल धोती पहनकर काफी देर ध्यान योग करते थे. उन्होंने अपने पूरे जीवन में ना कभी मोजा पहना, ना कभी स्वेटर पहना और ना ही कभी पायजामा, धोती ही पसंद थी उन्हें. बहुत ठंड पड़ती थी तो वो एक शॉल जरूर साथ रखते थे.
शाहरुख खान के बार में प्रसिद्ध है कि फिल्मों में आने के बाद वो साबुन का प्रयोग नहीं करते, लेकिन कृष्ण चंद तो साबुन, तेल का बचपन से ही प्रयोग नहीं करते थे. उससे भी दिलचस्प बात ये कि उन्होंने कभी भी कोई अंग्रेजी दवा नहीं ली और ना ही कभी अस्पताल में ही भर्ती हुए और ना ही कभी उन्हें चश्मा लगाने की जरुरत ही पड़ी. उनकी ऐसी सादगी के चलते लोग उन्हें ‘गांधी’ कहने लगे थे, धीरे धीरे वो कृष्ण चंद्र मित्तल के बजाय कृष्ण चंद्र गांधी कहलाने लगे. केसी केवल गाय का दूध पीते थे.
1943 में वे संघ से जुड़े, स्वयंसेवक बने. सुगठित शरीर होने के कारण शाखा के शारीरिक कार्यक्रम उन्हें बहुत भाते थे. संघ में घोष के साथ ही उन्हें घुड़सवारी व तैराकी भी बहुत प्रिय थी. 1944 में बी.ए. करने के बाद वे प्रचारक बन गये. उनके मन में करुणा ऐसे बहती थी कि कभी रिक्शॉ में नहीं बैठते थे, यदि किसी के साथ साइकिल पर जाना हो, तो वे स्वयं ही साइकिल चलाते थे. वे कहते थे कि मानव की सवारी तो तब ही करूंगा, जब चार लोग मुझे शमशान ले जाएंगे.
संघ में प्रचलित है कंस के किले को ढूंढने की कहानी
अगली साल ही उन्हें मथुरा में प्रचारक की जिम्मेदारी देकर भेज दिया गया. मथुरा में कंस टीला में संघ का उन दिनों कार्यालय था, ये कार्यालय यमुना के बिलकुल करीब कंस टीले पर था, कहा जाता था कि वहां कभी कंस का किला था. अक्सर उस टीले से छलांग लगाकर केसी गांधी यमुना में कूदकर उसे पार कर जाया करते थे. लोगों से कंस किले की कहानियां सुनीं तो उन्होंने उस टीले को खरीदकर एक जगह खुदवा डाला और वहां वाकई में एक किले के अवशेष निकल आए. ऐसे दावे संघ से जुड़े पुराने पत्र-पत्रिकाओं में मिलती है. बाद में उसे ‘केशव दुर्ग’ नाम दे दिया गया था. ये भी काफी अनोखा था कि संघ के दो सरसंघचालको का नम भगवान कृष्ण के नाम पर था, केशव व माधव और केसी गांधी का तो नाम ही कृष्ण था, ऐसे में ‘केशव दुर्ग’ नाम रखने की चर्चा भी उस वक्त हुई ही होगी.
कभी उस जमीन पर चलता था स्लॉटर हाउस, बाद में बना पहला शिशु मंदिर
1952 में केसी गांधी को गोरखपुर का विभाग प्रचारक बनाकर भेजा गया. नानाजी देशमुख पहले से वहां थे, उन दिनों वे संघ की तरफ से जनसंघ का कार्य देख रहे थे. उन दिनों प्रांत प्रचारक का दायित्व भाऊराव देवरस के पास था. दैनिक जागरण को नानाजी के निकट सहयोगी जगदीश प्रसाद गुप्त ने बताया था कि, “पहला शिशु मंदिर खोलने में नानानी देशमुख को प्रांत प्रचारक भाऊराव देवरस और पंडित दीनदयाल उपाध्याय का भी सहयोग मिला और 1952 में उन्होंने स्कूल की नींव रख दी”. जगदीश गुप्त के अनुसार पहले कुछ दिनों तक यह स्कूल मानसरोवर रामलीला मंदिर के पास मक्खन बाबू के बागीचे में चला लेकिन बाद में उन्हें वर्तमान पक्कीबाग में बाबू गिरधरदास की जमीन किराए पर मिल गई. उसका किराया उन दिनों पांच रुपये था. पहले उस जमीन पर स्लाटर हाउस चलता था, जिसे साफ कर नानाजी और तत्कालीन विभाग प्रचारक कृष्णचंद्र गांधी ने शाखा लगानी शुरू की और देखते ही देखते वहां स्कूल स्थापित हो गया. फिर तो तेजी से उत्तर प्रदेश में शिशु मंदिरों की संख्या बढ़ने लगी.
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1958 में एक राज्य स्तरीय शिशु शिक्षा प्रबंधन समिति का गठन किया गया. चूंकि सरस्वती शिशु मंदिर तो केवल पांचवी कक्षा तक ही थे, सो 12वीं तक की कक्षाओं को लिए सरस्वती विद्या मंदिरों की स्थापना की गई. सो 1977 में "विद्या भारती अखिल भारतीय शिक्षा संस्थान" की स्थापना हुई. 1989 में विद्या भारती के लक्ष्य का विस्तार किया गया, जिसमें राष्ट्रीय शिक्षा प्रणाली का विकास करना और भारत-केंद्रित शिक्षा प्रणाली विकसित करना सम्मिलित था.
आज मथुरा में एक सरस्वती मंदिर केसी गांधी के ही नाम पर है. उत्तर प्रदेश के बाद उन्हें पूर्वोत्तर भारत में भेजा गया. हाफलांग में उन्होंने नौ जनजातियों के 10 बच्चों का एक छात्रावास प्रारम्भ किया, जो अब वहां के सम्पूर्ण कार्य का केन्द्र बना हुआ है. रांची के 'संदीपनी आश्रम' में रहकर उन्होंने वनवासी शिक्षा का पूरा स्वरूप तैयार किया तथा प्राची जनजाति सेवा न्यास, मथुरा के माध्यम से उसके लिए धन का प्रबंध भी किया. लखनऊ में ‘सरस्वती कुंज, निराला नगर’ और मथुरा में ‘शिशु मंदिर प्रकाशन’ उन्हीं की देन है.
स्वास्थ्य काफी ढल जाने पर उन्होंने मथुरा में ही रहना पसंद किया. जब उन्हें लगा कि अब यह शरीर लम्बे समय तक शेष नहीं रहेगा, तो उन्होंने एक बार फिर पूर्वोत्तर भारत का प्रवास किया. वहां वे सब कार्यकर्ताओं से मिलकर अंतिम रूप से विदा लेकर आये. इसके बाद उनका स्वास्थ्य लगातार गिरता गया. यह देखकर उन्होंने भोजन, दूध और जल लेना बंद कर दिया. गोलोक जाने से थोड़ी देर पहले ही उन्होंने श्री बांके बिहारी मंदिर का प्रसाद ग्रहण किया था, शायद उन्हें कुछ आभास हो गया था. ये 24 नवम्बर 2002 की तारीख थी.
लज्जाराम तोमर ने पुलिस की नौकरी ठुकराकर शिक्षा क्षेत्र की दिशा बदली
मुरैना के लज्जाराम तोमर का नाम भी संघ के उन स्वयंसेवकों में लिया जाता है, जिन्होंने शुरूआती दौर में सरस्वती शिशु मंदिर व्यवस्था को मजबूत बनाने में अहम योगदान दिया. जब मुरैना में मैट्रिक की परीक्षा में वो पूरे जिले में प्रथम आए थे, तो उन्हें जिला प्रशासन की तरफ से पुलिस उपनिरीक्षक के पद का प्रस्ताव मिला था, लेकिन ये कहकर उन्होंने मना कर दिया था कि मुझे तो शिक्षक ही बनना है, 1958 में उन्होंने प्राध्यापक का पद छोड़कर आगरा में सरस्वती विद्या मंदिर के संस्थापक प्रधानाचार्य का पद संभाला.
उनको शिक्षा क्षेत्र में नवाचारों के लिए जाना जाता है. भारतीय प्राचीन शिक्षा पद्धतियो को ध्यान में रखते हुए उन्होंने कई सारे प्रयोग किए. 1972 में उन्होंने भारतीय शिक्षा समिति उत्तर प्रदेश के संस्थापक मंत्री का दायित्व संभाला. 1984 से लेक 2004 तक उन्होने भारतीय शिक्षा प्रणाली पर इतनी किताबें लिखीं कि आज भी चर्चा होती है. 1995 में वे इंगलैंड और हॉलैंड की यात्राओं पर गए और अनेक गोष्ठियों में भारतीय शिक्षा का विचार रखा. मुख्य उद्देश्य भारतीय शिक्षा का प्रचार प्रसार ही था. लम्बे समय तक वो विद्या भारती के साथ राष्ट्रीय मार्गदर्शक की भूमिका में जुड़े रहे थे.
सरस्वती शिशु मंदिर श्रृंखला से भी पहले खुला था कुरुक्षेत्र में गीता स्कूल, जुड़ा है गुरु गोलवलकर का नाम
इस स्कूल की वेबसाइट पर स्कूल का इतिहास लिखा है, स्कूल की तरफ से प्रथम पुरुष में लिखवाया गया है. जिसकी शुरूआती लाइनें हैं, “मेरा जन्म 19 नवंबर 1946 को हुआ था. मैं बहुत भाग्यशाली हूं कि महान व्यक्तित्व, परम पूजनीय माधव राव सदाशिव राव गोलवलकर जी द्वारा 'योग' को अर्पित की गई भेंटों से मेरा जन्म हुआ। वे एक सदाचारी आत्मा थे. मेरा बचपन कई कठिनाइयों से भरा रहा. सबसे पहले मुझे कुरुक्षेत्र के काली कमली आश्रम में रखा गया. फिर मुझे पास के ही कृष्ण औषधालय में स्थानांतरित कर दिया गया. कुछ समय बाद कुछ उदार दानदाताओं ने मेरे नाम पर 25 एकड़ भूमि दान कर दी. तब मुझे केवल टिन की एक झोपड़ी और खेलने के लिए ऊबड़-खाबड़ जमीन मिली. आदरणीय खेम चंद जी मेरे पहले प्रधानाचार्य थे और उनके साथ 12 अन्य शिक्षक भी थे. उस समय विद्यार्थियों की संख्या लगभग 250 थी.“
1973 में अपनी मृत्यु से कुछ ही महीने पहले, उसी परिसर में दूसरे गीता विद्यालय का उद्घाटन करते हुए, गुरु गोलवलकर ने श्रोताओं को याद दिलाया था, “यह कुरुक्षेत्र की भूमि है. कहा जाता है कि कौरवों और पांडवों का युद्ध इसी स्थान पर हुआ था. युद्ध के पहले दिन, भगवान कृष्ण ने अर्जुन को प्रेरित किया था और उन्हें भगवद् गीता के उपदेश से धर्म का मार्ग दिखाया था. शिलान्यास [1946 में] के समय, मैंने यह इच्छा व्यक्त की थी कि यह विद्यालय, जो भगवान कृष्ण की स्मृति में स्थापित किया गया है, जिन्होंने समस्त विश्व को कर्म-योग का पवित्र ज्ञान दिया, उनके द्वारा प्रतिपादित मूल्यों का एक उदाहरण बने.”
लगातार जुटी रही दीनानाथ बत्रा और अतुल कोठारी की जोड़ी
कुरुक्षेत्र के गीता स्कूल स्कूल की वेबसाइट पर आगे बताया गया है कि कैसे संघ के ‘शिक्षा के भारतीयकरण’ के कई दशकों तक सूत्रधार रहे दीनानाथ बत्रा का भी रिश्ता इस स्कूल से रहा था. इसकी आगे की लाइनों में लिखा है कि, “1964 से 1991 तक श्री दीना नाथ बत्रा जी ने अपनी अटूट इच्छाशक्ति और दृढ़ संकल्प से मुझे पिता तुल्य प्रेम दिया. 1975 में कांग्रेस सरकार द्वारा घोषित आपातकाल मेरे लिए एक करारा झटका साबित हुआ. मेरे प्रधानाचार्य श्री दीना नाथ जी और कई अन्य शिक्षकों को जेल में डाल दिया गया था. मैं उन 18 महीनों को कभी नहीं भूल सकता. राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ द्वारा संचालित एक आदर्श प्रधानाचार्य के कार्यों का मूल्यांकन आपातकाल समाप्त होने के बाद किया गया और उन्हें राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार से सम्मानित किया गया. 1968 से 1978 तक का समय मेरे सर्वांगीण विकास के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण था. मुझे माध्यमिक स्तर की कक्षा में प्रवेश मिला.”
उन्होंने 1964 की गर्मियों में डेरा बस्सी के एक डीएवी (दयानंद एंग्लो-वैदिक) स्कूल में प्रधानाचार्य का पद छोड़ दिया था, ताकि कुरुक्षेत्र के गीता स्कूल को आर्थिक दिवालियापन से बाहर निकाल सकें. कहा जाता है कि उन्होंने यह कार्य इस दृढ़ संकल्प के साथ शुरू किया कि गुरुजी गोलवलकर की अपनी परियोजना को विफल नहीं होने दिया जा सकता.
इसी दिशा में दीनानाथ बत्रा के निकट सहयोगी रहे अतुल कोठारी जी का उल्लेख महत्वपूर्ण है, अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के सर्वोच्च पदों पर रहे अतुल कोठारी ने अपना जीवन शिक्षा को ही समर्पित कर दिया था. शिक्षा क्षेत्र के सुधार में उन्होंने जितना काम किया है, वैसे विरले लोग देश में कम ही हैं. उनका ध्येय वाक्य रहा है, “देश को बदलना है तो शिक्षा को बदलना होगा’. नई शिक्षा नीति को तैयार करने में उनकी महती भूमिका रही है, अब भी वे लगातार उसके प्रचार प्रसार और लागू करवाने में लगे हुए हैं. उनके नारे ‘मॉं , मातृभूमि एवं मातृभाषा का कोई विकल्प नहीं’ को आज हर कोई स्वीकार कर रहा है. दीनानाथ जी के साथ उनकी जोड़ी सालों तक शिक्षा क्षेत्र के भारतीयकरण, रोजगारोन्मुखी बनाने और चारित्रिक विकास से जोड़ने के प्रयासों में लगी रही. पहले 2004 में ‘शिक्षा बचाओ आंदोलन’ शुरू किया गया, फिर 2007 में ‘शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास’ का गठन किया गया और 2015 में ‘भारतीय भाषा मंच’ का गठन किया गया.
संघ के कई प्रचारकों ने शिक्षा के क्षेत्र में क्रांति की
बालासाहब देवरस के अंतिम दिनों में निजी सचिव और बाद में अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख श्रीकांत जोशी जी का नाम भी उल्लेखनीय है, विद्या भारती के माध्यम से उन्होंने बहुत सारे विद्यालय खड़े किए थे. उनका कार्यक्षेत्र उन दिनों महाराष्ट्र था, लेकिन उत्तर प्रदेश में जब शिशु मंदिर क्रांति हो रही थी, तब एक जोड़ी बड़ी तेजी से उभरी, नाम थे राणा प्रताप सिंह और कृष्ण चंद्र गोपी. राणा प्रताप मैनपुरी के एक कायस्थ वकील के बेटे थे, आगरा से 1947 में बीएससी करने के बाद उनका एमबीबीएस में एडमीशन हो गया था, लेकिन संघ से जुड़ जाने की वजह से उनकी सोचने की दिशा बदल गई थी. वे संघ के प्रचारक हो गए और मैनपुरी, फिरोजाबाद, इटावा जैसे शहरों में प्रचारक रहे. उनकी व कृष्ण चंद्र गोपी की जोड़ी को ये श्रेय जाता है कि उन्होंने उत्तर प्रदेश व उत्तराखंड के शहरों में सरस्वती शिशु मंदिरों का जाल सा बिछा दिया था.
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