1964 का साल था, तब के सरसंघचालक गुरू गोलवलवकर एक कार्यकर्ता बैठक में भोपाल आए थे. इस बैठक में शामिल कार्यकर्ताओं से श्री गुरूजी ने दो व्यक्तियों का परिचय कराया था. इनमें एक थे पंडित दीनदयाल उपाध्याय, और दूसरे का परिचय कराते हुए उन्होंने कहा था, ‘‘यह जो दुबला पतला लड़का माईक ठीक कर रहा है न, उसे माइक वाला मत समझ लेना, ये टेलीकम्युनिकेशन में इंजीनियर है और आज से आपका प्रांत प्रचारक है’’. माइक सुधारने वाले वे व्यक्ति थे के एस सुदर्शन, कुप्पहल्ली सीतारमैया सुदर्शन इससे पूर्व वे महाकोशल प्रांत के प्रचारक थे. किसी को क्या पता था कि एक दिन ये टेलीकम्युनिकेशन का इंजीनियर वहां भी कम्युनिकेशन के तार जोड़ने में सफल होगा, जहां कोई टेलीकॉम टॉवर तक लगाने की अनुमति नहीं देता.
केएस सुदर्शन का तब के मैसूर राज्य के मांडया जिले में कुप्पहल्ली गांव से उनके परिवार का सम्बंध था, गांव का नाम वो अपने नाम में हमेशा साथ रखते थे, हालांकि उनका जन्म रायपुर में हुआ था. एक दिन वो संघ के पांचवे सरसंघचालक बने, तब उन्होंने उस कार्य का बीड़ा उठाया, जिसकी नींव कभी दूसरे सरसंघचालक गुरु गोलवलकर और तीसरे सरसंघचालक बालासाहब देवरस ने रखी थी. मुस्लिम और ईसाई समुदायों में संघ के काम का विस्तार करना.
बुधवार 2 अक्तूबर, 2002 का वह दिन था. पश्चिम एशिया के सात देशों के सात राजदूत दिल्ली में संघ के मुख्यालय 'केशव कुंज' में केएस सुदर्शन के साथ वार्त्तालाप करने के लिए उपस्थित थे. वे सभी राजदूत संघ प्रमुख केएस सुदर्शन की बातें सुनने के लिए दो घंटे तक जमीन पर बैठे रहे. उस प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व कोई दूसरा नहीं, बल्कि इराक के राजदूत सलेह मुख्तार कर रहे थे. इस बैठक में सीरिया, लीबिया, सूडान, ईरान तथा संयुक्त अरब अमीरात के राजदूत मौजूद थे. सऊदी अरब दूतावास के प्रथम श्रेणी सचिव भी उपस्थित थे. विश्व में हो रही घटनाएं तथा अरब राष्ट्रों में जो भी समस्याएं हैं, उस पर सुदर्शनजी के विचार सुनने में उनकी रुचि थी. केएस सुदर्शन ने भारत के वसुधैव कुटुम्बकम के मूल मंत्र से लेकर ये तक बताया कि कैसे हजारों साल से इस धरती पर भिन्न भिन्न मतों को मानने वाले लोग रहते आए हैं और फिर भी शांति बनी रही क्योंकि हिंदू स्वाभाविक रूप से धर्मनिरपेक्ष होता है. पूजा पद्धतियां अलग अलग हो सकती हैं, लेकिन यहां तो भगवान को न मानने वाले चार्वाक जैसे नास्तिक भी हिंदू ही माने जाते हैं.
उनका सीधा संदेश यही था कि इस भूमि की कुछ परम्पराएं, कुछ तौर-तरीके, कुछ मान्यताए हैं, उनका सम्मान होना ही चाहिए. उन्होंने अपने सम्बोधन में तमाम हिंदू प्राचीन ग्रंथों को उल्लेख किया और कहा कि यहां जितने भी शरणागत आए, उन्होंने यहां की परम्पराओं का सम्मान किया तो उनको यहां के लोगों ने कभी नुकसान नहीं पहुंचाया. हजारों सालों से यहूदी, पारसी यहां रहते आ रहे हैं. लेकिन हमलावर की तरह आना और फिर सैकड़ों साल बाद भी उन्हीं के जैसे तेवर रखना, उनपर गर्म करना भारत की आत्मा को कचोटता है. सभी समुदायों के लोगों को इसका ध्यान रखना होगा. उन्होंने अलग अलग क्षेत्र के उन भारतीय मुस्लिमों की भी मिसाल दी, जिन्होंने भारत को हृदय से अपनाया. उन्होंने भारत सरकार की वर्तमान 'सेक्युलर' नीति तथा भूमंडलीकरण के कारण प्राकृतिक एवं आर्थिक असंतुलन की स्थिति पैदा करनेवाले पाश्चात्य और नेतृत्व विषयों पर भी उन्होंने अपने विचार रखे. तब सीरिया के राजदूत ने मजाकिया अंदाज में कहा, 'सुदर्शनजी, आप इतना स्वादिष्ट (वैचारिक) भोजन नियमित रूप से इतने सारे लोगों को कैसे बाँटते हैं ?' इस पर लोगों का मुस्कराना स्वाभाविक था.
इस परिचर्चा के बाद इराक के राजदूत सलेह मुख्तार एक बार फिर 'केशव कुंज' में आए थे. यह फरवरी का तीसरा सप्ताह था, इराक पर अमेरिका के आक्रमण से ठीक एक महीने पहले. मुख्तार और केएस सुदर्शन ने व्यक्तिगत रूप से 45 मिनट तक आपस में बातचीत की. तब तक अमेरिका इराक पर हमला करने वाला है, यह सबको पता चल गया था. इसलिए यह स्पष्ट था कि बातचीत उसी दिशा में हुई होगी. हालांकि दोनों की बातचीत का ब्योरा कभी सामने नहीं आया, लेकिन बैठक के पश्चात् जब श्याम परांडे सलेह मुख्तार को उनकी कार तक छोड़ने गए तो उन्होंने सुदर्शनजी के कक्ष की ओर देखकर कहा, 'सचमुच, बहुत ही बुद्धिमान व्यक्ति हैं सुदर्शनजी', फिर श्याम परांडे से कहने लगे, 'आज तक जितने भी लोगों से मेरी भेंट हुई, सुदर्शनजी उनमें सबसे पवित्र व्यक्ति हैं'. इराक की हार के बाद सलेह मुख्तार ने किसी दूसरे देश में आश्रय ले लिया था. ये पूरी घटना श्याम परांडे ने ‘हमारे सुदर्शन (प्रभात प्रकाशन)’ के एक लेख में लिखी है.
मुस्लिम राष्ट्रीय मंच की स्थापना
आज जहां भी मुस्लिम राष्ट्रीय मंच की चर्चा होती है, संघ की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य और संघ के वरिष्ठ प्रचारक इंद्रेश कुमार का नाम आता है. संघ के सामान्य स्वयंसेवक जो इस संगठन को पसंद नहीं करते, वो जब भी किसी विषय को लेकर पाकिस्तान या मुस्लिमों से नाराज होते हैं, तो इंद्रेश कुमार पर भी आपसी चर्चाओं में नाराजगी निकाल लेते हैं. वहीं फैज जैसे राष्ट्रीय विचारों वाले मुसलमान पदाधिकारियों की तमाम लोग टीवी चैनल्स पर संघ की विचारधारा को मजबूत करने के लिए तारीफ भी करते हैं. इसका भी श्रेय इंद्रेश कुमार को ही जाता है, लेकिन खुद इंद्रेश कुमार इसका श्रेय पूर्व सरसंघचालक केएस सुदर्शन को देते हैं.
इसकी शुरूआत तभी से हो गई थी, जब इंद्रेश कुमार जम्मू-कश्मीर व हिमाचल में संघ प्रचारक के नाते कार्य देख रहे थे, उस समय जम्मू-कश्मीर आतंक की आग में जल रहा था. लाखों कश्मीरी पंडितों ने कश्मीर घाटी को छोड़ दिया था, लेकिन इंद्रेश कुमार लगातार उन परिवारों से मिलते रहते थे, जो या तो शरणार्थी की तरह कैम्पों में रह रहे थे या फिर घाटी में ही डर के साए में जी रहे थे. समय-समय पर केएस सुदर्शन उनसे मिलते रहते थे तो बातचीत के दौरान पूछते थे कि क्या जम्मू क्षेत्र व कश्मीर घाटी में इसलाम को माननेवालों में सभी के मन-मस्तिष्क हिंदुस्तान-विरोधी व हिंसा से भरे हैं? इंद्रेश कुमार जवाब देते थे कि, “नहीं, ऐसा नहीं है. मैं तो इन भयानक एवं क्रूर घटनाओं के बीच भी इन सब मुसलिम क्षेत्रों में जाता हूँ, उनसे मिलता हूँ, साथ ही उनके घरों में बैठता हूं. मेरा अनुमान है कि अधिक संख्या अमन व भाईचारे की चाह रखनेवालों की है. परंतु सभी अपने को असहाय समझते हैं. सत्ता भी उन्हें न तो संरक्षण देती है और न ही प्रोत्साहन देती है; बल्कि सत्ता तथा मीडिया तो अलगाववादियों के साथ खड़े दिखाई देते हैं. परंतु सत्ता व मीडिया में भी ऐसे मुसलमान हैं, जो कट्टरपंथियों को पालने- पोसने के विरुद्ध हैं.” नीचे के दोनों बिदुओं को गौर से दोबारा पढ़ेंगे तो कश्मीर की असली समस्या भी सामने आ जाएगी.
सन् 1997 में के एस सुदर्शन जब सह-सरकार्यवाह थे, जम्मू व कश्मीर घाटी में दो दिन के लिए आए और दोनों ही स्थानों पर मुसलमानों की बैठकें हुईं, जिससे निकलकर आया कि तमाम मुसलमान भी आतंकी हमलों से त्रस्त हैं और भारत में ही रहना चाहते हैं. केएस सुदर्शन ऐसे मुसलमानों को लेकर सम्भावनाएं तलाश रहे थे कि कैसे उन्हें एक नए संगठन के जरिए राष्ट्रीय उद्देश्य के लिए जोड़ा जा सकता है. उनकी व्यक्तिगत रूप से भी देश भर में अनेक मुसलमान विद्वानों से वार्त्ताएं हो रही थीं.
अक्सर ऐसा होता था कि जब भी किसी बड़े फैसले की इस दिशा में चर्चा होती, इरादे बनते, कोई ना कोई ऐसा मामला हो जाता, जिससे बात पटरी से उतर जाती. या तो देश में कोई आतंकी घटना हो जाती या फिर दंगे. 2002 की फरवरी में भी गुजरात दंगों ने देश में फिर से दोनों समुदायों के बीच की खाई चौड़ी कर दी. अविश्वास चरम पर था, लेकिन केएस सुदर्शन, इंद्रेश कुमार आदि अपने इरादे तो टालने को तैयार थे, लेकिन उद्देश्य को भूलने को तैयार नहीं थे. उसी साल यानी 2002 के दिसम्बर महीने में 24 तारीख का दिन इस गिशा में ऐतिहासिक साबित हुआ. दिल्ली के चाणक्यपुरी के बापूधाम में 'ईद मिलन' कार्यक्रम में भारतीय समाज के दोनों पंथों के प्रमुख प्रतिनिधियों का बड़ी संख्या में मिलना जुलना हुआ. इस कार्यक्रम में मौलाना जमील इलियासी, मौलाना वहीदुद्दीन, पीरजादा हसन सानी निजामी (निमामुद्दीन), फतेहपुरी मसजिद के शाही इमाम हजरत मुफ्ती मुकर्रम, सरदार तिरलोचन सिंह, लालकृष्ण आडवाणी, सुषमा स्वराज, डॉ. मुरली मनोहर जोशी, बाबूराव वैद्य, वरिष्ठ प्रचारक मदनदास देवी, इंद्रेश कुमार, पत्रकार मुजफ्फर हुसैन और महिला आयोग सदस्य नफीसा बेगम आदि उपस्थित थे. उन दिनों केन्द्र में अटल बिहारी बाजपेयी की सरकार थी और आडवाणीजी उप प्रधानमंत्री व केन्द्रीय गृहमंत्री थे. जाहिर है संघ प्रमुख केएस सुदर्शन भी थे.
RSS के सौ साल से जुड़ी इस विशेष सीरीज की हर कहानी
बल्देव भाई शर्मा द्वारा सम्पादित ‘हमारे सुदर्शन’ के एक लेख में इंद्रेश कुमार बताते हैं कि, “सुदर्शनजी ने अपने भाषण में कहा कि 'इसलाम' का शाब्दिक अर्थ- 'सलामती (सुरक्षा) एवं अमन (शांति) ' है. परंतु आजकल इसलाम मजहब का चेहरा आतंकी, कट्टरता तथा बाहरवाला (विदेशी) प्रस्तुत किया जा रहा है. क्या हम इसकी कट्टरता की नकाब को उतारकर उसका अमन तथा भाईचारे का चेहरा उसे दें? मौलाना वहीदुद्दीन ने भी इस बात का समर्थन किया. समारोह के अंत में सभी ने सिवइयों के साथ-साथ अन्य स्वादिष्ट व्यंजनों का स्वाद चखा. यहाँ से अनेक मुसलमानों ने इस कठिन, परंतु बहुत आवश्यक एवं महत्त्वपूर्ण काम को करने का बीड़ा उठाया. समय- समय पर इस आंदोलन के नाम 'माई हिंदुस्थान', 'राष्ट्रीय मुसलिम आंदोलन' रहे. अब पाँच-छह वर्ष से इस आंदोलन का नामकरण पक्का हो गया- 'मुसलिम राष्ट्रीय मंच, एक नई राह'. यह नाम सुदर्शनजी की उपस्थिति में ही इस संस्था के मुसलमानों ने रखा. चूँकि मैं मुसलमानों के बीच राष्ट्रीयता की अलख जगाने का प्रयत्न कर ही रहा था, मेरे मसजिद व दरगाह व सभागारों में अनेक बार मुसलमान बंधुओं से वार्त्ता के लिए दौरे हुए। इसलिए मुझे यह दायित्व दिया गया कि संगठन खड़ा करवाने, कार्यक्रम व कार्यकर्ता तैयार करने में मंच के कार्यकर्ताओं को मैं सहयोग करूं. समय-समय पर अनेक विचारों तथा विषयों के विमर्श के दौरान राष्ट्रीयता एवं सही दृष्टिकोण स्पष्ट करते हुए मैं इस आंदोलन का हिस्सा बन गया”.
धीरे धीरे इंद्रेश कुमार के प्रयासों से मुस्लिम राष्ट्रीय मंच का काम अन्य राज्यों में भी बढ़ने लगा. लेकिन उसकी गति भी इतना ज्यादा थी कि 30-31 अगस्त, 2003 को विश्व युवा केंद्र, दिल्ली में प्रथम अखिल भारतीय कार्यकर्ता सम्मेलन बुलाया गया, तो उसमें 14-15 प्रांतों से 250 से अधिक प्रतिनिधि उपस्थित थे. इस सम्मेलन में दो प्रस्ताव पारित किए गए. पहला प्रस्ताव था कि आतंक व आतंकवादी का कोई मजहब नहीं होता. दूसरा जेहाद को आतंकवाद का पर्याय बताना सरासर गलत है. आतंकवाद का इसलाम मजहब से कोई संबंध नहीं. क्लीयर शरीफ (रुड़की) के मौलाना छोटे मियाँ प्रतिनिधि के रूप में उपस्थित थे.
मुस्लिम महिलाओं के सम्मेलन की भी शुरूआत, 13 प्रांतों से आईं
अप्रैल 2004 में विश्व युवा केंद्र, नई दिल्ली में मुसलिम महिलाओं का प्रथम अखिल भारतीय सम्मेलन संपन्न हुआ. केएस सुदर्शन इंद्रेश कुमार के मार्गदर्शन और हौसला बढ़ाने के लिए हर कदम पर साथ थे, दोनों दिन सम्मेलन में दिन भर रहे. उन्होंने इस सम्मेलन में अपने विचार रखे, साथ ही मुसलिम महिलाओं के द्वारा व्यक्त विचार एवं उनकी वर्तमान स्थिति कैसी है, इस बात को भी सुना, समझा व जाना. उन्होंने अनेक बातें इस सम्मेलन में कहीं. उसे सार रूप में कहना हो तो-किसी भी परिवार व समाज के शिक्षित होने तथा सभ्य होने की नींव बेटी, बहन तथा माँ के द्वारा ही रखी जाती है. जिस समाज में बेटी शिक्षित, सुरक्षित व संस्कारित होती है, वह समाज सदैव उन्नति करता है. इसलिए सभी को अपने-अपने समाज की बेटियों को शिक्षित, स्वस्थ एवं संस्कारित करना चाहिए. इस सम्मेलन में 13 प्रांतों से 300 के लगभग महिलाओं ने भाग लिया, जिसमें वकील, प्राध्यापक, अध्यापक, छात्रा व समाज-सेवी महिलाओं की संख्या अधिक मात्रा में थी.
जब देश भर के मुस्लिमों ने मनाया ‘सलाम 1857’
सन् 1857 की महान् जनक्रांति की 150वीं वर्षगांठ का समय आया तो संघ प्रमुख सुदर्शनने मुसलिम राष्ट्रीय मंच के कार्यकर्ताओं के बीच अत्यंत वेदना-युक्त, परंतु चुनौतीपूर्ण शब्दों में कहा कि शहीदों के जीवन को शिक्षा के पाठ्यक्रम से हटाया जा रहा है, जो किसी भी देश के लिए अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है. इसलिए मंच के कार्यकर्ताओं ने निर्णय लिया कि वर्ष 2007-2008 में 1857 के स्वतंत्रता संग्राम की 150वीं वर्षगाँठ को 'सलाम 1857' के रूप में मनाएंगे. 10 मई, 2007 को मावलंकर हॉल, दिल्ली में जाति, पंथ, भाषा से ऊपर उठकर 'सलाम 1857' के उद्घाटन का कार्यक्रम संपन्न हुआ. हॉल खचाखच भरा था.
उसके उद्घाटन कार्यक्रम में पूजनीय के एस सुदर्शन ने कहा, 'हमारे देश ने 2 करोड़, 72 लाख शहादतें देकर यह स्वतंत्रता प्राप्त की है. ये कुर्बानियाँ राष्ट्रधर्म के पालन के सर्वोत्तम उदाहरण हैं. जिन्होंने देश की स्वतंत्रता के लिए जान दी, वे सभी हमारे अपने हैं. जो कौम अपने शहीदों को भूल जाती है, उस कौम का अस्तित्व खतरे में पड़ जाता है. शहीद तो कौम का गीत तथा गौरव होता है.' देश भर में 100 से अधिक कार्यक्रम हुए. नागपुर में भी 2 जुलाई, 2007 को अनेक मुसलिम संगठनों ने मुसलिम मंच के तहत 'एक शाम, शहीदों के नाम' कार्यक्रम का आयोजन किया था। नागपुर विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. एस.एन. पठान इस कार्यक्रम के मुख्य अतिथि थे. दिलचस्प बात थी कि संघ प्रमुख सुदर्शन इस कार्यक्रम में समय पूर्व दर्शकों में उपस्थित थे. हजारों-लाखों मुसलमान इसमें सहभागी हुए थे. मेरठ में अखिल भारतीय सम्मेलन के साथ 'सलाम 1657' संपन्न हुआ. उससे प्रेरणा लेकर मंच ने स्थायी रूप से एक नई पहल की शुरुआत की कि शब्बे रात में कब्रों में जाकर जब अपने बुजुर्गों के लिए मालिक से दुआ करेंगे, तब इन सभी शहीदों के लिए भी दुआ करेंगे. अब मुसलिम समाज में मंच का यह स्थायी कार्यक्रम बनने लगा है.
लाल किला टू लाल चौक
लाल किला हो या लाल चौक, मुस्लिमों में ये दोनों ही स्थान चर्चा का विषय रहे हैं. लेकिन किसी को नहीं पता था कि मुस्लिम राष्ट्रीय मंच इन दोनों को जोड़कर कोई अभियान भी शुरू कर सकती है. जम्मू व कश्मीर की गंदी राजनीति के कारण जब अमरनाथ यात्रीगण असुविधाओं के शिकार हो रहे थे, उस समय 7 अगस्त, 2009 को मुसलिम राष्ट्रीय मंच की ओर से 'लाल किले (दिल्ली) से लाल चौक (श्रीनगर) ' यानी 'हजरत निजामुद्दीन से हजरत बल' तक की यात्रा का आगाज किया. अमन व वतन से मोहब्बत का पैगाम लेकर इस यात्रा को के एस सुदर्शन ने झंडी दिखाई. जबकि वे मार्च में ही सरसंघचालक पद का दायित्व मोहन भागवत को सौंप चुके थे. 10 अगस्त, 2009 को लगभग 172 यात्रियों ने लखनपुर बॉर्डर पर दस्तक दी. सरकार ने यात्रा रोक दी।.फिर भी अलगावादियों की धमकी के बावजूद मो. अफजल, औरंजे, अब्बू बकर नकवी, सीराज कुरैशी, इमरान चौधरी, मधु बहन आदि 20 यात्री श्रीनगर पहुँच गए. जम्मू व कश्मीर के प्रशासनिक अधिकारियों का कहना था, 'अगर देश के मुसलमानों की यह भावना मुखर हो उठे तो हिंदुस्थान फिर से बुलंदियों पर पहुँच सकता है.' के एस सुदर्शन फोन पर प्रतिदिन उन यात्रियों की पूरी-पूरी जानकारी लेते थे. सफलता पर उन्होंने सभी की पीठ थपथपाई और कहा, 'अब भारत में 'बांटो और राज करो' नहीं, बल्कि 'जोड़ो और राज करो' की आवाज बुलंद होगी.
राम मंदिर पर भी मुसलिम समाज से चर्चा हुई
केएस सुदर्शन अयोध्या के विषय पर मुलिम विद्वानों, इमामों से चर्चा करना चाहते थे. सन् 2009 में मौलाना जमील इलियासी, विष्णु हरि डालमिया व सुदर्शनजी की उपस्थिति में देश भर से लगभग 200 मौलाना व इमाम दिल्ली में एक साथ आए. इंद्रेश कुमार भी उपस्थित थे. निर्णय हुआ कि अयोध्या को, हमारे पूर्वजों के नबी को उसका अधिकार मिलना चाहिए. सच्चाई को जानने व मानने से ही रास्ता निकलेगा. इसके लिए अपने-अपने स्तर पर चर्चा प्रारंभ करें. न्यायपालिका के निर्णय के पश्चात् पुनः मिलने का विचार था, परंतु केएस सुदर्शन के रहते वो नहीं हो पाया था. इंद्रेश कुमार बताते हैं कि, “लखनऊ में मौलाना हामिद उल हसन और मौलाना कल्बे सादिक के साथ पूजनीय सुदर्शनजी ने देश की चुनाव प्रक्रिया को लेकर चर्चा की थी और प्रेस वार्त्ता में देश की चुनाव प्रक्रिया में सुधार होना चाहिए, ऐसा आग्रहपूर्वक कहा था. मौलाना कल्बे सादिक उस प्रेस वार्त्ता में उनके साथ थे”. एक बार नमाज का वक्त हो जाने पर सुदर्शन जी से मिलने गए हुए कुछ मुस्लिम नेताओं के लिए स्वयं सुदर्शन जी ने नागपुर कार्यालय में ही नमाज पढ़ने की व्यवस्था की थी.
26/11 मुंबई हमले के बाद निकाली तिरंगा यात्रा
हमले के पश्चात् मंच ने देश भर के मुसलमानों को 'मुंबई चलो' का आह्वान करते हुए केएस सुदर्शन की प्रेरणा से बने मुसलिम राष्ट्रीय मंच ने 'तिरंगा यात्रा' निकाली. 'देश में भारतीय निर्दोष मरें नहीं, आतंकी व विदेशी हत्यारे देश में पलें नहीं'-इन उद्घोषों के साथ हजारों मुसलमान मुंबई के चौपाटी पर ताज होटल के सामने तिरंगा हाथ में लेकर खड़े हुए तथा उन सभी ने 'हत्यारों को फाँसी दो' की आवाज बुलंद की. मुसलमान इस देश में विदेशी नहीं, मतांतरित हैं तथा वे अल्पसंख्य नहीं हैं, बल्कि उनके पूर्वज भी इसी देश के वासी थे-इसकी व्यापक व स्पष्ट परिभाषा ने मुसलमानों को सौतेले व्यवहार से मुक्ति का मार्ग दिखाया. केएस सुदर्शन तो नहीं रहे लेकिन उनकी मृत्यु के 1 साल बाद इंद्रेश कुमार ने उनके विचार पर एक नया राष्ट्रवादी कार्यक्रम शुरू किया. 'हम हिंदुस्तानी, कश्मीर हिंदुस्तान का' के संकल्प के साथ एक राष्ट्रवादी कार्यक्रम को वर्ष 2010 में प्रारंभ किया, 'कश्मीर की आवाज'. जिसके नाम पर सैकड़ों मुसलमान, जोकि कश्मीर घाटी से थे, दिल्ली आए और उन्होंने 16-17 देशों के राजनयिकों व ठसाठस भरे मावलंकर सभागार में स्पष्ट किया कि कश्मीरी शांति चाहता है. वह रक्त की प्रत्येक बूँद से भारतीय (हिंदुस्तानी) है. इंद्रेश कुमार बताते हैं कि, “26-27 जुलाई, 2012 को पुष्कर में राष्ट्रीय परिषद् की अखिल भारतीय बैठक सुदर्शनजी ने अनेक बातें कहीं, जिसमें उन्होंने कहा कि हमारा भारत में जन्म लेना सौभाग्य की बात है. पड़ोसियों के कब्जे में चले गए भू-भाग को खाली करवाना है. अब देश को मजहब के नाम पर बँटने नहीं देना है.” पुष्कर में राष्ट्रीय परिषद् के समापन कार्यक्रम पर अजमेर शरीफ के गद्दीनशीन पीरजादा उपस्थित रहे. तब किसी को कहां पता था कि केएस सुदर्शन के साथ उनका ये कार्यक्रम आखिरी बार हो रहा है. 15 सितम्बर 2013 को केएस सुदर्शन गोलोक चले गए.
जमीयत उलेमा के मौलाना ने बताया केएस सुदर्शन संग क्या क्या बातें हुईं
ये बातचीत इंटरकॉन्टीनेंटल में हुई थी, जिसमें संघ प्रमुख केएस सुदर्शन के साथ विष्ण हरि डालमिया, राम माधव आदि व जमीयत उलेमाए हिंद की ओर से मौलाना महमूद मदनी, मौलाना नियाज़ अहमद फारूकी और मौलाना अब्दुल हमीद नोमानी उपस्थित थे. के एस सुदर्शन की मौत के बाद मौलाना अब्दुल हमीद नोमानी ने 1 नवम्बर 2012 को एक लेख में बताया कि, “सुदर्शन की बातों और सवालात से स्पष्ट हुआ कि उनका इस्लाम और मुसलमानों के इतिहास के बारे में अच्छा खासा अध्ययन है. उन्होंने सबसे पहले ये सवाल उठाया कि हिंदू मुस्लिम एकता और करीब होने में कई रुकावटें हैं. प्रथम तो ये कि मुसलमान ही हम हिन्दुओं को इस्लामी शरीयत के मुताबिक किस श्रेणी में रखते हैं. उन्होंने मौलाना सैय्यद सुलेमान नदवी रहिमतुल्लाह अलैहि की किताब 'अरब व हिंद ताल्लुक़ात और सीरतुन नबी' और अन्य हवाले से कहा कि इस्लामी शरीयत के मुताबिक इंसान चार श्रेणियों में विभाजित हैं- मोमिन, काफ़िर, अहले किताब, शुबह अहले किताब.“ वे आगे लिखते हैं, “अब सवाल ये है कि हिंदू को किस श्रेणी में आप हज़रात रखते हैं, इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि के. एस. सुदर्शन के अध्ययन की दिशा क्या थी. अगर किताब और सुन्नत, फ़िक़्ह इस्लामी, इस्लामी इतिहास और हिन्दुस्तानी मुसलमानों की तारीख से संबंधित आवश्यक अध्ययन न हो तो केवल अखबार पढ़कर और सुनी सुनाई और चलते फिरते काम चलाऊ अध्ययन से सुदर्शन जैसे लोगों को जवाब देना और फिर संतुष्ट करना आसान नहीं है.”
मौलाना ने अपने लेख में केएस सुदर्शन से एक और मुलाकात के बारे में लिखा था कि, “सुदर्शनजी से दो बार सीधे तौर पर और हुई थीं. एक बार इंडिया हैबिटेट सेंटर में, मुत्तेहेदा क़ौमियत और इस्लाम के अंग्रेजी अनुवाद के विमोचन के अवसर पर, और दूसरी बार बहुत दिनों बाद शोभित युनिवर्सिटी, मेरठ के पुरस्कार वितरण और कंवोकेशन कार्यक्रम में. पत्रकार बिरादरी के कई दोस्त साथ थे, हम लोग खाना खा कर चाय कॉफी के लिए उठे तो सुदर्शन जी खाना खा रहे थे, उन्होंने दूर से देखकर पहचान लिया और अपने पास एक साहब को भेज कर बुलवाया और बहुत सम्मान से पास में ही बिठायॉ.
खाते हुए उन्होंने कहा कि मुसलमानों को ये सोचना चाहिए कि इस्लाम एक नैतिक और आध्यात्मिक जीवन प्रणाली है. इसका सत्ता से प्रत्यक्ष रूप से कोई अधिक लेना देना नहीं है. हज़रत के समय में ऐसा ही था. बाद में (सुदर्शन जी आनहज़रत सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम का ज़िक्र 'हज़रत' से करते थे) सत्ता और विरासत के विवाद ने उसकी तस्वीर धुंधली कर दी और मुसलमान सत्ता के हो के रह गए, और उसी को ओढ़ना बिछौना बना लिया और इस्लामी, आध्यात्मिक और नैतिक पहलू गायब हो गया. यह मुगल युग तक जारी रहा. उन्हें ये मानना चाहिए कि भारत के अधिकांश मुसलमान यहीं के हैं, बाहर से नहीं आए हैं, उन्हें राम, कृष्ण को अपना पूर्वज स्वीकार करना चाहिए, यदि ऐसा हो जाए तो हिंदू मुस्लिम दोनों के करीब आने की राह में कोई रुकावट नहीं होगी,”
केएस सुदर्शन को लेकर मौलाना नोमानी ने एक और दिलचस्प घटना इस लेख में लिखी थी, “अगस्त 2012 ई. में भोपाल से ये खबर आई कि वो वहां की ताजुल मसाजिद की तरफ नमाज़ अदा करने के लिए चल पड़े. वो मुस्लिम भाइयों को ईद की मुबारकबाद देना चाहते थे. लेकिन उनके स्टाफ और सुरक्षा कर्मचारियों ने यातायात और नमाज़ हो जाने की सूचना देकर वहां जाने से रोका. बाद में मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल गौड़ अपने जानने वाले एक मुस्लिम के घर ले गए, जहां सुदर्शन जी ने सेवईंयाँ खाईं और मुस्लिम भाइयों को बधाई दी”.
हालांकि उन्होंने उन्होंने भारतीय ईसाइयों को वेटिकन के प्रभाव से मुक्त करने और एक राष्ट्रीय और स्वदेसी चर्च बनाने का सुझाव भी दिया, जिससे बड़ा विवाद हुआ था. लेकिन जिस तरह से आज मुस्लिम राष्ट्रीय मंच से इतने मुस्लिम जुड़ते जा रहे हैं, हो सकता है वे ईसाइयों के बीच भी ऐसा कोई संगठन खड़ा करने में कामयाब हो गए होते. लेकिन उनकी खुद की जिंदगी के तार टूट गया तो ये मिशन भी अधूरा रह गया.
पिछली कहानी: सरस्वती ताई आप्टे के बिना राष्ट्र सेविका समिति की कहानी अधूरी है