scorecardresearch
 

Mobile number location tracing: मोबाइल नंबर से पता चल सकती है आपकी लोकेशन? Google पर दिखने वाले दावों का पूरा सच

आम तौर पर लोग गूगल पर किसी नंबर की लोकेशन ट्रेस करने के लिए सर्च करते हैं. लेकिन एक सर्च की वजह से ही स्कैम हो सकता है. कई ऐसी वेबसाइट्स मौजूद हैं जो दावा करती हैं कि एक क्लिक में किसी की लोकेशन ट्रेस हो जाएगी. क्या ये मुमकिन है? आइए जानते हैं क्या है सच्चाई.

Advertisement
X
क्या मोबाइल नबंर से लोकेशन ट्रैक हो सकती है
क्या मोबाइल नबंर से लोकेशन ट्रैक हो सकती है

गर आपने कभी Google पर Track location by mobile number या Live location tracker सर्च किया है? आम तौर पर लोगों को लगता है कि मोबाइल नंबर से लोकेशन ट्रेसिंग हो सकती है. लेकिन ऐस मुमकिन है? 

दरअसल ऐसी क्वेरी गूगल पर सर्च करने पर कई वेबसाइट और ऐप देखे होंगे जो दावा करते हैं कि सिर्फ मोबाइल नंबर डालिए और सामने वाले की लाइव लोकेशन आपके सामने आ जाएगी. कुछ वेबसाइट तो मैप भी दिखाने लगती हैं, जबकि कुछ पैसे मांगती हैं या ऐप डाउनलोड करने के लिए कहती हैं.

यह भी पढ़ें: हैकिंग का नया तरीका: प्रॉम्प्ट इंजेक्शन अटैक! AI से कराई जा रही है हैकिंग, ChatGPT में आया लॉकडाउन मोड

लेकिन सवाल यह है कि क्या सच में सिर्फ मोबाइल नंबर से किसी की लाइव लोकेशन पता की जा सकती है? इसका जवाब इतना आसान नहीं है. ज्यादातर मामलों में इसका जवाब नहीं है. और यही गलतफहमी हर साल हजारों लोगों को ऑनलाइन ठगी का शिकार बना देती है.

Mobile Number Location ट्रेसिंग कैसे होती है?

Advertisement

मोबाइल नंबर किसी शख्स का पता नहीं बताता. यह सिर्फ उस सिम कार्ड की पहचान है, जिसे किसी टेलीकॉम कंपनी ने जारी किया है. किसी भी वेबसाइट, ऐप या गूगल सर्च के पास यह अधिकार नहीं होता कि वह सिर्फ मोबाइल नंबर देखकर यह बता दे कि वह शख्स इस समय कहां मौजूद है. यह जानकारी टेलीकॉम नेटवर्क और फोन के अंदर मौजूद लोकेशन सिस्टम तक सीमित रहती है.

असल में किसी मोबाइल की लोकेशन पता करने के लिए कई चीजें मिलकर काम करती हैं. फोन GPS सिग्नल, आसपास के Wi-Fi नेटवर्क, मोबाइल टावर और फोन के सेंसर की मदद से अपनी लोकेशन तय करता है.

यह भी पढ़ें: पब्लिक फोन चार्जिंग और Wifi... खाली कर सकता है आपका बैंक अकाउंट! UGC ने किया अलर्ट

गूगल मैप्स भी इन्हीं जानकारियों का इस्तेमाल करता है. लेकिन यह जानकारी तभी किसी ऐप को मिलती है, जब फोन का ओनर उसे अनुमति देता है. 

यही वजह है कि अगर कोई वेबसाइट कहती है कि सिर्फ मोबाइल नंबर डालिए और लाइव लोकेशन देखिए, तो उस दावे पर भरोसा नहीं करना चाहिए. ऐसे प्लेटफॉर्म के पास न तो टेलीकॉम कंपनी का नेटवर्क होता है और न ही आपके फोन का GPS एक्सेस. इसलिए वे आपकी असली लोकेशन नहीं दिखा सकते. 

लोकेशन ट्रेस करने के चक्कर में अकाउंट खाली हो सकता है

Advertisement

फिर सवाल उठता है कि आखिर ये वेबसाइट चलती कैसे हैं? इसका जवाब भी दिलचस्प है. कई वेबसाइट पहले नकली स्कैनिंग शुरू कर देती हैं. कुछ सेकंड तक ऐसा दिखाया जाता है कि सिस्टम लोकेशन खोज रहा है.

इसके बाद कहा जाता है कि रिजल्ट देखने के लिए सर्वे पूरा करें, ऐप इंस्टॉल करें या कुछ पैसे दें. कई बार यूजर से मोबाइल नंबर, ईमेल, OTP या दूसरी निजी जानकारी भी मांगी जाती है. कई मामलों में यही जानकारी बाद में साइबर ठगी के लिए इस्तेमाल होती है. 

यह भी पढ़ें: Anthropic के Claude ने हैक कर दिया गूगल क्रोम, AI ने खुद लिखा हैकिंग कोड, लोग हैरान

कुछ वेबसाइट एक अनुमानित शहर या राज्य दिखा देती हैं. इससे लोगों को लगता है कि ट्रैकिंग सफल हो गई. लेकिन कई बार यह जानकारी मोबाइल नंबर के शुरुआती सीरीज, पुराने टेलीकॉम रिकॉर्ड या IP एड्रेस के आधार पर सिर्फ एक मोटा अनुमान होती है. इसका उस शख्स की लाइव लोकेशन से कोई सीधा संबंध नहीं होता.

गूगल मैप्स पर लोकेशन शेयरिंग फीचर

कई लोग यह भी मानते हैं कि गूगल पर मोबाइल नंबर डालने से सामने वाले की लोकेशन मिल जाएगी. यह भी गलतफहमी है. गूगल किसी व्यक्ति की लाइव शख्स तभी दिखा सकता है, जब वह यूजर खुद गूगल मैप्स लोकेशन शेयरिंग जैसे ऑप्शन के जरिए अपनी लोकेशन आपके साथ शेयर करे. बिना परमिशन गूगल भी किसी की लाइव लोकेशन नहीं दिखाता. 

Advertisement

हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि मोबाइल की लोकेशन कभी ट्रैक नहीं हो सकती. कानून लागू करने वाली एजेंसियों के पास कुछ विशेष परिस्थितियों में यह क्षमता होती है. लेकिन वे भी सिर्फ मोबाइल नंबर डालकर किसी का मैप नहीं देख लेतीं.

टेलीकॉम कंपनियों के पास होता है डेटा

भारत में पुलिस या दूसरी जांच एजेंसियां आमतौर पर टेलीकॉम कंपनियों से कानूनी प्रक्रिया के तहत जानकारी मांगती हैं. जरूरत पड़ने पर कॉल डिटेल रिकॉर्ड, सेल टावर से जुड़ी जानकारी और दूसरे तकनीकी रिकॉर्ड का इस्तेमाल किया जाता है. कई मामलों में अदालत या संबंधित कानूनी प्रक्रिया के तहत अनुमति भी जरूरी होती है. 

किस टावर से कनेक्ट हुआ था फोन, इस आधार पर होती है ट्रेसिंग

जब कोई मोबाइल फोन नेटवर्क से जुड़ा होता है, तब वह आसपास के मोबाइल टावरों से लगातार संपर्क बनाए रखता है. जांच एजेंसियां टेलीकॉम कंपनी की मदद से यह पता लगा सकती हैं कि फोन किस टावर या किन टावरों से जुड़ा था.

यह भी पढ़ें: गूगल, माइक्रोसॉफ्ट से लेकर उबर तक! AI के नाम पर लाखों लोगों की छंटनी के बाद मुश्किल में कंपनियां

कई टावरों के सिग्नल को अनालाइज करके किसी एरिया का अनुमान लगाया जा सकता है. इसे आम भाषा में सेल टावर ट्रायएंगुलेशन कहा जाता है. लेकिन यह प्रक्रिया आम लोगों के लिए एवेलेबल नहीं होती. 

Advertisement

फोन चोरी होने पर कैसे करें ट्रेस

अगर मोबाइल चोरी हो जाए, तब भी आम इंसान किसी नंबर से उसकी लाइव लोकेशन नहीं देख सकता. भारत सरकार का CEIR (Central Equipment Identity Register) पोर्टल चोरी या गुम हुए मोबाइल को ब्लॉक करने और उसके दोबारा नेटवर्क पर आने पर ट्रेस करने में मदद करता है. इसमें IMEI नंबर और कानूनी प्रक्रिया का इस्तेमाल होता है, सिर्फ मोबाइल नंबर का नहीं. 

यही वजह है कि साइबर एक्सपर्ट बार-बार सलाह देते हैं कि मोबाइल नंबर से लाइव लोकेशन का दावा करने वाली वेबसाइटों से दूर रहें. ऐसी साइटों पर अपनी निजी जानकारी, OTP, बैंक डिटेल या भुगतान की जानकारी कभी शेयर नहीं करनी चाहिए.

अगर किसी परिवार के सदस्य की लोकेशन जाननी हो, तो गूगल मैप्स, Apple Find My या दूसरे ऑफिशियल लोकेशन-शेयरिंग फीचर का इस्तेमाल करें, जहां सामने वाले की परमिशन क्लियर होती है. 

फिल्मों और वेब सीरीज में अक्सर दिखाया जाता है कि कोई हैकर कुछ सेकंड में सिर्फ मोबाइल नंबर डालकर किसी की सटीक लोकेशन निकाल लेता है. असल दुनिया में ऐसा नहीं होता. बिना कानूनी अधिकार, बिना टेलीकॉम नेटवर्क की मदद और बिना यूजर की अनुमति के सिर्फ मोबाइल नंबर से किसी की लाइव लोकेशन निकालना संभव नहीं है. 

---- समाप्त ----
Live TV

Advertisement
Latest News in Hindi »
Advertisement