वैज्ञानिकों ने हाल ही में एक चौंकाने वाली खोज की है. हमारे, आपके सबके पास तीसरी आंख है. लेकिन अब वो अवशेष हैं. अब उसका काम देखना नहीं बल्कि नींद और शरीर की घड़ी की नियंत्रित करना है. हमारे सिर के बीचों-बीच छिपी पिनियल ग्लैंड दरअसल प्राचीन 'तीसरी आंख' का अवशेष है.
Current Biology जर्नल में छपी एक रिसर्च पेपर के अनुसार यूनिवर्सिटी ऑफ ससेक्स और लुंड यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने दावा किया है कि लाखों साल पहले हमारे पूर्वजों की एक मध्य वाली आंख (Median Eye) थी, जो समय के साथ बदलकर पिनियल ग्लैंड बन गई. यह खोज हमें हमारी आंखों और शरीर की घड़ी के विकास की नई कहानी बताती है.
यह भी पढ़ें: दो हंपबैक व्हेलों ने बनाया लंबी दूरी का रिकॉर्ड, ब्राजील से ऑस्ट्रेलिया तक 15 हजार KM की यात्रा की
लगभग 50 करोड़ साल पहले हमारे पूर्वज समुद्री जीव थे जो समुद्र की गहराई में कीचड़ और अंधेरे में रहते थे. इन जीवों की दो तरफ वाली आंखें धीरे-धीरे काम करना बंद कर दीं क्योंकि वे अंधेरे में बेकार हो गई थीं. लेकिन उनके सिर के बीच में एक खास संरचना थी - जिसे शोधकर्ताओं ने 'कॉम्पोजिट एंसेस्ट्रल मीडियन आई' नाम दिया है. यह मध्य वाली आंख प्रकाश का पता लगाने, दिन-रात का पता लगाने और दिशा का ज्ञान रखने में मदद करती थी.
जब ये जीव सुरंगों में रहने लगे तो उन्होंने साइड आंखों को खो दिया, लेकिन मीडियन आई को बनाए रखा क्योंकि यह उनके के लिए जरूरी थी. शोधकर्ता प्रोफेसर टॉम बेडेन के अनुसार, समय के साथ इस मध्य आंख के कुछ हिस्से दो तरफ चले गए. हमारी आज की रेटिना बन गए, जबकि बीच वाला हिस्सा पिनियल ग्लैंड बन गया.
पिनियल ग्लैंड आज क्या काम करती है?

आज पिनियल ग्लैंड हमारे दिमाग के बीच में स्थित एक छोटा सा अंग है. यह अब प्रकाश को सीधे नहीं देखती, लेकिन हमारी दोनों आंखों से प्रकाश और अंधेरे की जानकारी प्राप्त करती है. इसकी सबसे महत्वपूर्ण भूमिका मेलाटोनिन नामक हार्मोन बनाना है.
जब रात होती है तो पिनियल ग्लैंड मेलाटोनिन छोड़ती है, जो शरीर को बताती है कि अब सोने का समय है. इससे हमारी सर्कैडियन रिदम यानी 24 घंटे की शारीरिक घड़ी नियंत्रित होती है. यह न सिर्फ नींद, बल्कि प्रजनन प्रणाली, इम्यून सिस्टम, मूड और यहां तक कि शरीर के तापमान को भी प्रभावित करती है. दिन में यह हार्मोन कम बनता है ताकि हम जागते रहें.
रेटिना पहले थी या आंख?
शोधकर्ताओं का कहना है कि रेटिना आंख से पहले विकसित हुई थी. प्रोफेसर टॉम बेडेन ने बताया कि गहरे पानी या कीचड़ में दिन-रात का पता लगाना और ऊपर-नीचे की दिशा जानना बहुत जरूरी था. साइड की आंखें चली गईं, लेकिन मीडियन आई बनी रही क्योंकि वह इसी काम के लिए बनी थी.
यह भी पढ़ें: हिंद महासागर में लैंड करते ही फटा दुनिया का सबसे बड़ा रॉकेट
इस अध्ययन में नए प्रयोग नहीं किए गए. शोधकर्ताओं ने मछलियों, लैंप्री (एक प्राचीन मछली) और अन्य जीवों के आनुवंशिक डेटा, जीवाश्मों और मौजूदा अध्ययनों का विश्लेषण किया. नतीजा यह निकला कि हमारी आंखें और पिनियल ग्लैंड अलग-अलग नहीं बनीं, बल्कि एक ही प्राचीन संरचना से विकसित हुई हैं.
आज भी कुछ जीवों में दिखती है तीसरी आंख
कुछ जीवों में यह तीसरी आंख आज भी साफ दिखती है. न्यूजीलैंड का टुआतारा (Tuatara) नामक सरीसृप इसका बेहतरीन उदाहरण है. इसके सिर पर एक छोटी आंख होती है जिसमें लेंस और रेटिना भी है. यह विस्तार से देख नहीं सकती, लेकिन ऊपर से आने वाले प्रकाश में बदलाव का पता लगाती है. इससे टुआतारा को दिन-रात का पता चलता है. वह धूप में बैठने या छिपने का फैसला करता है.

पिनियल ग्लैंड और आध्यात्मिक मान्यताएं
पिनियल ग्लैंड को प्राचीन काल से ही विशेष महत्व दिया जाता रहा है. यूनानी चिकित्सक इसे हजारों साल पहले जानते थे. हिंदू और योग परंपरा में इसे आज्ञा चक्र या तीसरी आंख कहा जाता है. योग और ध्यान की परंपरा में इसे जागृत करने से अंतर्दृष्टि, अंतर्ज्ञान, क्लेयरवॉयंस और आध्यात्मिक ज्ञान मिलने की बात कही जाती है.
हालांकि, विज्ञान अभी तक इन आध्यात्मिक शक्तियों को साबित नहीं कर सका है. वैज्ञानिकों के अनुसार, यह अंग मुख्य रूप से जैविक कार्यों- खासकर नींद और हार्मोन नियंत्रण के लिए है.
यह भी पढ़ें: लू से भी भीषण लू... दिल्ली-NCR में जारी इस अलर्ट का मतलब क्या है, शरीर पर कैसा हो सकता है असर
यह शोध हमें बताता है कि विकास हमेशा सीधा नहीं होता. कुछ पुरानी संरचनाएं पूरी तरह नहीं मिटतीं, बल्कि नए रूप में हमारे शरीर में बनी रहती हैं. पिनियल ग्लैंड इसी का सबूत है. इससे नींद की बीमारियों, डिप्रेशन और हार्मोन संबंधी समस्याओं को समझने में मदद मिल सकती है.
हमारे सिर के अंदर छिपी पिनियल ग्लैंड सिर्फ एक साधारण ग्रंथि नहीं है. यह 50 करोड़ साल पुरानी कहानी का जीवित प्रमाण है - जब हमारे पूर्वज अंधेरे समुद्र में एक मध्य आंख के सहारे जीवित रहते थे. आज यह हमें नींद दिलाती है. हमारे मूड को नियंत्रित करती है. हमारे शरीर की आंतरिक घड़ी को सही रखती है.