भारत में शायद ही कोई ऐसा स्मार्टफोन यूज़र हो जो WhatsApp इस्तेमाल न करता हो. मैसेज, कॉल, ऑफिस का काम, फैमिली ग्रुप, यहां तक कि सरकारी सूचनाएं भी. लेकिन अब यही WhatsApp सुप्रीम कोर्ट के कटघरे में खड़ा है, और जजों के शब्दों में नाराज़गी साफ दिख रही है.
हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने WhatsApp और उसकी पेरेंट कंपनी Meta को साफ चेतावनी दी. अदालत ने कहा कि नागरिकों की प्राइवेसी के अधिकार के साथ कोई कंपनी खेल नहीं सकती. यहां तक कहा गया कि अगर नियम नहीं मान सकते, तो भारत छोड़ने का विकल्प भी खुला है.
यह कोई मामूली टिप्पणी नहीं है. सवाल यह है कि अचानक अदालत इतनी सख्त क्यों हुई? क्योंकि कुछ महीने पहले कोर्ट में WhatsApp ने खुद ही एक सख्त टिप्पणी की थी. वॉट्सऐप ने एक मामले की सुनवाई में कहा था कि अगर हमें एंड टु एंड एन्क्रिप्शन हटाने को कहा गया तो हम भारत से एग्जिट लेंगे, क्योंकि कोई दूसरा रास्ता नहीं बचा ैह. लेकिन ये मामला दूसरा है. आइए जानते हैं.
मामला शुरू कहां से हुआ?
इस विवाद की जड़ है WhatsApp की प्राइवेसी पॉलिसी. WhatsApp सालों से यह कहता आ रहा है कि उसके मैसेज End-To-End Encrypted (E2EE) हैं और कोई तीसरा शख्स उन्हें नहीं पढ़ सकता. लेकिन समस्या मैसेज के कंटेंट की नहीं, बल्कि यूज़र डेटा की है.
WhatsApp अपनी नई पॉलिसी में यह साफ करता है कि वह यूज़र का मेटाडेटा, यानी किससे बात हुई, कब हुई, कितनी बार हुई, डिवाइस की जानकारी और दूसरी तकनीकी डिटेल्स Meta की बाकी कंपनियों, खासकर फेसबुक और इंस्टाग्राम के साथ शेयर कर सकता है.
भारत सरकार और अब सुप्रीम कोर्ट का सवाल यही है कि जब WhatsApp भारत में करोड़ों लोगों का डेटा इकट्ठा कर रहा है, तो उसका इस्तेमाल किस हद तक हो रहा है और किसके फायदे के लिए.
'Take it or leave it' वाला रवैया क्यों खटक रहा है?
सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई के दौरान जजों ने WhatsApp के रवैये पर सीधी आपत्ति जताई. अदालत ने कहा कि WhatsApp यूज़र्स को यह नहीं कह सकता कि पॉलिसी मानो या ऐप छोड़ दो.
भारत में WhatsApp सिर्फ एक ऐप नहीं रह गया है. यह एक तरह से डिजिटल इन्फ्रास्ट्रक्चर बन चुका है. छोटे दुकानदार से लेकर सरकारी दफ्तर तक, सब इसी पर टिके हैं. ऐसे में यूज़र के पास असल में कोई विकल्प नहीं बचता.
अदालत का मानना है कि ऐसी स्थिति में कंपनी की जिम्मेदारी और बढ़ जाती है. अगर बात सिर्फ एक चैट मैसेज की होती तो अलग बात थी, लेकिन WhatsApp पर एक पै
सरकार का रूख
भारत सरकार का रुख पहले से साफ रहा है कि यूज़र डेटा भारत में रहना चाहिए और उसका इस्तेमाल देश के कानूनों के तहत ही होना चाहिए. WhatsApp की पॉलिसी पर डर यह है कि डेटा विदेश में स्टोर होता है और Meta जैसे ग्लोबल प्लेटफॉर्म उसका इस्तेमाल अपने बिजनेस मॉडल के हिसाब से करते हैं.
यह सिर्फ विज्ञापन तक सीमित मामला नहीं है. डेटा प्रोफाइलिंग, यूज़र बिहेवियर ट्रैकिंग और भविष्य में AI सिस्टम को ट्रेन करने जैसे मुद्दे भी इससे जुड़े हैं.
सुप्रीम कोर्ट ने भी सुनवाई के दौरान यही कहा कि प्राइवेसी कोई लग्ज़री नहीं, बल्कि संविधान से जुड़ा मौलिक अधिकार है.
WhatsApp की दलील क्या है?
WhatsApp का कहना है कि मैसेज की सुरक्षा पूरी तरह बरकरार है और वह सरकार या Meta को चैट कंटेंट नहीं देता. कंपनी यह भी कहती है कि उसकी पॉलिसी ग्लोबल है और भारत को अलग ट्रीट नहीं किया जा सकता.
लेकिन यही बात अदालत को मंजूर नहीं है. कोर्ट का कहना है कि भारत का कानून और यूज़र बेस इतना बड़ा है कि “ग्लोबल पॉलिसी” का बहाना नहीं चल सकता.
असल लड़ाई टेक्नोलॉजी की नहीं, कंट्रोल की है
यह केस सिर्फ WhatsApp तक सीमित नहीं है. यह एक मिसाल बनने वाला मामला है कि भारत Big Tech कंपनियों से कैसे डील करेगा. सवाल यह है कि क्या कोई विदेशी कंपनी यहां बिजनेस तो करे, लेकिन नियम अपने बनाए. सरकार और अदालत दोनों यह संकेत दे चुके हैं कि भारत अब डेटा कॉलोनी नहीं रहेगा. यूज़र का डेटा, यूज़र की शर्तों पर इस्तेमाल होगा.
आम यूज़र को क्यों फर्क पड़ता है
बहुत से लोग सोचते हैं कि हमें क्या, हम तो बस चैट करते हैं. लेकिन यही सोच सबसे खतरनाक है. आज डेटा ही असली ताकत है. आपकी ऑनलाइन आदतें, पसंद-नापसंद और बातचीत का पैटर्न ही तय करता है कि आपको क्या दिखाया जाएगा, क्या बेचा जाएगा और किस तरह प्रभावित किया जाएगा.
अगर इस पर कोई कंट्रोल नहीं हुआ, तो WhatsApp जैसे प्लेटफॉर्म सिर्फ मैसेज ऐप नहीं रहेंगे, बल्कि यूज़र के डिजिटल व्यवहार को नियंत्रित करने वाले टूल बन जाएंगे.
आगे क्या हो सकता है?
सुप्रीम कोर्ट की सख्ती के बाद WhatsApp को या तो अपनी पॉलिसी में बदलाव करना होगा या भारत सरकार के साथ किसी बीच के रास्ते पर आना होगा. यह भी संभव है कि भारत के लिए अलग डेटा नियम बनाए जाएं. कई बड़ी कंपनियां अलग अलग देशों के हिसाब से नियम बनाती हैं.
एक बात साफ है. यह लड़ाई लंबी है और इसका असर सिर्फ WhatsApp पर नहीं, बल्कि बाकी सोशल मीडिया और मैसेजिंग ऐप्स पर भी पड़ेगा.
यह मामला WhatsApp बनाम सरकार से कहीं बड़ा है. यह सवाल है कि डिजिटल इंडिया में नागरिकों का अधिकार किसके हाथ में होगा?