नासा के आर्टेमिस II मिशन में इस्तेमाल होने वाला ओरियन स्पेसक्राफ्ट एक आधुनिक क्रू कैप्सूल है. यह गहरे अंतरिक्ष में इंसानों को ले जाने के लिए खासतौर पर बनाया गया है. ओरियन कैप्सूल ही वह यान है जिसमें चार अंतरिक्ष यात्री बैठकर चांद के पास जा रहे हैं.
यह कैप्सूल पृथ्वी की निचली कक्षा से बाहर निकलकर चांद तक जाने और वापस आने में सक्षम है. ओरियन को नई पीढ़ी का अपोलो भी कहा जाता है क्योंकि यह अपोलो कैप्सूल की तरह काम करता है, लेकिन इसमें बहुत आधुनिक टेक्नोलॉजी लगाई गई है.
ओरियन स्पेसक्राफ्ट कैसे बना?
ओरियन स्पेसक्राफ्ट का विकास 2005-06 में शुरू हुआ था. शुरू में इसे क्रू एक्सप्लोरेशन व्हीकल (CEV) नाम दिया गया था. बाद में इसका नाम बदलकर ओरियन रखा गया. यह लॉकहीड मार्टिन कंपनी द्वारा बनाया जा रहा है.
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ओरियन में दो मुख्य हिस्से हैं - क्रू मॉड्यूल (जहां अंतरिक्ष यात्री बैठते हैं) और सर्विस मॉड्यूल (जिसमें इंजन, ईंधन, सोलर पैनल और अन्य सिस्टम होते हैं). सर्विस मॉड्यूल यूरोपीय स्पेस एजेंसी (ESA) के सहयोग से बना है.
कैप्सूल को बहुत मजबूत बनाया गया है ताकि यह चांद से वापसी के समय होने वाली भारी गर्मी को सहन कर सके. इसमें एडवांस्ड हीट शील्ड, बेहतर लाइफ सपोर्ट सिस्टम और स्वचालित नेविगेशन सिस्टम लगाए गए हैं.

बनाने में कितना समय और कितनी लागत लगी?
ओरियन स्पेसक्राफ्ट का पूरा विकास कार्यक्रम बहुत लंबा और महंगा रहा है. इसका विकास शुरू होने से अब तक करीब 20 साल लग चुके हैं. ओरियन प्रोग्राम पर अब तक लगभग 2.10 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा खर्च हो चुका है. हर एक ओरियन कैप्सूल बनाने की लागत करीब लगभग 8400 करोड़ रुपये के आसपास है. यह लागत बहुत ज्यादा है क्योंकि यह गहरे अंतरिक्ष में इंसानों की सुरक्षा के लिए बनाया गया है.
इसमें कितने लोग बैठ सकते हैं?
ओरियन स्पेसक्राफ्ट में चार अंतरिक्ष यात्री आराम से बैठकर यात्रा कर सकते हैं. इसमें सीटों की व्यवस्था ऐसी है कि चार लोग लंबी यात्रा के दौरान भी आराम से रह सकें. भविष्य के कुछ मिशनों में इसे छह लोगों तक ले जाने की क्षमता बढ़ाई जा सकती है, लेकिन आर्टेमिस II में सिर्फ चार सदस्य ही जा रहे हैं.
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खाने-पीने और टॉयलेट की व्यवस्था
ओरियन में खाने-पीने की अच्छी व्यवस्था है. अंतरिक्ष यात्री पहले से पैक किए गए स्पेस फूड ले जाते हैं - फ्रीज्ड ड्राई फूड, ट्यूब फूड और रेडी-टू-ईट खाना. पानी को रिसायकल करके इस्तेमाल किया जाता है.
टॉयलेट की व्यवस्था भी आधुनिक है. इसमें एक पूरा काम करने वाला स्पेस टॉयलेट लगा है. अपोलो मिशन में सिर्फ बैग्स का इस्तेमाल होता था, लेकिन ओरियन में प्रॉपर टॉयलेट है जो वैक्यूम सिस्टम से काम करता है. यह टॉयलेट मूत्र और ठोस मल को अलग-अलग प्रोसेस करता है.
ओरियन कितना सुरक्षित है?
नासा का दावा है कि ओरियन आज तक का सबसे सुरक्षित क्रू स्पेसक्राफ्ट है. इसमें कई लेयर सुरक्षा व्यवस्था है. अगर कोई इमरजेंसी हो तो यह खुद अलग होकर सुरक्षित जगह पर जा सकता है. इसका हीट शील्ड इतना मजबूत है कि चांद से वापसी के समय 40 हजार किलोमीटर प्रति घंटा की स्पीड पर होने वाली भारी गर्मी को झेल सकता है.
अंदर ऑक्सीजन, दबाव और तापमान को स्वचालित रूप से नियंत्रित किया जाता है. रेडिएशन से बचाव के लिए भी खास शील्डिंग है. नासा ने इसे कई बार अनमैन्ड टेस्ट (Artemis I) में आजमाया है.
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ऊर्जा कहां से मिलती है?
ओरियन स्पेसक्राफ्ट को ऊर्जा मुख्य रूप से सोलर पैनल्स से मिलती है. सर्विस मॉड्यूल पर लगे बड़े सोलर एरे सूरज की रोशनी से बिजली पैदा करते हैं. जब सूरज की रोशनी नहीं होती तो बैटरी का इस्तेमाल होता है. सर्विस मॉड्यूल में इंजन के लिए हाइपरगॉलिक ईंधन रखा जाता है.
ओरियन स्पेसक्राफ्ट आर्टेमिस II मिशन का दिल है. यह गहरे अंतरिक्ष में इंसानों को ले जाने वाला आधुनिक और सुरक्षित यान है. 20 साल के विकास, हजारों करोड़ रुपये की लागत और कई बार की टेस्टिंग के बाद यह आज तैयार है. यह मिशन सिर्फ चांद तक जाने का नहीं, बल्कि भविष्य में मंगल और उससे आगे की यात्राओं की तैयारी भी है.