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नियति का निमंत्रण... क्या ऋषभ पंत बनेंगे टेस्ट क्रिकेट के मॉडर्न ग्रेट?

ऋषभ पंत भारतीय टेस्ट क्रिकेट के सबसे रोमांचक और प्रभावशाली विकेटकीपर-बल्लेबाजों में से एक हैं, जिनकी आक्रामक शैली ने कई मैचों का रुख बदल दिया है. हाल के वर्षों में उनके व्हाइट बॉल प्रदर्शन और नेतृत्व भूमिकाओं को लेकर सवाल उठे हैं, लेकिन टेस्ट क्रिकेट में उनका रिकॉर्ड और प्रभाव उन्हें एक अलग स्तर पर खड़ा करता है. यह लेख इस बात की पड़ताल करता है कि क्या पंत आने वाले समय में सुनील गावस्कर, सचिन तेंदुलकर और राहुल द्रविड़ जैसे दिग्गजों की श्रेणी में शामिल होकर 'मॉडर्न टेस्ट ग्रेट' बन सकते हैं.

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ऋषभ पंत के सामने ‘मॉडर्न ग्रेट’ बनने की चुनौती. (Photo, PTI)
ऋषभ पंत के सामने ‘मॉडर्न ग्रेट’ बनने की चुनौती. (Photo, PTI)

क्रिकेट केवल हरी घास पर लाल या सफेद गेंद का खेल नहीं है, यह खिलाड़ियों के चरित्र की अनवरत परीक्षा है. लाख टैलेंटेड होने पर भी बड़े से बड़े खिलाड़ी को हर मैच, हर सीरीज में अपनी काबिलियत और अहमियत साबित करनी पड़ती है. अपनी प्रतिष्ठा के अनुरूप प्रदर्शन नहीं कर पाने पर उनकी जगह संदेह और सवालों के घेरे में आ जाती है और फिर एक दिन टीम से उनकी विदाई भी हो जाती है. सूर्यकुमार यादव इस परिघटना की ताज़ा तस्वीर और नजीर बने हैं.

भारतीय क्रिकेट के सबसे रोमांचक और अलहदा किरदारों में से एक, ऋषभ पंत का करियर भी आज एक दोराहे पर खड़ा है. हाल ही में टेस्ट उपकप्तानी के पद से उनकी विदाई ने इस विमर्श को हवा दे दी है कि पंत का भविष्य किस दिशा में मुड़ेगा. कोच गौतम गंभीर की नसीहत भी सामने आई. संकेत साफ था कि नेतृत्व की जिम्मेदारी से परे, पंत का असली मूल्य उनकी बेखौफ बल्लेबाजी में है, बशर्ते वह मैच की परिस्थिति को ध्यान में रखकर की जाए.

यह सवाल इसलिए भी प्रासंगिक है क्योंकि व्हाइट बॉल क्रिकेट में पंत का ग्राफ पिछले कुछ समय से उम्मीदों के मुताबिक नहीं रहा है. आईपीएल में जबसे उन्होंने लखनऊ सुपर जायंट्स की कप्तानी संभाली, उनकी बैटिंग और कप्तानी दोनों में ही वह धार नहीं दिखी, जिसके लिए वह जाने जाते हैं. टी20 और वनडे के इस दौर में, जहां खेल की रफ्तार पलक झपकते बदलती है, पंत का इंटरनेशनल व्हाइट बॉल करियर एक ढलती हुई सांझ जैसा प्रतीत होने लगा है. लेकिन यही वह मोड़ है, जहां से एक चैंपियन खिलाड़ी की कहानी नया करवट ले सकती है.

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टेस्ट क्रिकेट: पंत का असली रंगमंच

व्हाइट बॉल क्रिकेट की चकाचौंध से दूर, टेस्ट क्रिकेट के पांच दिवसीय तपस्या वाले प्रारूप में पंत ने अपनी कला के सबसे जीवंत रंग बिखेरे हैं. फिर चाहे सिडनी हो या गाबा- पंत ने बार-बार साबित किया है कि उनके भीतर 'एक्स-फैक्टर' का वास है. जब वह क्रीज पर कदम रखते हैं, तो विरोधी टीम की रणनीति धरी की धरी रह जाती है. उनके शॉट किसी कसीदाकारी की तरह नहीं, बल्कि एक बवंडर की तरह आते हैं जो विपक्षी गेंदबाज़ों की रणनीति को तितर-बितर कर देते हैं.

यदि पंत व्हाइट बॉल के भटकाव और कप्तानी के मोह को पीछे छोड़ दें, तो उनके सामने टेस्ट क्रिकेट का एक अनंत आसमान खुला है. उन्होंने अबतक 50 मैचों में करीब 43 की औसत से 3500 से ज्यादा रन बनाए हैं. अभी वह सिर्फ 28 साल के हैं और उनके पास उम्र का सबसे बड़ा वरदान है. अगले 10 साल में यदि वह खुद को पूरी तरह टेस्ट प्रारूप के प्रति समर्पित कर दें, तो सत्तर-पचहत्तर टेस्ट मैच खेलना और उनमें साढ़े छह हजार रन बनाना उनके लिए कोई अकल्पनीय लक्ष्य नहीं है.

दस हजार रनों का शिखर और प्रतिभा से न्याय

भारतीय क्रिकेट के इतिहास में दस हजार टेस्ट रनों का क्लब एक ऐसा पर्वत शिखर है, जहां केवल सुनील गावस्कर, सचिन तेंदुलकर और राहुल द्रविड़ जैसे 'क्रिकेट के तपस्वी' ही बैठ पाए हैं. क्या पंत इस सर्वकालिक महानता के क्लब में शामिल हो सकते हैं? जवाब हां है, बशर्ते वह अपनी प्राथमिकताएं तय कर लें.

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पंत की बल्लेबाजी में वो आदिम ऊर्जा है जो गेंदबाजों के मन में खौफ पैदा करती है. एडम गिलक्रिस्ट के बाद दुनिया ने ऐसा विकेटकीपर-बल्लेबाज नहीं देखा जो मैच का रुख इतनी बेरहमी से मोड़ सके. लेकिन इस एक्स-फैक्टर के साथ एक बड़ी जिम्मेदारी भी आती है. यदि पंत अपनी इस दुर्लभ प्रतिभा को टी20 की अंधी दौड़ या फ्रेंचाइजी क्रिकेट के दबाव में जाया कर देते हैं, तो यह इतिहास की सबसे दुखद कहानियों में से एक होगी.यह अपनी ही साख और प्रकृति प्रदत्त हुनर के साथ नाइंसाफी होगी.

टेस्ट को बनाएं पहला प्यार!

ऐसे में गौतम गंभीर का दृष्टिकोण पंत के लिए एक वरदान साबित हो सकता है. उपकप्तानी का छिनना कोई सजा नहीं, बल्कि उनके कंधों को उस बोझ से आजाद करना है जो उन्हें खुलकर उड़ने से रोक रहा था. अब पंत को तय करना है कि वह क्रिकेट के इतिहास में एक 'रोमांचक सितारे' के रूप में याद किए जाना चाहते हैं या एक 'अमर महानायक' के रूप में.

उन्हें टेस्ट क्रिकेट को अपनी पहली मोहब्बत बनाना होगा. जब वह लाल गेंद के सामने अपनी स्वाभाविक आक्रामकता और संयम का अद्भुत मिश्रण पेश करेंगे, तो दस हजार रनों का वो दुर्ग भी ढह जाएगा. यह पंत के लिए खुद को साबित करने का नहीं, बल्कि अपनी नियति से हाथ मिलाने का समय है. यदि वह ऐसा कर पाए, तो आने वाले दशक में ऋषभ पंत के नाम का डंका बजना तय है. 

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