Sushil Doshi offers condolences over death of Murli Manohar Manjul: भारत में क्रिकेट सबसे लोकप्रिय खेल है. सच तो यह है कि क्रिकेट को भारत में धर्म की तरह माना जाता है. क्रिकेट के प्रति लोगों की दीवानगी सिर चढ़कर बोलती है. अतीत में झांकें तो क्रिकेट को घर-घर तक पहुंचाने में आकाशवाणी (All India Radio) के खेल प्रसारण का बड़ा हाथ रहा.
आज भले ही रेडियो हाशिए पर जाता दिख रहा हो, लेकिन कभी इसने अपना स्वर्णिम दौर भी देखा है. क्रिकेट के 'आंखों देखा हाल' (Running Commentary) ने अपने हर सुनने वाले को वैसा सूकुन और आनंद दिया, जिसकी कल्पना मात्र से पुराने दौर के श्रोता आज भी रोमांचित हो उठते हैं.
रेडियो पर 'आंखों देखा हाल' और मंजुल की आवाज
'आंखों देखा हाल' की चर्चा मात्र से कुछ ऐसे नाम उभर आते हैं, जिनकी जादुई आवाज ने श्रोताओं का मन मोहा था. उनमें से एक नाम मुरली मनोहर मंजुल का है, जिनका कुछ ही दिन पर पहले (25 फरवरी, 2024) 91 साल की उम्र में जयपुर में निधन हो गया. यह वही मंजुल हैं, जिन्होंने अंग्रेजी के बोलबाले के बीच 'इंग्लिश गेम'- क्रिकेट की कमेंट्री को हिंदी में लोकप्रिय बनाने का बीड़ा उठाया था.

दरअसल, क्रिकेट कमेंट्री से अंग्रेजी के वर्चस्व को हटाने में जसदेव सिंह, मुरली मनोहर मंजुल के अलावा सुशील दोशी जैसे बड़े नाम सामने आते हैं. 76 साल के सुशील दोशी तो आज भी हिंदी कमेंट्री की शान बने हुए हैं. दोशी ने कहा कि हिंदी क्रिकेट कमेंट्री के बुनियादी स्तंभ मुरली मनोहर मंजुल के अवसान की खबर अत्यंत दुखदाई है. जसदेव सिंह, स्कंद गुप्त, मनीष देव, अनंत सेतलवाड, सुरेश सरैय्या, जेपी नारायणन और अब मंजुलजी के जाने से रेडियो क्रिकेट कमेंटेटर का स्वर्णिम युग गुजर गया. इनका योगदान इतिहास याद रखेगा.
सुशील दोशी ने मंजुल से जुड़ी यादें साझा कीं
सुशील दोशी ने मंजुल से जुड़ी यादें और उनके साथ बिताए गए पल aajtak.in से साझा किए. उन्होंने कहा, 'वह तो मेरे बड़े भाई की तरह थे. मैं उधर जाता था, तो उनके घर रुकता था, भले ही फाइव स्टार होटल भी हो, लेकिन वो मुझे पकड़कर ले जाते थे. मैच के लिए जब वह इंदौर आते थे तो मेरे यहां ठहरते थे. उनके साथ भाइचारा था.',
उन दिनों मुरली मनोहर मंजुल की कमेंट्री पाकिस्तान में भी काफी पसंद की गई. सुशील दोशी 80 के दशक (1982/83) के उस पाकिस्तान के दौरे को याद करते हुए कहते हैं, 'जब मंजुल साहब को कमेंट्री के लिए पाकिस्तान भेजा गया था, मुझे बहुत खुशी मिली. अपन नहीं गए तो कोई बात नहीं... मंजुल साहब तो गए.' तब कमेंट्री के लिए मंजुल और जेपी नारायणन (अंग्रेजी में) पाकिस्तान गए थे.

पाकिस्तान में भी मंजुल साहब के ढेरों प्रशंसक
इसी के बाद पाकिस्तान दौरे के बाकी बचे तीन टेस्ट मैचों की कमेंट्री के लिए सुशील दोशी और डॉ. नरोत्तम पुरी को भेजा गया. तब मंजुल को लौटने के लिए कहा गया था. सुशील दोशी कहते हैं, 'आपको विश्वास नहीं होगा, वहां मंजुल साहब की तारीफ में पाकिस्तानियों के 150-200 पत्र आए. कोई और कमेंटेटर होता तो उन पत्रों को मंजुल तक नहीं पहुंचाता...छुपा देता, पर मैंने सारे पत्र उन्हें भेजे.'
जब मंजुल से कहा था- आप सबसे ज्यादा लोकप्रिय
सुशील दोशी ने आगे जो कुछ भी कहा वह दिल को छू लेने वाला है. 'मैंने उनसे (मंजुल से) कहा कि साहब आप मुझसे ज्यादा लोकप्रिय हो वहां... पाकिस्तान के श्रोता आपको बहुत चाहते हैं. पाकिस्तान दौरे की समाप्ति के बाद भारत लौटकर जब मंजुल साहब से मिला तो उन पत्रों की बात पर उनकी आंखें भर आई थीं. दरअसल, पाकिस्तान के लोग मंजुल की कमेंट्री शैली से मुग्ध थे.'
मंजुल के 90 साल पूरे होने पर पर यह आलेख प्रकाशित हुआ था- क्लिक करें: : जिन्होंने घर-घर तक पहुंचाई क्रिकेट की गंगा
सुशील दोशी ने मंजुल के साथ एक बार कैरम में दो-दो हाथ किए थे. वह कहते हैं, 'एक बार जब उनके घर रुका तो उनसे कहा कि मैं कैरम बहुत अच्छा खेलता हूं. चलो आपको अभी हराता हूं. यह सुनकर मंजुल बोले कि मुझे तो ठीक से खेलना नहीं आता. लेकिन ये क्या... मंजुल साहब ने तो कमाल कर दिखाया. उनकी बारी आई तो उन्होंने सारी गोटी साफ कर दी. मुझे क्या पता था कि मंजुल इस खेल में राजस्थान चैम्पियन रह चुके थे.'
'मजाकिया अंदाज में बहुत कुछ कह जाते थे मंजुल'
मंजुल के व्यक्तित्व को यादकर सुशील दोशी कहते हैं, 'उनके मन में किसी के लिए कोई द्वेष भाव नहीं था. भावुक बहुत थे, कवि हृदय था उनका... लेखन बहुत अच्छा करते थे. वह मजाकिया अंदाज में बहुत कुछ कह जाते थे. कई बार जब हम ग्राउंड में बैठते थे तो वहां लड़कियां भी रहती थीं. वो उन्हें 'मुक्तक' बोला करते थे... कहते थे कि यहां मुक्तक (काव्य की एक विधा) काफी हैं. उनकी कई चीजों का भुलाया नहीं जा सकता. कमेंट्री की फील्ड में उनसे सरल किसी और को नहीं देखा.'
मंजुल की कमेंट्री शैली पर सुशील दोशी कहते हैं, 'एक तो उनकी हिंदी बहुत अच्छी थी. उनकी सारी चीजें मौलिक थीं. उन्होंने किसी की नकल नहीं की. आज के दौर में कमेंट्री कर रहे क्रिकेटर्स हिंदी भाषा के साथ न्याय नहीं कर रहे. इंग्लैंड में अंग्रेजी व्याकरण की दृष्टि से सही बोली जाती है. स्पेन में स्पेनिश... फ्रांस में फ्रेंच अच्छी बोली जाती है... आज की हिंदी कमेंट्री सुनो तो कई बार वाक्य व्याकरण सम्मत नहीं होता.'
मंजुल ने कमेंट्री के दौरान कभी 'स्ट्रगल' नहीं किया
मंजुल का शब्द भंडार गजब का था. सुशील दोशी ने माना, 'मंजुल ने कमेंट्री के दौरान हिंदी के लिए कभी स्ट्रगल नहीं किया. उनके वर्ड पावर का जवाब नहीं था. कठिन शब्दों का कभी इस्तेमाल भी नहीं करते थे. मैं तो मॉड्यूलेशन के जरिए आवाज में मिठास लाने की कोशिश करता हूं... पर उनकी आवाज मौलिक रूप ले मीठी और जबर्दस्त थी.'
... मुझसे भी अच्छी आवाज
दोशी आगे कहते हैं, 'कमेंटेटर्स में मूल रूप से सबसे अच्छी आवाज मंजुल की थी, वो भी बिना मॉड्यूलेट की हुई. मुझसे भी अच्छी आवाज... खनकदार आवाज, कहीं बोल रहे हों तो लोग देखने लग जाएं कि कौन बोल रहा है.'

सुशील दोशी ने मंजुल के उन वाक्यों को भी याद किया, जिनकी बदौलत हिंदी कमेंट्री समृद्ध हुई. दोशी कहते हैं, 'जब मंजुल बोलते थे - इमरान खान हमसे दूर भागते हुए..., दर्शकों का समर्थन लिये बॉलिंग कर रहे हैं... ऐसे वाक्यों को मंजुल ने कमेंट्री में पिरोया और खूब वाहवाही लूटी.'
सुशील दोशी की आत्मकथा में भी मंजुल की चर्चा
हाल में प्रकाशित सुशील दोशी की आत्मकथा (Autobiography)- 'आंखों देखा हाल' में भी मंजुल को स्थान मिला है. वह कहते हैं, 'आत्मकथा बड़ी ईमानदारी से लिखी है, मंजुल साहब के बारे में भी लिखा है, उनकी तस्वीर भी है.' सुशील दोशी ने मंजुल के साथ भी कमेंट्री की. वह कहते हैं, उनके साथ मैंने कई मैचों कमेंट्री की. मैं उनकी कमेंट्री का मुरीद रहा. खासकर उनकी भाषा का.'
'... पर BCCI हम कमेंटेटर्स के लिए कुछ नहीं कर रहा'
जिन कमेंटेटर्स ने क्रिकेट को शुरू में स्थापित करने में भूमिका निभाई उनके लिए तो भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआई) कुछ सोच ही नहीं रहा. ये ठीक है कमेंटेटर्स बीसीसीआई के अंतर्गत नहीं आते हैं, लेकिन हम क्रिकेट को लोकप्रिय बनाने में तो जुड़े रहे. ऐसे कमेंटेटर्स के लिए यह धनाढ्य क्रिकेट संस्था क्या कर रही.'
'मंजुल साहब अभावों में चले गए'
इस बातचीत के दौरान मंजुल के लिए सुशील दोशी का भी दर्द छलका. उन्होंने कहा, 'आज हम मंजुल साहब के बारे में इतनी बातें कर रहे हैं, लेकिन पिछले पांच सालों में कितने लोगों ने उनके बारे में बात की. पिछले 15 सालों में वो भुला दिए गए न.. मैं तो एक्टिव हूं.. लिखता भी रहता हूं. इस वजह से मेरी बातें की जाती हैं. जीते जी सम्मान होना चाहिए. मंजुल साहब अभावों में चले गए. उन्होंने तो कोई ध्यान ही नहीं दिया, सिर्फ आकाशवाणी की नौकरी की. मैंने तो कई जगह कहा भी कि मंजुल साहब के बारे में कुछ लिखो. नई पीढ़ी को तो उनका नाम भी नहीं मालूम. दुख होता है कि आपको पता नहीं कि क्रिकेट को लोकप्रिय बनाने में उनका कितना योगदान है.'
मंजुल ने 2004 में कमेंट्री की दुनिया से खुद को अलग कर लिया था. आकाशवाणी से अपनी पीड़ा को साझा किए बगैर उन्होंने अपने स्वास्थ्य का हवाला देते हुए कमेंट्री से संन्यास ले लिया था. सुशील दोशी ने मंजुल से कई बार आग्रह किया था कि आप कमेंट्री की दुनिया में लौट आइए, अब तो ईएसपीएन और स्टार स्पोर्ट्स भी हैं. लेकिन उन्होंने इसमें कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई.
आखिर में सुशील दोशी ने मंजुल साहब के बारे में कहा - आज के व्यावसायिक जमाने में मंजुल साहब जैसा इंसान अब ईश्वर पैदा नहीं करता. कहते हैं न... ऐसे लोग जिसको किसी से ईर्ष्या नहीं, जिससे किसी को ईर्ष्या नहीं . ऐसे इंसान थे वो.