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संघ के 100 साल: 'RSS जैसी खतरनाक संस्था से संबंध न रखें...', जब शास्त्रीजी ने रज्जू भैया के बारे में कहा

रज्जू भैया के पिताजी ने शास्त्री जी से कहा कि मेरा बड़ा पुत्र राजेंद्र विश्वविद्यालय में साइंस पढ़ाता है, वह आरएसएस का कार्यकर्ता है और नैनी जेल में है. रज्जू भैया ने अपने संस्मरणों में लिखा है कि, “शास्त्रीजी ने छूटते ही कहा, आप उसको समझाइए कुंवर साहब कि वह आरएसएस जैसी खतरनाक संस्था के साथ अपना संबंध न रखे.’ RSS के 100 सालों के सफर की 100 कहानियों की कड़ी में आज पेश है यही कहानी.

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शास्त्रीजी और लोहियाजी ने चुनावों में ली थी रज्जू भैया से मदद. (Photo: AI generated)
शास्त्रीजी और लोहियाजी ने चुनावों में ली थी रज्जू भैया से मदद. (Photo: AI generated)

देश के चुनावी इतिहास में संघ के पुराने स्वयंसेवकों के ऐसे ऐसे वाकए दर्ज हैं, जिन्हें जानकर आज की कांग्रेस और संघ-भाजपा की पीढ़ियां हैरत में पड़ सकती हैं. मजदूर संघ के संस्थापक दत्तोपंत हेगड़ी तो डॉ अम्बेडकर के चुनावी एजेंट थे, लेकिन ये बात डॉ अम्बेडकर के उन अनुयायियों को बुरी लग सकती है, जो संघ को कतई पसंद नहीं करते. उसी तरह शास्त्रीजी जैसे कांग्रेसी दिग्गज और लोहियाजी जैसे समाजवाद के प्रेरणा पुरुष को कभी संघ के चौथे सरसंघचालक रज्जू भैया की सहायता की जरूरत पड़ी होगी, आज की कांग्रेस और सपा की पीढ़ी को इस पर शायद ही यकीन आए. लेकिन ऐसा हुआ था, बल्कि शास्त्रीजी तो रज्जू भैया से संघ की कार्यपद्धति के बारे में पूछताछ करते रहते थे और उनके किसी कार्यक्रम में भी आना चाहते थे.

ये तब की बात है जब देश आजाद नहीं हुआ था. रज्जू भैया पढ़ाई के लिए प्रयाग में थे. कांग्रेस के वरिष्ठ नेता जो आजादी के बाद कांग्रेस अध्यक्ष भी बने थे, उनके बेटे दयासागर रज्जू भैया के सहपाठी थे. दोनों की मित्रता भी हो गई, ऐसे में उनके घर भी आना जाना शुरू हो गया. पुरुषोत्तम दास टंडन को बाबूजी कहा करते थे. टंडनजी वैसे ही हिंदी के पैरोकार थे, गोहत्या के मामले में भी संघ के साथ थे. जब रज्जू भैया इलाहाबाद यूनीवर्सिटी में पढ़ाने लगे तो भी उनका टंडनजी के घर जाना कम नहीं हुआ, बल्कि अब तो वो खासतौर पर विभिन्न विषयों पर चर्चा करने के लिए जाने लगे थे.

टंडनजी के ही घर शास्त्रीजी की भी आना जाना था. वे और टंडनजी सर्वेन्ट्स ऑफ इंडिया सोसायटी के कार्यकर्ता भी थे. सो ऐसे कई मौके आए कि शास्त्री से रज्जू भैया का वहीं मिलना जुलना हुआ. शास्त्रीजी स्वभाव से बेहद विनम्र व्यवहार वाले व्यक्ति थे. सन 1945-46 में भारत छोड़ों आंदोलन में अरसे से बंद नेताओं ने बाहर आना शुरू कर दिया. चुनाव की तैयारियां होने लगीं, राजनैतिक गतिविधियां बढ़ गईं. लाल बहादुर शास्त्री प्रयाग जिले की एक सीट से ही कांग्रेस की तरफ से विधानसभा उम्मीदवार थे. सो उनकी भी व्यस्तता बढ़ गई और साथ ही लोगों से काम भी पड़ने लगे.
 
‘ये प्रचारक अच्छा गाता है, इसको मुझे दे दो’

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एक दिन वो अचानक रज्जू भैया को टंडनजी के घर पर मिले और मानो उनका ही इंतजार कर रहे थे. देखते ही बोले, भई तुम्हारा जो प्रचारक है, हमारे क्षेत्र में राजनारायण, वह बहुत अच्छा गाता है. उसको देशभक्ति के बहुत गीत याद हैं. दरअसल शास्त्रीजी को कांग्रेस के कई कार्यकर्ताओं ने बताया था कि राजनारायण सभा को बांधकर रख सकता है. दरअसल शास्त्रीजी भी आज के देसी नेताओं की तरह परेशान थे, कि भीड़ को कार्यक्रम तक कैसे रोके रखा जाए लेकिन शास्त्रीजी उनकी तरह नाचने लाने वालियां तो अपनी मंच पर ला नहीं सकते थे. इसलिए उन्होंने राजनारायण की तारीफ सुनकर उससे काम लेने का सोचा. शास्त्रीजी ने रज्जू भैया से कहा कि, “हमारे यहां कांग्रेस में गीत वीत गाने की, अच्छे स्वर में गाने की ऐसी कोई पद्धति नहीं हैं”.
 
शास्त्रीजी ने आगे मुद्दे की बात पर आने को कहा कि, “हमें सभा तक पहुँचते-पहुँचते कुछ देर हो जाती है इसलिए क्यों न तुम एक महीने के लिए इस राजनारायण को हमको दे दो. हमारी सभाओं में पहले गीत गाकर एक अच्छे वातावरण का निर्माण करेगा. मैंने कहा अवश्य, मैं चाहता हूँ आप अपने क्षेत्र से अच्छे मतों से जीतें और यदि राजनारायण किसी रूप में आपके लिए उपयोगी सिद्ध होता है तो उसे आपके क्षेत्र में भेज देंगे. यूं तब तक कांग्रेस और संघ में कोई भारी मतभेद उभरकर सामने नहीं आए थे. उनसे दोबारा संपर्क हुआ जब संघ के सारे नेता गांधी हत्या के सिलसिले में जेलों में बंद थे और शास्त्रीजी लखनऊ में गृहमंत्री थे.
 
‘आरएसएस जैसी खतरनाक संस्था से सम्बन्ध ना रखे’

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साधारणत: रज्जू भैया से मिलने के लिए हर महीने उनकी माताजी आती थीं, पर एक बार माताजी ने पिताजी से कहा कि आप भी समय निकालकर उससे एक बार मिल लीजिए. जिस गाड़ी से उनके पिताजी इलाहाबाद जा रहे थे उसी गाड़ी से शास्त्रीजी भी इलाहाबाद जा रहे थे. शास्त्रीजी ने जब पूछा कि आप इलाहाबाद क्यों जा रहे हैं? तो उनके पिताजी ने बता दिया कि मेरा बड़ा पुत्र राजेंद्र विश्वविद्यालय में साइंस पढ़ाता है, वह आरएसएस. का कार्यकर्ता है और नैनी जेल में है. रज्जू भैया ने अपने संस्मरणों में लिखा है कि, “शास्त्रीजी ने छूटते ही कहा, ‘आप उसको समझाइए कुंवर साहब कि वह आरएसएस जैसी खतरनाक संस्था के साथ अपना संबंध न रखे.’, तब रज्जू भैया के पिताजी ने यह कहा कि मैं आरएसएस को तो नहीं जानता, परंतु अपने लड़के को अच्छी तरह से जानता हूं. अगर वह आरएसएस में है तो आरएसएस अच्छी संस्था होगी, बुरी संस्था नहीं हो सकती. शास्त्रीजी ने इस पर कहा, ‘फिर आप ऐसा कीजिए कि उससे कह दीजिए कि वह मुझे आरएसएस के विषय में जानकारी देने वाला एक पत्र लिखे’, पिताजी ने भेंट के बाद जब मुझे ये सारी बात बताई तो फिर हम तीन-चार लोगों ने मिलकर आरएसएस के विषय में एक विवरण शास्त्रीजी के पास लिखकर भेजा”. शास्त्रीजी ने बाद में उस पत्र के आधार पर रज्जू भैया को मिलने के लिए लखनऊ बुलाया. बाद में जब वे दो साल के लिए लखनऊ में प्रचारक रहे तो प्रांत प्रचारक भाऊराव देवरस ने उनसे कहा कि लखनऊ में शास्त्रीजी से मिलने का क्रम बनाए रखना और कई प्रकार की जो गलतफहमियाँ या भ्रम उनके मन में होंगी उनको दूर करते रहना.
 
जब शास्त्रीजी ने मांगी संघ के अंदर की जानकारी

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रज्जू भैया ने लिखा है कि, “मैं शास्त्रीजी से बीच-बीच में मिलता रहता था और थोड़ी सी हँसी-मजाक भी चलती रहती थी. शास्त्रीजी कहते थे, ‘तुम्हारी ये बैठकें बहुत होती हैं। इन बैठकों में क्या करते हो तुम?’ मैंने कहा, "कितने नए स्वयंसेवक आए, क्या-क्या विशेष कार्यक्रम हुए, आगे कौन से कार्यक्रम आने वाले हैं? उसमें किस विशेष व्यक्ति को लाने वाले है- इन बातों पर हम लोग चर्चा करते हैं." तो शास्त्रीजी हँसते-हँसते बोले कि इसकी चर्चा नहीं करते हो कि कहाँ मुसलमान कितनी संख्या में रहते हैं, कहाँ उनकी कितनी झोंपड़ियाँ हैं, कहाँ वे गड़बड़ी कर सकते हैं? उनके विषय में कोई योजना नहीं बनाते हो? तब रज्जू भैया ने उनसे कहा कि, “आप गटनायक से लेकर प्रचारक तक की जब चाहे जिस बैठक में चाहें, हम आपका स्वागत करेंगे. परंतु उन्होंने हंसकर टाल दिया और कहा, "उस समय तुम इशारा कर दोगे तो चर्चा का विषय ही बदल जाएगा."

इसी बीच एक बार गुरु गोलवलकर लखनऊ पधारे. रज्जू भैया शास्त्रीजी के पास गए और कहा, "हम लोगों ने बाहर के लोगों के लिए एक कार्यक्रम रखा है, उसमें गुरुजी रहेंगे और प्रश्नों का उत्तर भी देंगे. आप अगर इस कार्यक्रम में चलें तो बहुत अच्छा रहेगा" . तब उन्होंने अपने हृदय की बात कही, "तुम मेरे साथ कहीं भी घूम सकते हो, तुम्हारे लोगों के मन में इतना विश्वास है उनमें से कोई भी इसके कारण से तुम पर आरोप नहीं लगाएगा कि तुम कांग्रेसी हो गए। परंतु अगर मैं तुम्हारी मीटिंग में चला गया तो मेरे ऊपर एक  ठप्पा लग जाएगा कि लालबहादुर शास्त्री आरएसएस के दृष्टिकोण का व्यक्ति है, हममें और तुममें यही विशेष अंतर है." मैंने आश्चर्य से पूछा, "क्या आप जैसा पुराना कार्यकर्ता इतना विश्वसनीय नहीं है कि वह कांग्रेस के सिद्धांतों और विचारों के विरुद्ध कुछ भी नहीं करेगा। और आप तो गृहमंत्री हैं आपका तो कार्य ही है सब चीजों को सही रूप में जानना."

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 इस पर शास्त्रीजी ने जो नकारात्मक उत्तर दिया और रज्जू भैया को समझा दिया कि राजनीतिक दलों के अंदर कितना अविश्वास रहता है, गुरु गोलवलकर से वे उस समय तो नहीं मिल सके, परंतु उनकी यह इच्छा बाद में उस समय पूर्ण हुई जिस समय उनके प्रधानमंत्रित्व काल में पाकिस्तान ने भारत पर आक्रमण किया. उस समय शास्त्रीजी ने देश के राजनैतिक नेताओं के साथ-साथ गुरु गोलवलकर को भी बुलाया, दिल्ली में हुई सर्वदलीय बैठक में गुरु गोलवलकर भी थे. गुरु गोलवलकर ने उन्हें पूरा सहयोग करने की बात की, कई तरह के शिविर लगाने, ट्रैफिक व्यवस्था संभालने, प्रशिक्षण आदि देने में स्वयंसेवकों की फौज देने का वायदा किया और शास्त्रीजी को ये भी सलाह दी कि आपको सेना को,  दुश्मन क्षेत्र में भी आक्रमण करने की अनुमति देनी चाहिए. यह सुनकर उस समय तो शास्त्रीजी चुप रहे, परंतु जिस समय सब नेता जाने लगे तो पीछे से उन्होंने एक वाक्य कहा कि जैसा तुम सोचते हो वैसी अनुमति मैंने अपनी सेना के अधिकारियों को दे दी है. वो जिंदा रहते तो वाकई में संघ और कांग्रेस के रिश्ते कुछ अलग ही स्तर पर होते.
 
लोहियाजी को भी मिली 60 शाखाओं की मदद

रज्जू भैया की कर्मस्थली इलाहाबाद (प्रयाग) जगह ही ऐसी थी कि चुनावों के वक्त कुछ ज्यादा ही चर्चा में रहती थी. पास में फूलपुर से पंडित नेहरू चुनाव लड़ते थे, सो देश भर के दिग्गज उन्हें हराने के लिए वहां से चुनाव लड़ना चाहते थे, कुछ ने लड़े भी. वैसे ही जैसे प्रधानमंत्री मोदी के वाराणसी से 2014 के चुनाव में हुआ था. इसी तरह राम मनोहर लोहिया भी आए. रज्जू भैया का उनसे पहला सम्पर्क तब जब वे प्रयाग में सन् 1962 के चुनाव के समय ब्रह्मचारीजी से यह अनुरोध करने के लिए आए कि वे पुन: नेहरूजी के खिलाफ लड़ें. ब्रह्मचारीजी ने उनको समझाया कि सन् 1952 की बात थी, उस समय गौहत्या का एक बड़ा प्रश्न था और हिंदू कोड बिल का दूसरा प्रश्न था जो हम लोगों के लिए बड़े महत्त्व के प्रश्न हैं. उन पर मैं उनके विरुद्ध लड़ा था. अब तो बहुत सी अन्य नीतियाँ हैं, अन्य विषय हैं, जो आप ही लोग सामने ला सकते हैं इसलिए मेरा सुझाव है कि तुम यहां से लड़ो.

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लोहियाजी थोड़ा हैरान थे और ब्रह्मचारी जी ने कहा, “आपको जो भी सीट आपके अनुयायी देंगे, अच्छी सीट तो देंगे नहीं. कहीं से भी आपको हारना ही पड़ेगा तो नेहरूजी के सामने हार कर लोगों के सामने क्यों न रखें कि ये लोहियाजी नेहरूजी को टक्कर देने वाले व्यक्ति हैं" परंतु लोहिया ने कहा, “हमारा काम तो इस जिले में, इस निर्वाचन क्षेत्र में बहुत कम है। और जहाँ इतना कम काम होता है वहां तो हम लड़ते नहीं हैं," तो ब्रह्मचारीजी ने कहा, यहां पर एक राजेंद्र यूनिवर्सिटी में पढ़ाता है, संघ का काम करता है. आप उससे मिलिए. मैं उसको सूचना दे दूंगा, वह आपसे आकर मिलेगा, वह आपको इस कार्य में क्या मदद कर सकता है इसकी जानकारी देगा," रज्जू भैया को ब्रह्मचारीजी ने संदेशा भिजवाया कि लोहियाजी भी सिविल लाइंस में ही टिके हुए हैं, उनसे जाकर मिलिए. ऐसे दोनों की पहली भेंट हुई.

उस पहली मुलाकात में रज्जू भैया ने उस चुनाव की पूरी जानकारी दी कि किस प्रकार ब्रह्मचारीजी का चुनाव लड़ा गया था, क्या क्या मुद्दे थे, कैसे-कैसे मत मिले-सारी बातों के विषय में दोनों ने आपस में काफी देर तक चर्चा की और फिर राम मनोहर लोहियाने कहा कि, "तब की तुलना में नेहरूजी अब तो बहुत कमजोर हो गए हैं. अब तो उतने लोग भी उनका साथ देने के लिए तैयार नहीं हैं. इसलिए आपकी अच्छी टक्कर हो सकती है." उन्होंने हँसते हुए पूछा, "हमारी तो इस सारे क्षेत्र में दो-तीन कमेटी भी नहीं हैं और जनसंघ जिनसे थोड़ी सी कभी कभी बात चलती है, उसका भी यहाँ कोई विशेष काम नहीं है. तो ऐसी अवस्था में यहाँ काम कौन करेगा?"

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रज्जू भैया ने कहा कि आप चिंता न करें. हम लोगों की लगभग ६० शाखाएं हैं, जो सारे क्षेत्र में चलती हैं. यह ठीक है कि शाखाओं में बाल, किशोर, तरुण सब प्रकार के लोग आते हैं, खेलते हैं, कूदते हैं, अलग-अलग शारीरिक कार्यक्रम और बौद्धिक कार्यक्रम में भाग लेते हैं। उनका भी मनोमस्तिष्क बनता है और इसलिए हर गाँव में दो-तीन ऐसे लोग हैं. आस- पास के गाँवों में कम--से-कम ६० स्थानों पर अच्छे लोगों से अपना संपर्क है, उनके इस संपर्क का लाभ उठाया जा सकता है. यदि आप खड़े हुए तो उन्हें काम करने में कोई कठिनाई नहीं होगी, क्योंकि अच्छे व्यक्ति को जिताना और अच्छे व्यक्ति को आगे बढ़ाना—यही हम सबका काम है." इससे तो लोहियाजी काफी खुश हो गए. कहने लगे ६० जगह अगर काम है, तुम्हारे केंद्र हैं तो ठीक है. लोहियाजी नेहरू के खिलाफ चुनाव लड़े अच्छी टक्कर दी. नेहरू ने कइयों की जमानत जब्त करवा दी, लेकिन उनकी भी जमानत जब्त कराने में पंडितजी असमर्थ रहे.

पिछली कहानी: ​विस्तारवादी चीन, तिब्बत की चिंता और गोलवलकर की टीस!

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