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सुरेश कलमाड़ी, अभय चौटाला क्यों बने खेल संस्थाओं की मजबूरी?

भ्रष्टाचार और अपराध के कई आरोपों से घिरे सुरेश कलमाड़ी और अभय चौटाला को भारतीय ओलंपिक संघ ने अपना आजीवन सदस्य बनाया लेकिन 24 घंटे के भीतर कलमाड़ी ने इस पद को लेने में असमर्थता जता दी. लेकिन भारतीय ओलंपिक संघ के इस अभूतपूर्व फैसले ने एक बहस छेड़ दी है साथ ही यह सवाल भी छोड़ दिया है कि क्यों कलमाड़ी और चौटाला हैं खेल संघों की जरूरत.

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सुरेश कलमाड़ी
सुरेश कलमाड़ी

भ्रष्टाचार और अपराध के कई आरोपों से घिरे सुरेश कलमाड़ी और अभय चौटाला को भारतीय ओलंपिक संघ ने अपना आजीवन सदस्य बनाया. दोनों राजनेताओं का लंबे अंतराल तक भारतीय खेल की दुनिया में दखल रहा और इस दौरान इन पर गंभीर आपराधिक आरोप लगे. दोनों को खेल प्रबंधन समिति से हटाया गया. आईओए के इस फैसले पर खेल मंत्रालय ने हैरानी जताई और खेल मंत्री ने अपने घर पर ही संवाददाता सम्मेलन बुला कर इसकी आलोचना और इस पर जांच बैठाने का निर्णय लिया. हालांकि इस फैसले के 24 घंटे के भीतर ही कलमाड़ी ने खुद इस पद को लेने में असमर्थता जता दी लेकिन अभय चौटाला ने अब तक इस पद को ठुकराने का मन नहीं बनाया है.

इस साल रियो ओलंपिक में महिला तिकड़ी पीवी सिंधू, साक्षी मलिक और दीपा कर्माकर के प्रदर्शन से जहां क्रिकेट से इतर खेल जगत को कुछ साकारात्मक संकेत मिले वहीं इस हैरान कर देने वाले फैसले ने साल के अंत में एक बार निराशा के बादल बिखेर दिए. भारतीय ओलंपिक संघ का यह अभूतपूर्व फैसला एक सही के बाद दस गलत कदम उठाने जैसा है जिससे बचने की जरूरत थी.

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1996 से 2011 तक भारतीय ओलंपिक संघ के अध्यक्ष रह चुके सुरेश कलमाड़ी नई दिल्ली में आयोजित राष्ट्रमंडल खेलों (2010) की आयोजन समिति के भी प्रमुख थे. राष्ट्रमंडल खेलों के आयोजन को लेकर बड़े स्तर पर आर्थिक अनियमितता के बाद कलमाड़ी पर अपने पद का दुरुपयोग करते हुए भ्रष्टाचार के आरोप लगे. उन्हें हटना पड़ा. जेल हुई तो तीन बार के सांसद कलमाड़ी को कांग्रेस पार्टी ने भी बर्खास्त कर दिया. 10 महीने जेल में रहने के बाद कलमाड़ी को जमानत पर रिहा किया गया. ओलंपिक संघ के अध्यक्ष के कार्यकाल के दौरान ही कलमाड़ी 2000 से 2013 तक एशियन एथलेटिक्स महासंघ के भी अध्यक्ष रहे और पिछले साल मार्च में ही उन्हें अपने कार्यकाल के दौरान एशिया में एथलेटिक्स के विकास में योगदान के लिए इसका आजीवन मानद अध्यक्ष बना दिया.


चौटाला का भी आईओए में पुराना कार्यकाल विवादों भरा रहा था. अभय चौटाला आय से अधिक संपत्ति के मामले में अभियुक्त हैं. चौटाला भारतीय एमेच्योर मुक्केबाजी महासंघ के भी अध्यक्ष रह चुके हैं जिसकी मान्यता 2013 में रद्द कर दी गई थी. चौटाला दिसंबर 2012 से फरवरी 2012 तक आईओए के अध्यक्ष थे और उनके कार्यकाल के दौरान ही अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक संघ ने चुनाव में गड़बड़ी को लेकर भारतीय ओलंपिक संघ को निलंबित किया था. यह निलंबन तब तक जारी रहा जब तक चौटाला और कलमाड़ी को प्रबंधन से हटाया नहीं गया.

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यहां यह बताना जरूरी है कि मानद अध्यक्ष के पास करने को कुछ खास नहीं होता क्योंकि आर्थिक एवं प्रशानसनिक शक्तियां अध्यक्ष एन रामचंद्रन के अधिकार दायरे में आती हैं. यानी एक तरह से इन दोनों को एक झुनझुना भर पकड़ाया गया जो संघ की पूर्व अध्यक्षों को मानद अध्यक्ष बनाने की परंपरा के तहत है. साथ ही मानद अध्यक्ष को न तो कोई ऑफिस और न ही कोई अधिकार दिया जाता है जिससे दैनिक कार्यों में वो हस्तक्षेप कर सकें. भारतीय ओलंपिक संघ की कार्यकारी समिति में अध्यक्ष, वरिष्ठ उपाध्यक्ष, आठ वरिष्ठ उपाध्यक्ष, महासचिव, कोषाध्यक्ष, छह संयुक्त सचिव, कार्यकारी परिषद के 10 सदस्य, एथलीट आयोग का एक चयनित प्रतिनिधि रहता है. ये ही संघ को चलाते हैं. मानद अध्यक्षों को सालाना आम बैठक में बुलाया जा सकता है लेकिन इन्हें वोट देने का अधिकार नहीं होता.

आनन फानन में इस निर्णय पर खेल मंत्री का मुंह खोलना आने वाले दिनों में स्वायत्त काम कर रहे इन खेल संघों के लंबे समय से अपरिवर्तित प्रबंधन नियमों को बदले जाने की संभावना की और इशारा जरूर कर रहा है. हालांकि यह देखना दिलचस्प होगा कि बिल्ली के गले में घंटा बांधने की कवायद कब शुरू होगी.

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