भारतीय अंतरिक्ष संगठन (इसरो) के लिए पिछले कुछ साल बहुत मुश्किल भरे रहे. इसरो ने 2017 से 2026 तक कुल 44 मिशन किए, लेकिन इनमें से 5 फेल हुए. ये सभी 5 असफल मिशन राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े थे. इनमें से 3 फेल सैटेलाइट तो सिर्फ जनवरी 2025 से जनवरी 2026 के बीच लॉन्च की गई. ये बार-बार होने वाली गलतियां भारत की अंतरिक्ष से निगरानी और डिफेंस सेक्टर के लिए बड़ा झटका हैं.
क्यों चिंता की बात है?
ये मिशन जासूसी, नेविगेशन और पृथ्वी की निगरानी के लिए थे. इनमें लाखों-करोड़ों रुपये के सैटेलाइट बर्बाद हो गए. अब इन्हें दोबारा बनाने में और पैसा और समय लगेगा. अगर घरेलू सैटेलाइट नहीं हैं, तो भारत को विदेशी कंपनियों से मदद लेनी पड़ सकती है. ये सब भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम को धीमा कर सकता है.
यह भी पढ़ें: फेल फास्ट, लर्न फास्ट... ISRO का कल्चर है सीखने का, दोबारा सही करने का और आगे बढ़ने का
रॉकेट में छोटी-सी खराबी भी पूरी उड़ान बर्बाद कर सकती है. हर असफलता अलग कारण से हुई, लेकिन ये पुराने और भरोसेमंद रॉकेट में हुईं. इससे सवाल उठता है कि क्या जांच में कोई कमी है?
पिछले सालों की पांच असफलताएं
नीचे हम उन पांच रणनीतिक मिशनों की सूची दे रहे हैं जो असफल हुए. हर मिशन की वजह और असर को समझाया गया है...

जनवरी 2026: PSLV-C62 / EOS-N1
यह मिशन इसरो का 2026 का पहला लॉन्च था, जो 12 जनवरी को हुआ. PSLV-C62 रॉकेट में मुख्य सैटेलाइट EOS-N1 (अन्वेषा) था, जो रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन - DRDO द्वारा बनाया गया था. यह हाइपरस्पेक्ट्रल इमेजिंग सैटेलाइट था, जो पृथ्वी की सतह पर विभिन्न सामग्रियों (जैसे मिट्टी, पानी, धातु, वनस्पति) को पहचान सकता था. सूरज की रोशनी से परावर्तित होने वाली अलग-अलग फ्रिक्वेंसी को कैप्चर करके यह सामग्री की पहचान करता था. इसे 511 किलोमीटर ऊंचाई पर रखा जाना था.
इसके अलावा, 15 अन्य सैटेलाइट थे - 7 भारतीय, 2 यूरोपीय, 5 ब्राजीलियन और 1 नेपाली. ये ज्यादातर यूनिवर्सिटी या स्टार्टअप्स के थे, जो अंतरिक्ष में प्रयोग करने के लिए थे. लॉन्च के दौरान, रॉकेट के तीसरे स्टेज के अंत में गड़बड़ी हुई और तय रूट से अलग हो गया.
इसरो प्रमुख डॉ. वी. नारायणन ने कहा कि वे डेटा का विश्लेषण कर रहे हैं. रॉकेट और सभी सैटेलाइट नष्ट हो गए. यह PSLV की मई 2025 की असफलता के बाद दूसरी लगातार असफलता थी.
यह भी पढ़ें: ईरान में स्टारलिंक की 'जैमिंग' भारत के लिए क्यों है चेतावनी?
मई 2025: PSLV-C61 / EOS-09
18 मई 2025 को लॉन्च हुए PSLV-C61 रॉकेट में EOS-09 सैटेलाइट था, जो पहले RISAT के नाम से जाना जाता था. यह रडार इमेजिंग सैटेलाइट था, जो दिन-रात और किसी भी मौसम में इमेज ले सकता था. बादलों के पार देखने की क्षमता के कारण यह रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण था. 1700 किलोग्राम वजन का यह सैटेलाइट कम से कम पांच साल काम करने वाला था.
लिफ्टऑफ के छह मिनट बाद तीसरे स्टेज में समस्या आई. ठोस ईंधन मोटर में चैंबर प्रेशर गिर गया, जिससे मिशन असफल हो गया. यह PSLV की दुर्लभ असफलता थी, जो भारत की पृथ्वी इमेजिंग क्षमताओं को झटका देती है.
जनवरी 2025: GSLV-F15 / NVS-02
NAVIC सैटेलाइट्स की पहली पीढ़ी पुरानी हो रही थी, इसलिए इसरो ने NVS सीरीज के पांच नए सैटेलाइट्स लॉन्च करने की योजना बनाई. NVS-01 मई 2023 में सफलतापूर्वक लॉन्च हुआ, लेकिन NVS-02 जनवरी 2025 में फेल रहा. यह श्रीहरिकोटा से 100वां रॉकेट लॉन्च था.
यह भी पढ़ें: 'नर्वस नाइंटीज' का शिकार क्यों हो रहा इसरो का PSLV रॉकेट? लगातार दूसरी असफलता
GSLV रॉकेट ने सैटेलाइट को शुरुआती ऑर्बिट में पहुंचाया, लेकिन सैटेलाइट में गड़बड़ी आई. ऑक्सीडाइजर रिलीज करने वाले वॉल्व में समस्या के कारण इंजन फायर नहीं हो सका. सैटेलाइट जियोस्टेशनरी ट्रांसफर ऑर्बिट (GTO) में फंस गया - पेरिजी 170 किमी और एपोजी 36,500 किमी.
इसे गोलाकार ऑर्बिट (35,700 किमी) में जाना था, लेकिन ऐसा नहीं हुआ, जिससे सैटेलाइट बेकार हो गया. NAVIC भारत का अपना GPS जैसा सिस्टम है, जिसका इस्तेमाल सेना करती.

अगस्त 2021: GSLV-F10 / EOS-03
कोविड-19 महामारी के बीच अगस्त 2021 में लॉन्च हुए GSLV-F10 में EOS-03 (GISAT-1) सैटेलाइट था. यह एक एजाइल अर्थ ऑब्जर्वेशन सैटेलाइट था, जो विभिन्न इमेजिंग तकनीकों से किसी क्षेत्र की निरंतर निगरानी कर सकता था. यह प्राकृतिक आपदाओं, मौसम, कृषि, वन, खनिज, आपदा चेतावनी, बादल, बर्फ और समुद्र विज्ञान के लिए स्पेक्ट्रल सिग्नेचर देता था.
इसे 36000 किमी ऊपर भारतीय उपमहाद्वीप के ऊपर रखा जाना था. लेकिन क्रायोजेनिक अपर स्टेज में मालफंक्शन हुआ - लिक्विड हाइड्रोजन टैंक में वॉल्व लीक से मिशन फेल हुआ. मिशन 2020 में तैयार था, लेकिन तकनीकी कारणों से देरी हुई.
अगस्त 2017: PSLV-C39 / IRNSS-1H
IRNSS (बाद में NAVIC) भारत का क्षेत्रीय नेविगेशन सिस्टम है, जो GPS का भारतीय संस्करण है. PSLV-C39 का लॉन्च अगस्त 2017 में हुआ, लेकिन हीट शील्ड अलग नहीं हुआ. इससे सैटेलाइट हीट शील्ड के अंदर ही अलग हो गया और मिशन फेल रहा. NAVIC सरकारी मंत्रालयों और सेना के लिए पोजिशनिंग, नेविगेशन और टाइमिंग सेवाएं देता है.
भारत के लिए सबक
ये असफलताएं सिर्फ वित्तीय नुकसान नहीं हैं, ये भारत की अंतरिक्ष-आधारित सुरक्षा को कमजोर करती हैं. घरेलू सैटेलाइट्स के अभाव में विदेशी सेवाओं पर निर्भरता बढ़ेगी. साथ ही, नए मिशनों की योजना प्रभावित होगी. इसरो को इनसे सीख लेकर गुणवत्ता सुधारनी चाहिए.