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776 रन, 72 छक्के... फिर भी वैभव का डेब्यू नहीं, क्या एक्सेप्शनल टैलेंट भी सिर्फ अपनी बारी का इंतजार करे?

15 साल के वैभव सूर्यवंशी ने आईपीएल में 776 रन, 72 छक्के और रिकॉर्डतोड़ पारियों से पूरी दुनिया का ध्यान खींचा. इसके बावजूद आयरलैंड के खिलाफ पहले टी20 में उन्हें डेब्यू का मौका नहीं मिला. क्या टीम इंडिया में सिर्फ प्रदर्शन काफी नहीं, या फिर असाधारण प्रतिभाओं के लिए भी अपनी बारी का इंतजार करना पड़ता है?

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फिर भी इंतजार! क्या नियम प्रतिभा से बड़े हैं? (Photo: X @BCCI Screengrab)
फिर भी इंतजार! क्या नियम प्रतिभा से बड़े हैं? (Photo: X @BCCI Screengrab)

26 जून 2026... करोड़ों भारतीय क्रिकेट प्रशंसक टीम इंडिया की प्लेइंग इलेवन का इंतजार कर रहे थे. वजह सिर्फ आयरलैंड के खिलाफ पहला टी20 नहीं था, बल्कि 15 साल के वैभव सूर्यवंशी का संभावित डेब्यू था. लेकिन जैसे ही टीम शीट सामने आई, उत्साह एक सवाल में बदल गया- वैभव आखिर हैं कहां?

भारतीय क्रिकेट में एक नई बहस जन्म ले चुकी है. सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि वैभव सूर्यवंशी को डेब्यू क्यों नहीं मिला.सवाल इससे कहीं बड़ा है- क्या हर खिलाड़ी का मूल्यांकन एक ही पैमाने पर होना चाहिए या फिर असाधारण प्रतिभाओं के लिए अपवाद भी होने चाहिए?

15 साल की उम्र में कोई बल्लेबाज आईपीएल में 776 रन बना देता है. 72 छक्के उड़ाता है. दुनिया के कई नामी गेंदबाजों के खिलाफ बेखौफ बल्लेबाजी करता है. इसके बाद श्रीलंका में 11 गेंदों पर लिस्ट-ए क्रिकेट का सबसे तेज अर्धशतक जड़ देता है. अंडर-19 स्तर पर भारत समेत सात देशों में शतक लगा चुका होता है.

इसके बावजूद अगर उसे सिर्फ बेंच पर बैठकर इंतजार करना पड़े, तो सवाल उठना लाजिमी है- आखिर टीम इंडिया की जर्सी पहन कर पिच पर उतरने के लिए अब और क्या करना होगा?

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चयन का नया गणित

भारतीय क्रिकेट बदल चुका है. अब चयन सिर्फ प्रतिभा या मौजूदा फॉर्म पर नहीं होता. अब समीकरण में कई चीजें जुड़ चुकी हैं- टीम बैलेंस, भूमिका, मौजूदा खिलाड़ी की फॉर्म, फिटनेस, ड्रेसिंग रूम की निरंतरता और सही समय.

यही वजह है कि अभिषेक शर्मा और संजू सैमसन जैसे स्थापित ओपनरों के रहते वैभव सूर्यवंशी के लिए प्लेइंग इलेवन का रास्ता आसान नहीं है.

ईमानदारी से देखें तो टीम मैनेजमेंट की दलील भी कमजोर नहीं है, जिसने टीम के लिए प्रदर्शन किया है, उसे सिर्फ इसलिए बाहर नहीं किया जा सकता कि बाहर कोई नया खिलाड़ी जोरदार फॉर्म में है.

भारत के बल्लेबाजी कोच सितांशु कोटक ने वैभव सूर्यवंशी को लेकर टीम मैनेजमेंट का रुख लगभग साफ कर दिया है. उनका कहना है कि सिर्फ किसी नए खिलाड़ी को मौका देने के लिए उस बल्लेबाज को बाहर करना उचित नहीं होगा, जो लगातार रन बना रहा है.

यानी नियम अपनी जगह सही हैं. लेकिन क्या हर नियम का कोई अपवाद नहीं होता?

यहीं से बहस शुरू होती है.

क्रिकेट में कुछ प्रतिभाएं ऐसी होती हैं, जो सामान्य नहीं होतीं. उनके आंकड़े सामान्य नहीं होते. उनकी उम्र सामान्य नहीं होती. उनका प्रभाव भी सामान्य नहीं होता. वैभव सूर्यवंशी शायद उसी श्रेणी में आते हैं.

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15 साल की उम्र में कोई खिलाड़ी सिर्फ घरेलू क्रिकेट में रन नहीं बना रहा. वह आईपीएल में दुनिया के सर्वश्रेष्ठ गेंदबाजों के खिलाफ रन बना रहा है. अलग-अलग देशों में शतक बना चुका है. बड़े मंच के दबाव को झेल चुका है.

अगर ऐसी प्रतिभा के लिए भी व्यवस्था में कोई अपवाद नहीं है, तो फिर अपवाद आखिर किसके लिए बचाकर रखा गया है?

फिर स्क्वॉड में चुना ही क्यों?

यह सबसे असहज सवाल है. अगर टीम मैनेजमेंट पहले से जानता था कि दोनों ओपनर पूरी तरह फिट हैं, उनकी जगह पर कोई खतरा नहीं है और वैभव को खेलने का मौका लगभग नहीं मिलेगा, तो फिर उन्हें स्क्वॉड में शामिल करने का उद्देश्य क्या था?

- क्या सिर्फ माहौल समझने के लिए?

- क्या सिर्फ नेट्स में अभ्यास कराने के लिए?

- क्या सिर्फ विदेशी दौरे का अनुभव देने के लिए?

बेशक, यह भी विकास प्रक्रिया का हिस्सा हो सकता है. लेकिन जब पूरा देश किसी खिलाड़ी के डेब्यू का इंतजार कर रहा हो और वह खुद अपने प्रदर्शन से दरवाजा तोड़ने की कोशिश कर चुका हो, तब सिर्फ 'अनुभव' वाला तर्क अधूरा लगता है. क्योंकि अनुभव का सबसे बड़ा शिक्षक ड्रेसिंग रूम नहीं, मैच होता है.

इतिहास गवाह है... जब प्रतिभा के लिए नियम बदले गए

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भारतीय क्रिकेट में यह पहली बार नहीं है, जब किसी असाधारण प्रतिभा ने चयनकर्ताओं के सामने नियम और दूरदृष्टि के बीच चुनाव की स्थिति पैदा की हो.महेंद्र सिंह धोनी इसका सबसे बड़ा उदाहरण हैं.

बहुत कम लोग जानते हैं कि धोनी बीसीसीआई के प्रतिभा अनुसंधान एवं विकास विभाग (TRDW) की खोज थे. उस समय इस कार्यक्रम में शामिल होने की अधिकतम उम्र 19 साल तय थी, लेकिन धोनी 21 साल के हो चुके थे. नियम कहता था कि वह इस योजना का हिस्सा नहीं बन सकते.

लेकिन उनकी प्रतिभा नियमों से बड़ी साबित हुई. पूर्व बंगाल कप्तान प्रकाश पोद्दार ने जमशेदपुर में धोनी की विस्फोटक बल्लेबाजी देखी. उन्होंने तत्कालीन चयन समिति अध्यक्ष दिलीप वेंगसरकर से साफ कहा कि इस खिलाड़ी के लिए उम्र का नियम आड़े नहीं आना चाहिए.

वेंगसरकर ने भी वही किया. उन्होंने नियम में ढील दी और धोनी को TRDW कार्यक्रम में शामिल कराया. बाद में खुद वेंगसरकर ने स्वीकार किया कि असाधारण प्रतिभा के लिए नियम बाधा नहीं बनने चाहिए.आगे की कहानी दुनिया जानती है.

यही खिलाड़ी भारत का सबसे सफल कप्तान बना. टी20 विश्व कप, वनडे विश्व कप और चैम्पियंस ट्रॉफी जिताई. भारतीय क्रिकेट का चेहरा बदल दिया.

बेशक, धोनी और वैभव सूर्यवंशी की परिस्थितियां पूरी तरह एक जैसी नहीं हैं. वहां मामला एक प्रतिभा विकास कार्यक्रम का था, यहां अंतरराष्ट्रीय डेब्यू का है.

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लेकिन दोनों कहानियों का मूल संदेश एक ही है- जब कोई खिलाड़ी सामान्य प्रतिभा से कहीं आगे निकल जाए, तब चयनकर्ता, कोच या कप्तान सिर्फ नियमों के संरक्षक नहीं रहते, बल्कि भविष्य के निर्माता भी बन जाते हैं.

धोनी के मामले में भारतीय क्रिकेट ने नियम से पहले प्रतिभा देखी थी.वैभव के मामले में प्रतिभा के साथ नियम खड़े दिखाई दे रहे हैं. इतिहास बताएगा कि इस बार कौन-सा रास्ता सही था.

टीम मैनेजमेंट भी गलत नहीं... लेकिन

यह भी सच है कि अभिषेक शर्मा और संजू सैमसन ने अपनी जगह कमाई है. उन्हें सिर्फ उत्साह या लोकप्रियता के आधार पर बाहर करना गलत संदेश देगा.

लेकिन हर फैसला या तो पूरी तरह सही होता है या पूरी तरह गलत- ऐसा भी नहीं है. कई बार खेल में ऐसे मौके आते हैं, जहां आपको सिर्फ वर्तमान नहीं, भविष्य भी देखना पड़ता है. वैभव सूर्यवंशी शायद ऐसा ही मामला हैं.

अगर चयनकर्ता मानते हैं कि वह भारतीय क्रिकेट का भविष्य हैं, अगर इसी सोच के साथ उन्हें 15 साल की उम्र में राष्ट्रीय टीम के स्क्वॉड में जगह दी गई है, तो यह सवाल भी उतना ही स्वाभाविक है कि क्या उस असाधारण प्रतिभा को सिर्फ बेंच पर बैठाकर भविष्य के लिए तैयार किया जाएगा या फिर सही समय पर उस पर भरोसा भी जताया जाएगा?

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असली सवाल

सवाल यह नहीं है कि हर युवा खिलाड़ी को तुरंत डेब्यू मिलना चाहिए. सवाल यह है कि अगर 15 साल की उम्र में इतना कुछ हासिल करने के बाद भी कोई खिलाड़ी अपवाद नहीं माना जाता, तो फिर आखिर किसे माना जाएगा?

शायद चयनकर्ताओं के पास इसका जवाब हो. लेकिन करोड़ों क्रिकेट प्रशंसकों के मन में यह सवाल अभी भी जस का तस है.

वैभव सूर्यवंशी आज नहीं खेले, तो दुनिया खत्म नहीं हो जाएगी. उनका डेब्यू शायद कुछ दिन बाद हो ही जाएगा. लेकिन यह बहस यहीं खत्म नहीं होगी.

क्योंकि सवाल वैभव का नहीं है. सवाल यह है कि जब कोई खिलाड़ी 'सामान्य प्रतिभा' की सीमा पार कर जाए, तो क्या उसे भी सिर्फ अपनी बारी का इंतजार करना चाहिए?

भारतीय क्रिकेट ने एक बार महेंद्र सिंह धोनी के लिए नियमों से आगे देखने का साहस दिखाया था. शायद इसी वजह से इतिहास उन्हें 'कैप्टन कूल' के नाम से याद करता है. अब अगला फैसला वैभव सूर्यवंशी को लेकर है.

आखिर Exceptional Talent, Exceptional Treatment डिजर्व करता है... या सिर्फ लंबा इंतजार?

Exceptional treatment का मतलब किसी दूसरे खिलाड़ी के साथ अन्याय नहीं है. इसका मतलब है, जब कोई प्रतिभा सामान्य मानकों से बहुत आगे निकल जाए, तो टीम मैनेजमेंट उसके लिए परंपरागत सोच से अलग फैसला लेने का साहस दिखाए.

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क्रिकेट का इतिहास बताता है कि महान खिलाड़ी सिर्फ अपने प्रदर्शन से नहीं बनते. कई बार उन्हें पहचानने और सही समय पर उन पर भरोसा करने का साहस भी इतिहास रचता है. शायद यही वजह है कि धोनी की कहानी आज भी सुनाई जाती है. अब देखना यह है कि भारतीय क्रिकेट, वैभव सूर्यवंशी की कहानी किस तरह लिखना चाहता है.

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